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बीमार क़ानू

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मौसम में बदलाव आ गया है, धूप मीठी हो गयी है। गर्मी से राहत मिल गयी है। बच्चों का भी मन बदल सा गया है। क़ानू तो और दिनों से ज़्यादा चंचल हो ही गयी है। सर्दियों में हमारी क़ानू अपनी पिंक कलर की जीभ साइड में लटका कर थोड़ा ज़्यादा ही खुश रहती है। खुश भी क्यों न हो क़ानू की मन पसन्द सब्ज़ियों का मौसम जो होता है..हरी-भरी मीठी मटर जो क़ानू को बेहद पसन्द है,और मैथी पालक के गट्ठर में खेलना तो क़ानू का बहुत पुराना शौक है। जब क़ानू हरी-भरी मैथी की डंडी मुहँ में दबाकर चलती है, तो वाकई में इतनी सुंदर लगती है,मानो कि हम इसी पोज़ में क़ानू का एक फोटो खींच कर दीवार पर लटका दे…एकदम ब्यूटीफुल सी स्टफ टॉय लगती है..हमारी क़ानू।

पहले तो हम दोनों टाइम गले में चैन और पट्टा डालकर क़ानू को घुमाने ले जाया करते थे, पर क्योंकि अब सर्दियाँ शुरू हो गयीं हैं, इसलिए केवल क़ानू शाम को ही बाहर घूमने जाती है। एक दिन हम क़ानू-मानू को बाहर घुमाने ले जा रहे थे,पूरी कॉलोनी के राउंड तो रोज़ लगाना ही होता है, क़ानू को । हमारी पीछे वाली गली में मकान बन रहा है,और उस मकान के बाहर पूरे में रेत का ढ़ेर फैला हुआ है। जब हम और क़ानू घूमते हुए उस रेत के ढ़ेर के पास पहुँचे तो क्या देखते हैं ,कि रेत के सबसे ऊपरी तरफ़ बहुत सारे रेत के मीडियम आकर के गोले थे, क़ानू ने ज़बरदस्ती चैन और पट्टे पर ज़ोर लगाकर पहले तो अपनी नाक रेत में घुसाई फ़िर अपने साथ हमें भी खींच कर रेत के बिल्कुल ऊपर ले गई…अरे!यह रेत गोले न थे, बल्कि छोटे -छोटे पुप्पियों के सिर आपस में ठंड की वजह से जुड़े हुए थे।

अब हम समझे कि क़ानू हमें ज़बरदस्ती रेत के ऊपर की तरफ़ क्यों खींच रही थी। बहुत ही प्यारे पप्पी थे,सब अपनी छोटी -छोटी मुंडी एक दूसरे में फंसाकर सब सर्दी में एक दूसरे को गरमा रहे थे। खैर! हम क़ानू को ज़बरदस्ती खींच कर घर की तरफ लेकर आ गए थे।


भोपाल शहर एकदम हरा-भरा है, थोड़ा सा शहर से दूर पहाड़ी इलाका भी है। तो बस!एक दिन हुआ यूँ कि बच्चे हमारे पास भागते हुए आये और कहने लगे,”माँ! हम सब दोस्तों ने पिकनिक का कार्यक्रम बनाया है, एक दोस्त के पापा ने कह दिया है, कि हमारी कार ले जाना।क़ानू को भी ले जाएँगे,कुछ न होगा”। क़ानू का नाम सुनते ही हमें तो ग़ुस्सा ही आ गया था,हमनें तो तुरन्त ही कह दिया था,”कोई क़ानू नहीं जाएगी ,संभलेगी नहीं इधर-उधर हो गयी तो हम छोडेंगे नहीं”।

बच्चे तो बच्चे ही थे, जिद्द पर अड़ गए।थोड़ी देर बाद बच्चों के दिमाग़ में ही आईडिया आया था, और बोले”चलो फ़िर आप भी हमारे साथ चलना।”पतिदेव तो भोपाल से बाहर किसी काम से गये हुए थे, इसलिए हम झट्ट से मान गए थे। अगले दिन ही बच्चा पार्टी के साथ हम क़ानू को स्वेटर वगरैह ठीक से पहना कर पिकनिक पर पहुँच गए।


ऐसे कोई दोपहर के बारह एक बजे होंगे जब हम पिकनिक स्पॉट पहुँचे थे,”अरे!यह कैसी जगह है,खैर!है, तो सुन्दर !चिड़ियाओं और पक्षियों के चहचहाने की आवाज़ें लगातार हमारे कान में आ रहीं थीं। तरह-तरह के पक्षियों की आवाज़ें थीं।जब नदी का पानी तेज़ी से बहता है,तो एक अजीब सी आवाज़ आती है,ठीक वैसी ही आवाज़ हमें भी सुनाई पड़ रही थी,ऐसा लग रहा था मानो आसपास कोई नदी बह रही हो”।

खैर!गाड़ी से हम सब क़ानू सहित उत्तर गए थे, बच्चे क़ानू के साथ खूब मस्ती करने लगे थे। क़ानू- मानू को भी जगह बहुत ही पसन्द आ गयी थी, बस, क़ानू तो हरियाली, तितली और तरह-तरह की छोटी-छोटी चिड़िया देखकर अपने होश ही खो बैठी थी। हमारी नज़र तो बस अपनी गुड़िया क़ानू पर ही थी, पिकनिक से हमे कोई लेना देना न था,उस सुन्दर सी हरी-भरी सी जगह पर क़ानू और बच्चों ने जम कर खेल-कूद किया…

जैसा कि हमनें बताया कि पानी के बहने की आवाज़ें आ रहीं थीं, सो उसी आवाज़ को फॉलो करते हुए हम सब क़ानू सहित उस नदी के किनारे पहुँच गए थे। यह नदी और कोई न थी,बल्कि नर्मदा बीच से होकर निकल रही थी। क़ानू तो बहुत ही खुश हो गई थी,इतना सारा पानी देखकर। हम चैन और पट्टा साथ लेकर ही गये थे, कि क़ानू इधर -उधर न भागे कहीं। हमनें चैन और पट्टा बाँधकर क़ानू को किनारे ले जाकर पानी पिलवाया था। हमनें गलती से भी क़ानू की चैन न खोली थी, क़ानू ने अपने आप को गर्दन तक पानी में डुबो कर पानी के खूब मज़े लिए थे,ज़्यादा न भीगने दिया था, हमनें क़ानू को ..नहीं तो बीमार पड़ जाती,खैर! क़ानू को बाहर निकाल हमनें अच्छे से टॉवल से पोंछ कर सूखा कर दिया था। बच्चों का खेल-कूद खाना-पीना सब कुछ होने के बाद हम सब घर आ आ गए थे।


हरी-भरी जगह और एक अच्छी सी पिकनिक का खूब चर्चा किया था,हम सब ने घर आकर। सब का मूड आउटिंग के बाद फ्रेश हो गया था,फ़िर से प्यारे दिन बीतने लगे थे..हमारे क़ानू के साथ।

पर दो चार दिन बाद ही…अरे!यह क्या..क्या देख रहें हैं हम आज तो सुबह से ही चुप-चाप है,क़ानू-मानू नहीं तो भोंक-भोंक कर सिर दर्द कर देती है। पता नहीं क्या हो गया है कि बिस्तर से ही नहीं उठ रही है,काना। ऐसा तो कभी नही हुआ क़ानू तो अंदर -बाहर करते-करते पूरा दिन ही निकाल देती है,न ही अपने बाउल में खाने को हाथ लगाया है। और कमाल तो देखिए आज तो पास बैठकर ही हमारे दोनों बच्चों ने ऑमलेट खाई है, पर मज़ाल है, जो क़ानू खड़ी भी हुई हो…नहीं तो जो भी अंडा खाता है, क़ानू तो अंडे की खुशबू आते ही खुद भी हमारे पीछे हो लेती है,और हमारी जान ही खा डालती है,जब तक कि हम उसको अंडा बनाकर नहीं दे देते।

ज़रूर कुछ न कुछ तो बात है…हो न हो उस दिन पिकनिक में झाड़ियों में खेल-कूद कर रही थी,और पानी में भीगी भी थी,या तो गीले होने से बीमार हो गयी है,या फिर झाड़ियों में कोई न कोइ कीड़ा क़ानू को काट गया है। हमनें घर में कहा था”भई!जिसके पास भी टाइम हो गाड़ी निकाल लो,हमें अपनी क़ानू को डॉक्टर के पास लेकर जाना है। ना नकुर नहीं चलेगी कहे देते हैं”। क़ानू के लिए हम कोई भी और कभी भी कोई समझौता करने को तैयार न होते हैं।

पतिदेव ने गाड़ी निकाल ली थी कहा था,”चलो भई, देखा जाएगा पहले तुम्हारी क़ानू को दिखवा देते हैं”। डॉक्टर साहब ने जिनसे हमनें क़ानू को खरीदा था, पूरा चेक-उप किया और कहने लगे ,”सर्दी का कोई चक्कर नहीं है,ऐसा लगता है, की क़ानू को कोई कीड़ा काट गया है,जिसकी वजह से उसे बुखार है”। डॉक्टर साहब ने क़ानू के लिए तीन-चार दवाइयाँ लिख दीं थीं, कहा था”बस! पीने के पानी से दूर रखें,सिर्फ दिन में एक बार पानी पीने दें। इस तरह का कीड़ा काटने से कुत्ते ज़्यादा पानी पीते हैं”।

हम जभी समझ गए थे,देखा…हमारा शक सही निकला.. उन जँगली झाड़ियाँ में ही कोई कीड़ा काटा है, मेरी प्यारी क़ानू को। हम तो पहले से ही पिकनिक के मूड में न थे..हो गयी न बीमार।
क़ानू को हम डॉक्टर के यहाँ से घर लेकर आ गए थे, और जैसा-जैसा डॉक्टर साहब ने बताया था..ठीक उसी तरह दवाईयां देने लगे थे। वैसे तो दवाईयां असर कर रहीं थीं, पर क़ानू का भौंकना और खेल-कूद करना अभी शुरू न हुआ था। घर में क़ानू को बीमार और चुप-चाप देखकर सभी उदास रहने लगे थे। खाना-पीना तो थोड़ा बहुत शुरू कर दिया था, क़ानू ने पर बहुत उदास लगने लगी थी, हमें।

अब तो हमारा मन भी बिल्कुल न लग रहा था, यूँ क़ानू को कोने में उदास बैठा देखकर। क़ानू का वो पूरे दिन भोंकना और इधर-उधर कूद-कूद कर खेलना बहुत याद आ रहा था,हमें। शाम का घूमना भी क़ानू का बन्द सा ही हो गया था। एक दिन शाम को हम ऐसे ही बैठ कर सोचने लगे कि क़ानू को कैसे खुश किया जाए। कीड़े वाला इन्फेक्शन तो ठीक हो गया है, पर पहले की तरह अपने गोलडन घुँघरू की आवाज़ कर खेलना तो शुरू करे।

आइडिया!! और हमारे दिमाग़ में क़ानू को खुश करने का एक खुबसूरत सा आईडिया आया था। हमारी छत्त पर एक बहुत पहले से तागड़ी रखी हुई थी, किसी काम के लिए लाए होंगें तब से यहीं रखी थी। अब रात का टाइम हो गया था। हम चुपके से तागड़ी लिए बाहर निकले थे,और उसी मकान के आगे रेत के ढ़ेर के पास पहुँच गए थे, जिसका जिक्र हमनें आपसे पहले ही किया था, हमनें देखा ठंडी रेत के ढ़ेर में वो सारे छोटे-छोटे पप्पी एक दूसरे की मुंडी में अपनी छोटी -छोटी मुंडी फँसा कर सो रहे हैं। हम रेत के ऊपर दबे पाँव चढ़े थे ,और एक-एक करके हमनें सारे पप्पी अपनी तगाडी में भरकर घर ले आये थे। अब हमनें पप्पी वाली तगाड़ी क़ानू के सामने रख दी थी।

अरे!वाह!जो असर दवाइयों ने न किया था, वो पप्पियों ने कर दिखाया था, क़ानू खड़ी हो एकदम उन नन्हें फरिश्तों के पास आ गयी थी, और उन्हें एकदम अपनी गुलाब-जामुन जैसी नाक से सूँघने लगी थी,क़ानू की आँखों में खोई हुई चमक वापिस दिख रही थी, हमनें छत की लाइट जला तगाडी छत पर ही रख दी थी, पप्पी तगाडी से बाहर आकर छत पर खेल-कूद करने लगे थे.. क़ानू भी उन नन्हें दोस्तों में अब खेलने कूदने लग गई थी। अगले दिन सुबह होते ही हम क़ानू के नन्हें दोस्तों को वापिस रेत में रख आये थे,लेकिन रात होते ही फ़िर से वापिस ले आये थे। उन नन्हें दोस्तों की वजह से क़ानू का खेलना -कूदना और भौंकना फ़िर से शुरू हो गया था।

डॉक्टर की दवाई जो असर न कर सकी थी,वो नन्हें फरिश्तों के प्यार ,दोस्ती और मासूमियत ने कर दिखाया था। क़ानू का रोज़ शाम को घूमना और अपने नन्हें दोस्तों के साथ रेत पर मस्ती करना फ़िर से शुरु हो गया था। और हमारी ज़िंदगी एक बार फ़िर से चल पड़ी थी, क़ानू और नन्हें फरिश्तों के संग।