
आखिरी सवाल !!
युग पुरूषों के पूर्वापर की चर्चा !
उपन्यास अंश :-
हमारे गृहस्थ को पैसे की दरकार थी . ख़ास कर जसोदा के आने के बाद तो हमारे खूब खर्चे बद गए थे .
“आप तो शादी ही नहीं करना चाहते थे ?” जसोदा का पहला सवाल था .
हाँ,हाँ ! मुझे खूब याद है कि उस ने मुझ से पहला यही सवाल पूछा था !
मैं सहमा-सहमा उसे देखता ही रहा था !
जसोदा सुंदर थी . उस का मुंह-माथा खूब अच्छा था . उस का स्वभाव भी म्रदुल था . परिवार में सभी उसे चाहते थे . वह भी सब की इज्जत कराती थी . उस ने सब के मन जीत लिए थे .
लेकिन मेरा मन अभी तक उस की मुठठी में न आया था !
“मैं …मैं …बच्चे पैदा करना नहीं चाहता ….!” मैंने अनमने से उत्तर दिया था . “गरीबी एक अभिशाप है !” मैंने नारे की तरह उछाला था , गरीबी को . “मैं नहीं चाहता कि ….”
“कमाएंगे …तो अमीर बन जांयेंगे …!” जसोदा ने एक चुहल के साथ कहा था . “गरीबी-अमीरी तो करमों का खेल है …” उस ने मुझे जीवन-दर्शन समझाया था . “कौन अमीरी नहीं चाहता …? लेकिन मिले …तब न …!”
मैं चुप था . अभी तक अमीर बनने का सपना तो मैंने देखा ही नहीं था ! जो सपने मैं देखता था – वो तो अजीव ही थे ! मैं तो गरीबों का मसीहा बनने की ही बात सोचता रहता था . में तो सोचता रहता था कि कुछ ऐसा हुनर हाथ में लूं ..जिस से हम सब की गरीबी दूर हो जाए ! मैं कुछ ऐसा अनूठा कर दूं …जिस से …..
क्यों कि मुझे समाज की विषमता बहुत ही सताती थी ! मुझे चुभता था कि कुछ लोग ऊपर थे …बहुत ऊपर …! और कुछ लोग थे …जो उन की ओर चाह कर भी ताक नहीं सकते थे . कुछ छोटे थे …छोटी जात-बिरादरी के थे . कम पैसे वाले थे …हुनर हीन थे …तो कुछ हुनर मंद भी थे . …तो कुछ पैसे वाले भी थे …पढ़े-लिखे थे …और कुलीन भी थे !!
लेकिन थे सब के सब इन्सान …..एक जैसे ही इन्सान ….!!
“फिर ये फरक क्यों है …इतनी विषमता …..कि ….” मैं घंटों इसी विषय पर सोचता रहता !
“समाज की सेवा करना हमारा परमोधर्म है …!” शाखा में हमें सिखाया जाता . देश हमारे लिए सर्वोपरि है ! देश के लिए समर्पण करना …..” मैं सुनाता ही रहता . …पर ये बातें तब मेरी समझ में कहाँ समातीं ….थीं !
एक विभ्रम था . एक अंधकार था . मैं था – मुझे एहसास था ! पर जिस उजाले की मुझे दरकार थी – वह तो कहीं था ही नहीं !!
“नौकरी की जुगाड़ …कहीं ..लगा लो तो ….” बाबू जी ने एक दिन फिर मुझे याद दिलाया था . “अब घर के खर्चे बढ़ गए हैं …और आगे भी ….” उन का इशारा था कि अब मेरे और जसोदा के बच्चे भी तो आयेंगे ! “हाई स्कूल तो हो ही गया है …” उन्होंने मुझे याद दिलाया था . “अच्छी नौकरियां मिल रही हैं . सरकार आज-कल हम लोगों का द्यान रख रही है ! सरकारी सहायता …..”
लेकिन मैं था कि …इन छोटी-छोटी सहायता …और नौकरी-चाकरियों के ….झंझट से दूर ही रहना चाहता था !
“दूर क्यों भागते रहते हैं , आप …?” जसोदा मुझे पूछ रही थी . “मेरी क्या गलती है ….?” उस ने प्रश्न किया था . “मैं तो अब …आप की हूँ …आप के लिए हूँ …आप के घर-गृहस्थ ….”
घर-गृहस्थ …? मेरा घर-गृहस्थ ….! बाबू जी की तरह ही मेरे भी छ : सात बच्चे …और उन बच्चों के बोझ के नीचे दबा मैं ….? गरीबी में दम तोड़ता …मैं ! मैं ….मजबूरियों के हाथों बिका …मैं …मैं अनपढ़ ….मैं – बिना किसी हुनर -हक़ के जीता …एक आदमी ….!!
“मुझे बच्चे पैदा नहीं करने , जसोदा !” मैंने दो टूक कहा था .
“फिर शादी क्यों की ….?” जसोदा का प्रश्न था .
हाँ ! ये उस का आखिरी प्रश्न था – जिस का उत्तर मैंने आज तक नहीं दिया है !
लेकिन चुनाव के आज के दौरान में मुझ से जसोदा को लेकर जम कर सवाल-ज़बाब हुए हैं !
कितना -कितना उधेडा है मुझे – लोगों ने ….प्रेस ने …और प्रतिद्वंदियों ने ….!! उफ़ ……..!!!
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श्रेष्ट साहित्य के लिए – मेजर कृपाल वर्मा साहित्य !
