“हुआ क्या है स्वामी जी?” विभूति मकीन ने फिर से प्रश्न पूछना आरंभ किया था।
“जंग हारे हैं।” स्वामी अनेकानंद ने विहंस कर उत्तर दिया था।
“कैसी जंग? कौन सी जंग?” विभूति को लगा था कि स्वामी कुछ छुपा रहे थे।
“जीवन की जंग में बुरी तरह से परास्त हुए हैं।” स्वामी अनेकानंद बताने लगे थे। “मन तो मानो मर ही गया है। इच्छाएं खत्म हो चुकी हैं, आत्मा असंपृक्त है। बुद्धि ने काम करना छोड़ दिया है। विचारों के लिए स्पेस नहीं है। और आत्म विश्वास खो दिया है।” स्वामी अनेकानंद ने अब विभूति मकीन की आंसुओं से डबडबाती आंखों को तलाशा था।
“लेकिन क्यों? कैसे – स्वामी जी जबकि हमारे पास तो सब कुछ है। ऐसी कोई सफलता नहीं जो पापा की झोली में न गिरी हो। ऐसा कोई चैलेंज नहीं जिसे पापा ने …”
“यही …! यही तो बीमारी है, मैडम।” तनिक हंसे थे स्वामी जी। “सोना है आठ घंटे लेकिन आप सोते हैं चार घंटे। फिर उर्जा कहां से आएगी?”
“लेकिन … लेकिन जब काम होता है तो …”
“उर्जा नहीं तो काम कैसे होगा? हो गया न कबाड़ा!” हंसे थे स्वामी जी।
“व्यापार में टैंशन तो होता ही है।” विभूति मकीन ने मोहन मकीन की मजबूरी बताई थी। “पापा चाहते तो नहीं थे कि …”
“हार जाएं?”
“हां! पापा तो …”
“काम के पीछे पागल थे?”
“हां!”
“हो गए न पागल!” हंस पड़े थे स्वामी जी। “अरे भाई जितना … जितना उलझोगे उतना ही …”
“यू मीन काम नहीं करना चाहिए?” विभूति मकीन को क्रोध चढ़ आया था।
“आई मीन – हंसना भी चाहिए! आई मीन – प्रेम भी करना चाहिए। आई मीन – किसी की हद से आगे बुराई भी नहीं करनी चाहिए। आई मीन जिना निगेटिव थॉट्स को जगह दोगे उतने ही परास्त होगे। ये पिटे ही इस गेम में हैं। बैलेंस बिगड़ गया है बॉडी का।”
“अब …?” विभूति ने फिर से होश संभाला था।
“ही इज ऑल द निगेटिव नाओ।” स्वामी जी गंभीर थे। “सब कुछ जीरो पर है। उर्जा का एक अंश भी नहीं बचा है। मन पूरी तरह खट्टा हो चुका है। टु कम बैक इज द गेम नाओ।”
“वो कैसे होगा?” विभूति मकीन ने पूछा था।
“संकल्प।” स्वामी जी ने कुछ सोच कर उत्तर दिया था। “आप इन की बेटी हैं। आप इनकी संतान हैं। इनका ब्लड रिलेशन हैं आप। आप संकल्प उठाइए।” स्वामी जी ने मांग सामने रख दी थी।
“मुझे क्या करना होगा?”
“संकल्प लेना होगा – जैसे कि जन कल्याण आश्रम की बिल्डिंग का निर्माण करना।” स्वामी जी ने सुझाव दिया था। “जन जन की शुभकामनाएं जुड़ेंगी तभी मोर्चा जीतेंगी आप।” हंस गए थे स्वामी जी। “अच्छे बुरे का संतुलन भी करना आवश्यक होता है, मैडम।”
विभूति ने स्वामी जी की संकल्प उठाने की बात मान ली थी।
कल्लू ने पंडित अवध नारायण को बुला कर संकल्प अनुष्ठान के लिए सोमवार का शुभ लग्न निकाला था।
पूरे जन कल्याण आश्रम में खुशी की लहर दौड़ गई थी। होटल माधव मानस इंटरनेशनल में भी जश्न का माहौल था। विभूति द्वारा जन कल्याण आश्रम की नई बिल्डिंग बनाने की खबर ने पूरे बंबई शहर को जगा दिया था।
पंडित अवध नारायण की विधिवत पूजा अनुष्ठान का प्रबंध कल्लू की देख रेख में संपन्न हुआ था। पहले हवन होना था। हवन के बाद संकल्प कलश की स्थापना होनी थी। संकल्प कलश को मंत्रोच्चार से शुद्ध करने के बाद होटल में अचेत पड़े मोहन मकीन के सिरहाने रखना था।
संकल्प सेरीमनी के लिए सभी उपस्थित लोगों को आमंत्रित किया गया था।
सोमवार को संकल्प दिवस को बंबई वालों ने एक उत्सव की तरह मनाया था।
विभूति मकीन का मन आज बल्लियों कूद रहा था। उसे एहसास हो रहा था कि आज वो अपने प्रिय पापा के हित साधन का माध्यम बन रही थी। आज उसे रह-रह कर अपनी मां गौतमी और भाई प्रबुद्ध याद आ रहे थे।
“यू लेम डक।” विभूति मकीन अचानक आज अपने पापा मोहन मकीन के कहे संवाद सुन रही थी। पापा मां गौतमी को लेम डक के नाम से संबोधित करते थे।
गौतमी कहीं से विशुद्ध हिन्दुस्तानी थी तो मोहन मकीन अमेरिका में आ कर निपट विदेशी बन गए थे। यहां तक कि जब कभी गौतमी अपने बेटे प्रबुद्ध से हिन्दी में बात कर लेती थीं तो पापा कहते – डोंट स्पॉइल हिम यू लेम डक।
विभूति को याद है जब कभी पापा किसी देसी घटना को लेकर बहुत बिगड़ जाते थे।
“खचड़ा खाना है – भारत।” विभूति को याद है जब पापा बिगड़ते थे तो अपने ही देश को खूब गरियाते थे।
“है तो हमारा।” मां गौतमी बीच में बोल पड़ती थीं।
“होगा तुम्हारा।” पापा बड़े ही विरस भाव से कहते। “पर मैं तो न लौटूंगा भारत, गौतमी।” वह अपनी ली शपथ को बार-बार दोहराते।
लेकिन आज विभूति के घमंडी पापा बेहोश हुए भारत की ही गोद में आ लेटे थे।
पंडित अवध नारायण ने पूरे विधि विधान के साथ संकल्प सेरिमनी को संपन्न कराया था। जन कल्याण आश्रम के लोगों ने भी बड़ी ही श्रद्धा के साथ इस उत्सव को मन प्राण से मनाया था। विभूति मकीन को आज महसूस हुआ था कि वो अब अपनों के बीच में थी। लग रहा था जैसे पूरा भारत ही उस उत्सव में शामिल था और उसके पापा मोहन मकीन के स्वस्थ होने के लिए प्रार्थना कर रहा था।
ऐसा अमेरिका में नहीं था – विभूति ने एकाएक महसूस किया था।
अमेरिका की हवा बहुत विस्फोटक थी। इस तरह की शांति और इस प्रकार का सौहार्द वहां कहां था? वहां का आदमी तो केवल अपने लिए ही प्रार्थना करता था – गैरों के लिए नहीं। वहां की दौड़ भाग धन कमाने से आगे और कुछ नहीं थी। स्वामी जी के वचन सत्य थे। शायद पापा इसी जंग में हारे थे।
मां और भाई की मृत्यु के बाद तो पापा वर्कहॉलिक हो गए थे – विभूति को याद हो आया था। काम और काम के अलावा तो उन्हें और कुछ सूझता ही नहीं था।
और एक दिन अचानक ही वो बिस्तर से उठ ही न पाए थे। और तब शुरू ई थी वो अस्पतालों की कभी खत्म न होने वाली यात्रा।
“गोन मैड।” एक तगमे की तरह पापा पर इस तरह का भद्दा लेबल लगा कर अस्पताल के दरवाजे उन पर बंद हो गए थे।
शाम को जब राम लाल का अचानक उदय हुआ था तो आनंद को आश्चर्य न हुआ था।
“गुरु से आगे चेला!” राम लाल ने हंसते हुए कहा था। “आप … आप आनंद बाबू अब चेला नहीं रहे। गुरु हुए आप। हंस रहा था राम लाल।
आनंद को आज बहुत भला लगा था।

मेजर कृपाल वर्मा रिटायर्ड