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आ गईं तुम!

meri maa

“ अरे! माँ यहाँ झीने में खड़ी होकर क्या कर रही हो! आओ! चलो! अन्दर चलें। कैसी हो!.. माँ!.. आज बहुत दिनों बाद तुमसे मुलाकात हुई!.. कहाँ चलीं गईं..थीं.. तुम!”।

“ मैं तो यहीँ थी.. अरे! वाह! फूल तो तूने बहुत सुंदर लगा रखे हैं.. याद है!.. आसाम में हमारा कितना सुन्दर टेरेस गार्डन था”।

“ नहीं माँ!.. टेरेस गार्डन का मुझे बिल्कुल भी याद नहीं.. तब तो मैं बहुत छोटी सी थी। पर हाँ!.. एक बात बहुत अच्छे से याद है.. पिताजी एक साइकिल वाला रिक्शा लाए थे. मैं और बुलबुल उस रिक्शे पर खूब मज़े से खेला करते थे। हाँ!.. पिताजी का लगाया हुआ किचन गार्डन तो याद है.. मटर, केले, पाइनएप्पल कितने अच्छे लगा करते थे, न माँ!”।

“ देख ले! स्वीटी! किचन के ऊपर तो बड़े-बड़े कद्दू भरे पड़े रहते थे। पकौड़े बहुत बढ़िया बनते हैं.. कद्दू के.. एकदम चीज़ जैसे!.. तेरे पिताजी को बेहद शौक था.. कद्दू के पकौड़ों का.. मैं तो तू जानती ही है.. बनाती ही रहती थी”।

“ हाँ!.. माँ!.. आसाम भी अच्छी जगह थी.. खूब एन्जॉय किया था.. हम लोगों ने उधर.. पर बहुत अच्छी तरह से याद नहीं, मैं और बुलबुल छोटे थे तब”।

“ हाँ!.. छोटे तो थे.. तुम!.. आसाम के दोसे-संभार की भी कहाँ याद होगी, तुम्हें ज़्यादा.. पर भई! कितने बड़े और अच्छे बनाता था.. है! न.. एकदम प्रोफेशनल!। .. कलकत्ता की तुम्हें याद होगी.. बड़े हो गए थे.. न तुम थोड़ा!”।

“ हाँ! माँ!.. कलकत्ता की तो अच्छी तरह से याद है.. भइया! वो कुल्हड़ में कितने टेस्टी और खुशबूदार रसगुल्ले लाया करते थे… वो बालीगंज में हमारा सेंट्रल स्कूल हुआ करता था! न.. माँ!.. तुम्हें पता है.. कलकत्ता में मेरे और बुलबुल के स्कूल के पास एक बहुत बड़ा सा इमली का पेड़ था.. हम खूब इमली तोड़ा करते थे.. छुट्टी के टाइम। और एक बार तो वो आँटी कैसे हमारे घर की डोरबेल बजा कर अन्दर चली आ रही थी.. और आपने कैसे धक्का मार कर दरवाज़ा बन्द किया था”।

“ हा! हा! हा!.. हाँ!.. चोर बहुत होते हैं, न! कलकत्ता में.. देख ले!.. कैसे अन्दर चली आ रही थी.. मुझसे नीचे बैठे चौकीदार ने बोला भी था.. मैडम अगर आप पहले बता देतीं तो इसे हम यहीँ रोक लेते.. ऊपर जाने ही न देते.. हमें लगा कोई आपसे मिलने ऊपर जा रही है”।

“ चाय लाऊँ!.. तुम्हारे लिये “।

“ नहीं अब तो सीधे ही खाना खा लूँगी “।

“ ले लो! थोड़ी सी चाय.. मैंने बच्चों के लिये समोसे बनाए थे.. तुम भी खाकर बताना कैसे बने हैं “।

“ चल! तो ले आ!.. थोड़ी सी चाय.. आधा कप ही लाना.. नहीं तो खाना नहीं खा पाऊँगी मैं “।

“ लो! तुम्हारी चाय!.. और समोसे!”।

“ बस! बेटा! एक ही लूँगी.. ज़्यादा खाकर मेरे पेट में दर्द हो जाता है। बहुत बढ़िया.. प्रोफेशनल समोसे बनाए हैं.. तूने!.. मज़ा आ गया!.. तेरे समोसे खाकर तो जम्मू के समोसे याद आ गए.. ज़बरदस्त बनाता था!’।

“ हाँ! माँ!.. याद है!.. जैसे ही हमारी कार रुकती थी.. हमें देख फ़टाफ़ट बारह समोसे कढ़ाई में डाल कर गरम करना शुरू कर दिया करता था.. पिताजी! हमेशा ही बारह समोसे खरीदा करते थे.. और मैं तो हमेशा ही दो ज़्यादा खाया करती थी। वैसे बहुत टेस्टी समोसे हुआ करते थे.. उसके मूली की चटनी के साथ”।

“ देख! ले!.. खूब एन्जॉय किया आर्मी लाइफ में.. हमनें.. वैसे देखा जाए तो दिल्ली आने के बाद सिविल लाइफ भी बुरी नही रही.. सिविल का अपना स्टाइल और मज़ा है”।

“ हाँ! माँ!.. वो तो है”।

“ पहले मेरे तीन बच्चे थे.. फ़िर उनके शादी-ब्याह हो गए.. परिवार बढ़ गया.. जैसे तुम प्यारे थे.. अब उतने ही प्यारे ये सब हो गए”।

“ हाँ! माँ!.. ठीक ही कह रही हो तुम!.. तुम्हारी ये वाली साड़ी बहुत सुन्दर लग रही है.. कब ली”।

“ अरे! ये तो जब की साड़ी है.. जब तुम तीनों बहुत छोटे-छोटे थे। देख! ले!.. खूब चली। तेरे पिताजी जब कोर्स के लिये पूना गए थे.. वहाँ से लाए थे”।

“ माँ! जब हम छोटे थे.. और पिताजी कहीं बाहर से महीनों बाद आया करते थे.. तो मुझे याद है.. तुम्हारे लिये ज़रूर एक सुन्दर सी साड़ी लाते थे। और हाँ! माँ! .. एक बात तो मुझे आज भी बहुत याद आती है.. दिल्ली में h-ब्लॉक वाले घर में तुम शाम को रोज़ मन्दिर में दीपक लगा कर आरती गाया करतीं थीं.. और हम तीनों बहन-भाई तुम्हारे साथ खड़े हुआ करते थे। माँ! बेशक मैं आज बड़ी हो गयी हूँ.. पर फ़िर भी न जाने क्यों अपने बचपन और पुरानी यादों में वापिस जाने को जी करता है”।

“ ऐसे नहीं सोचा करते.. अब अपने बच्चों में अपने बचपन को देखो!.. इनके साथ एन्जॉय करो!.. यही तो ज़िन्दगी है”।

“ हाँ! बात तो आपकी सही है”।

“ अरे! माँ!.. किससे बातें किये जा रही हो!.. और किसके लिये खाना लेने जा रही हो!.. नानी तो हैं ही नहीं यहाँ। नानी नहीं हैं.. माँ! तुम्हारे पास!.. तुम खुद से ही बातें कर रही हो!.. कहाँ खोई हुई हो!”।

बच्चे सही कह रहे थे.. माँ तो मेरे पास थीं ही नहीं.. उन्हें इस दुनिया को छोड़ कर गए हुए तो एक साल हो गया। पिछले साल ही तो उन्होंने हमसे अलविदा ली थी। माँ तो चलीं गईं जहाँ भी उन्हें जाना था.. पर उनकी यादें और उनके ख़याल मन से नहीं जाते। उनका वो ममता भरा स्पर्श और महक आज भी उसी तरह से मेरे साथ है। कोई बात नहीं माँ! तुम जहाँ कहीँ भी हो.. मेरे खयालों में यूँहीं आना.. मैं तुम्हें हमेशा और हर दिन ऐसे ही याद करूँगी।