रणभूमि से ;-
लड्डू न बांटना !!
हमलावरो ! बहादुरो !!
सुनो ! कानों से नहीं , आँखों से –
मेरी बात समझो – चंद इशारों से –
डरो ! दुश्मन के सबल इरादों से –
बचो ! अफवाहों के गहन अंधेरों से
हमलावरो ! बहादुरो !!
दुश्मन की नब्ज़ खोजनी है –
रोग की तरह उस की काया खोलनी है –
उत्साह के घोड़ों को हींसने मत देना –
हमने चुपचाप भारत की जय बोलनी है !
हमलावरो ! बहादुरो !!
अंधेरों में विलय रूहों की तरह –
पानी पर ठहर गए पत्थरों के मानिंद –
अज्ञात के इशारों पर शेर का पंजा-सा ठहर –
सांस रोके , बिन बोले, अपनी बैरिलें खोले –
हमलावरो ! बहादुरो !!
इंतज़ार करना मेरे इशारे का –
दुश्मन की किसी बेहूदा हरकत का –
सजग प्रहरियों के ऊंघने का –
एक साथ मिल कर जूझने का !
हमलावरो ! बहादुरो !!
यत्न करना है -प्रयत्न करना है –
मशीनगनों का मुंह पहले बंद करना है !
तोपखाने को तोपखाना देख लेगा –
हमें मोर्चों पर संगीनों से वार करना है !!
हमलावरो ! बहादुरो !!
हमें -नदी-नाले , जंगल-उजाड़ –
बर्फ के दरिये -दलदल हज़ार –
शीत,कुहरा ,तिमिर ,वर्षा और पहाड़ –
जान मुट्ठी में पकड़ करना है -वार !!
हमलावरो ! बहादुरो !!
हथियारों से आगे हिम्मत लड़ेगी –
मौत के सामने किस्मत अड़ेगी –
तूफ़ान बन तुम वार करना –
गोलियां निशाने खुद ढूंढ लेंगी !!
हमलावरो ! बहादुरो !!
बैठ कर घाव मत चाटना !
दुश्मन की दुम ऐसे न काटना –
सुरागों का संसार जब खबर लाए –
खबरदार रहना -खुशियों के लड्डू न बांटना ………
तुम बहादुर हो , हमलावरो …!!!!!
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श्रेष्ठ साहित्य के लिए – मेजर कृपाल वर्मा साहित्य !!