“आर यू द स्वामी?” पर्ण कुटीर में घुसते ही विभूति मकीन ने जब आनंद को देखा था तो चौंक पड़ी थी। विभूति मकीन बीमार मोहन मकीन की इकलौती बेटी थी।
विभूति मकीन स्वामी अनेकानंद का नाम सुन कर अमेरिका से भारत आई थी। उसे कहा गया था कि अब मोहन मकीन किसी चमत्कार के तहत ही जी पाएंगे। वो लाइलाज हो गए थे। स्वामी अनेकानंद के किए चमत्कारों के बारे में उसे बहुत कुछ बताया गया था।
विभूति मकीन के दिमाग में स्वामी अनेकानंद की एक छवि बन गई थी। उसने माना था कि ये स्वामी जरूर ही कोई बूढ़ा तपस्वी होगा जिसने असाधारण प्रतिभा प्राप्त कर ली होगी और जो …
“यस। आई एम द वन।” स्वामी अनेकानंद ने विभूति मकीन के अंग्रेजी में किए प्रश्न का उत्तर अंग्रेजी में ही दिया था।
और ये भी विभूति के लिए एक अजूबा था। ये स्वामी तो अंग्रेजी भी बोलता था।
विभूति मकीन इस यंग और आकर्षक पुरुष को लंबे पलों तक देखती रही थी। उसे कहीं कुछ दाल में काला दिखा था। वह मान रही थी कि वो आदमी वो स्वामी था जिसकी तलाश में वो घर से निकली थी।
“माई फादर इज सिक।” विभूति मकीन ने फरमाइश पेश की थी।
“टेक हिम टू दी हॉस्पीटल।” स्वामी अनेकानंद का उत्तर था।
अब विभूति क्या करे?
“अमेरिका के सभी डॉक्टरों ने जवाब दे दिया है। तभी …”
“बीमारी क्या है?” स्वामी अनेकानंद ने पूछा था।
“साइको। कहते हैं मेंटल हो गए हैं।” विभूति मकीन ने उदास मन से कहा था। “वो अब …” विभूति मकीन का कंठ भर आया था। “वो अब …” विभूति रोने लगी थी।
“टैल मी हिज पास्ट।” स्वामी अनेकानंद ने मांग की थी।
“हि इज दी सुपर स्टार …” विभूति मकीन फिर से भावुक हो आई थी। “एक जमाना था जब इन्हें पूरा जहान महान मानता था। इन जैसा बिल्डर अमेरिका में और न था। इनके कारनामे आज भी चर्चित हैं। लेकिन …”
“कोई हादसा हुआ?” स्वामी जी ने पूछा था।
“नहीं।” विभूति ने उत्तर दिया था। “बड़े ही मैथोडिकल आदमी हैं। हर काम समय पर होगा। हर काम निज का तिज होगा। और हर काम …”
“कोई हादसा?” स्वामी ने फिर वही प्रश्न दोहराया था।
“हां। हां-हां। मेरे भाई की एक्सीडेंट में मौत और उसके बाद मां की मौत। इन दो घटनाओं ने हिला दिया था पापा को। मैं … मैं …”
“भाई …?”
“वैरी-वैरी स्मार्ट। पापा की ट्रेनिंग पर चलता था। आउटस्टेंडिंग था। मैं भी पापा की …”
“चाहते क्या थे?”
“यही कि हम दोनों इतने स्मार्ट बनें – इतने स्मार्ट कि …” रुकी थी विभूति। “वो हिन्दुस्तानियों से बेहद नफरत करते हैं। वो पूरी तरह से वैस्टर्न बन गए हैं।”
“पीते हैं?”
“खूब पीते थे। लेकिन हादसे के बाद …”
“एक और हादसा हो गया। खुद हादसे के शिकार हो गए।” स्वामी जी ने केस को समझ लिया था।
विभूति मकीन रोती रही थी।
आज शनिवार था। कल्लू स्वामी अनेकानंद को होटल ले जाने के लिए जन कल्याण आश्रम में हाजिर हुआ था।
“कैसे संभालोगे इस व्यापारी को भैया?” कल्लू ने आहिस्ता से आनंद से प्रश्न पूछा था। “निरा पागल लगता है।” कल्लू अपनी राय बता रहा था। “फटी-फटी आंखों से सूनी-सूनी कमरे की दीवारों को देखता रहता है। न कुछ बोलता है न बक्कारता है।” कल्लू ने सूचना दी थी। “बंबई में शोर है, अखबारों में इसकी कहानियां छपी हैं। कोई जानी मानी हस्ती लगता है।” कल्लू चिंतित था। “कहीं भैया ऐसा तो नहीं कि …?”
“देखते हैं।” आनंद का स्वर सपाट था।
आनंद को जब अपने ही प्रश्नों ने लपेटा था तो उसने गुरु के बताए सिद्धांत को ही सही मान लिया था।
“चेहरे को पढ़ने के बाद ही केस समझ आएगा।” सारे प्रश्नों का एक ही उत्तर था। “कयास लगाना हर हाल में गलत होगा।” आनंद ने मान लिया था। “परीक्षा की घड़ी है।” आनंद ने अब माना था। “बट आई हैव नथिंग टू लूज।” आनंद मुसकुराया था।
“मोटा मुर्गा है भैया।” कल्लू ने आनंद को फिर से चेताया था। “गुरु कहते हैं कि …”
“ठीक से काटेंगे इस मुर्गे को कल्लू।” आनंद हंस पड़ा था।
होटल माधव मानस इंटरनेशनल में भरी भीड़ का ठिकाना न था।
“मोहन मकीन का केस … स्वामी जी?” प्रेस के आदमी ने आते ही प्रश्न पूछा था।
“अभी केस देखा नहीं है।” स्वामी अनेकानंद ने संयत स्वर में उत्तर दिया था।
“कब देखेंगे?” दूसरा प्रश्न दूसरे प्रेस रिपोर्टर ने किया था।
“आज उन्हें उनके कमरे में ही देखेंगे।” स्वामी जी ने सूचना दी थी। “निपट एकांत में निरीक्षण करेंगे।” उनका खुलासा था कि वहां अन्य किसी को आने नहीं दिया जाएगा।
प्रेस और रिपोर्टर्स को घोर निराशा हुई थी। उनके लिए तो आज की यही सबसे बड़ी खबर थी। प्रेस में मोहन मकीन का केस छाया हुआ था। अमेरिका में जा कर जो कारनामे मोहन मकीन ने किए थे – असाधारण थे और अब जब वो अजीबोगरीब हालत में भारत लौटे थे तो कहानियां तो बनती थीं।
स्वामी अनेकानंद लंच लेने के बाद मोहन मकीन को देखने उनके कमरे में पहुंचे थे।
वो अकेले ही कमरे में गए थे। उनको आते देख मोहन मकीन सिहर उठे थे। एक संन्यासी को उन्होंने जैसे पहली बाद देखा हो, ऐसा लगा था। किसी भारतीय को देखना आज अचानक उन्हें अच्छा लगा हो – ऐसा प्रतीत हुआ था।
स्वामी अनेकानंद और मोहन मकीन की निगाहें मिली थीं।
स्वामी अनेकानंद के अनुमान के अनुसार ही मोहन मकीन ने प्रतिक्रिया दी थी। उसने स्वामी अनेकानंद को न तो प्रणाम किया था और न ही उनका स्वागत किया था। हां। उसने उनकी निगाहों का मुकाबला जरूर किया था।
एक लंबे अंतराल के बाद मोहन मकीन ने पलकें झपकी थीं।
स्वामी अनेकानंद ने तब अपने नेत्र बंद कर उस पल को अपने भीतर कैद कर लिया था।
स्वामी अनेकानंद बिना कोई संवाद बोले चुपचाप ही कमरे से लौट आए थे।
विभूति मकीन के प्रश्न तो थे लेकिन स्वामी जी ने उनके उत्तर नहीं दिए थे।

मेजर कृपाल वर्मा रिटायर्ड