आनंद अलसुबह जग कर बगीचे में टहलता-टहलता फूलों से शिकायत कर रहा था कि वो अपनी मुस्कुराहटें उसके साथ नहीं बांटते थे।

“आइए आनंद बाबू।” अचानक राम लाल ने उसे पुकारा था।

आनंद चौंका था। उसने निगाहें पसार कर देखा था। राम लाल लॉन में बैठा था। उसके लिए भी खाली कुर्सी पड़ी थी। मेज पर चाय लगी थी। आनंद आ कर कुर्सी पर बैठ गया था।

“कैसी नींद आई?” राम लाल ने पूछा था।

“कहां। रात भर करवटें बदलता रहा।”

“क्यों?”

“मां। मां की याद आती रही। अकेली है। विधवा है। एक छोटा भाई है। पैसे ..” आनंद कहते-कहते रुक गया था। “रोज बाट जोह रही होगी .. रोज .. रोज ..” उसका गला भर आया था। “और मैं .. निकम्मा ..” वह रोने-रोने को था।

“जादू आता है आपको?”

“कौन सा जादू?”

“पैसे बनाने का जादू?” राम लाल ने प्रश्न को चतुराई से आनंद के सामने रख दिया था।

“वही तो नहीं आता।” दोनों हाथ झाड़ कर बोला था आनंद। “अगर ..”

“अच्छा, आप मेरे चरण स्पर्श करें।” राम लाल ने आदेश दिया था।

कुछ सोचा था आनंद ने। लेकिन फिर उसने बड़ी ही श्रद्धा के साथ राम लाल के पैर छूए थे। राम लाल ने हंस कर कहा था, “कल्याण हो।” और एक गणेश जी छोटी सी प्रतिमा उसकी हथेली पर रख दी थी। “प्रभु प्रसन्न हैं आप पर।” राम लाल कह रहा था। “वारे के न्यारे।” उसने आनंद की आंखों में देखा था।

“मैं .. मैं कुछ समझा नहीं राम लाल जी।” आनंद चकरा गया था।

“लेकिन यही गणेश जी की प्रतिमा आप को कोई साधू देता तो आप अब तक उसके चरणों में बिछ गए होते। और एक छोटी मोटी दक्षिणा भी उसे देते।” उसने फिर से आनंद को देखा था। “है न?”

“हां-हां। ये बात तो सच है।”

“आनंद बाबू। हम सब यही खेल खेल रहे हैं। हम सब आनंद और राम लाल हैं।” वह हंसा था। “हम सब अचानक किसी चमत्कार के तहत धनी-मानी बन जाना चाहते हैं। हम सब चाहते हैं कि प्रभु ही हमारा हर काम करे।” उसने आनंद की आंखों में सीधा देखा था। “जबकि हमें न कोई काम आता है, न हम कोई हुनर जानते हैं और न हम ..” रुका था राम लाल।

आनंद का चेहरा आरक्त हो गया था। उसे अकर्मण्य होने की शर्म चढ़ने लगी थी। उसे लगा था कि राम लाल उसमें जूते मार रहा था।

“मेरा भी हाल यही था – जो आज आपका है।” राम लाल बताने लगा था। “एक साधु की शरण में मैंने भी अपनी मंजिल खोजी थी। वह यही गणेश, हनुमान जी और लक्ष्मी जी की मूर्तियां देता था। आशीर्वाद देता था और अपने लिए भी कुछ कमा लेता था। फिर जब मैं साथ आया तो उसने मुझे इस्तेमाल किया और मैं भी मूर्तियां श्रद्धालुओं को देने लगा। कमाल हुआ। चूंकि मैं बालक था – लोग मुझसे प्रभावित हो जाते और गुरु जी उनसे अच्छा दान ठग लेते।” हंसा था राम लाल।

“फिर ..”

“फिर उनका निधन हो गया और मैं भी बालक से बड़ा हो गया।” वह मुसकुराया था। “बस, आ गया मैं सड़क पर।”

उठ गया था राम लाल। रिक्शा भी आ गया था और उनके जाने का वक्त उनके सामने आ खड़ा हुआ था। लेकिन आनंद आज बहुत दुखी था। वह समझ न पा रहा था कि राम लाल चाहता क्या था?

“भागो ..!” आनंद के मन ने कहा था। “जाल है।” उसे चेतावनी मिली थी। “ये जादूगर .. ये राम लाल ..?”

“जाओगे कहां मित्र?” मन ने ही पूछा था। “दो वक्त की मिल तो रही है। लेकिन ..”

हां। भागने के बाद तो आगे बियाबान ही था।

“आनंद को देख कर ग्राहक ठहर जाता है।” कल्लू आनंद को बता रहा था। “आप कोई परम पुरुष जैसे लगते हैं।” उसका कहना था।

लेकिन आनंद उदास निराश आंखों से पूरे दिन चिड़िया को ही देखता रहा था .. देखता ही रहा था कि सच में ही पूरा देश आनंद और राम लाल ही था। हर किसी को किसी चमत्कार के होने का इंतजार था।

मेजर कृपाल वर्मा रिटायर्ड

मेजर कृपाल वर्मा रिटायर्ड

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