गहरी नींद लेकर आनंद अलसुबह ही जग गया था।
उसने महसूसा था कि इतनी गहरी नींद वो शायद ही आज तक सोया हो। क्यों था ऐसा? अचानक उसे उत्तर मिला था – एक चाय वाला। उसकी कोठी। उसकी आमदनी। भीतर का डर – भूखों मरने का भय और पूरी उम्र बेकार बनकर सड़कों पर घूमने की जहालत से उसे मुक्ति मिल गई थी।
फिर वह मुक्त भाव से पूरे बगीचे में घूमा था। उसने छू-छू कर सारे फूलों से बातें की थीं और उनकी खैरियत भी पूछी थी। और पूछा था कि फूलों की सुगंध कहां थी? सुंदर तो थे वो पर निर्गंध क्यों थे? तो फूलों ने मालिक की ओर इशारा कर दिया था। उत्तर मालिक को ही आता था – फूलों को नहीं। उन्हें तो मात्र खिलने खेलने के आदेश थे।
राम लाल बंगले से बाहर आया था। छोकरे ने दो कुर्सियां ला कर लॉन में डाल दी थीं। राम लाल बैठा था। फिर उसने आनंद को इशारे से बुला कर आनंद को भी बैठने को कहा था। आनंद ने आभार व्यक्त किया था और नमस्कार भी की थी। फिर उसने राम लाल के संयत चेहरे को पढ़ा था। वह तटस्थ था।
“इन फूलों में सुगंध तो है ही नहीं?” आनंद ने राम लाल को अप्रत्याशित प्रश्न पूछा था।
“इसलिए कि हमारे भीतर की सुगंध जाती रही है, आनंद बाबू।” टीस कर राम लाल ने कहा था। “हम तो निरी दुर्गंध से भरे हैं।” उसने कटु सत्य उगला था। “अपना-अपना ईमान बेचकर पैसों के पीछे डंडा लेकर भाग रहे हैं।” वह गंभीर था।
आनंद चुप था। प्रसन्न भी था। उसने तो अभी तक वैसा कोई अपराध किया ही नहीं था। राम लाल तो दूसरों की कहानी कह रहा था।
तभी रिक्शा आया था और बच्चों को लेकर स्कूल चला गया था।
“चलेंगे आज ..?” राम लाल ने उठते हुए आनंद से पूछा था। “अगर मन है तो तैयार हो लें।” उसने आग्रह किया था और चला गया था।
आनंद कुछ भी न समझ पाया था। पर वह राम लाल के साथ जाने से मना भी न कर पाया था। उसके पास कहीं और जाने का रास्ता था कब?
कल्लू ने दौड़ कर आनंद को झपटा था और ले जा कर पक्के फुटपाथ पर बिठा दिया था। कदम अपनी चिड़िया को लेकर रोज की तरह बैठा था। उसने भी आनंद को देखा था और हंस गया था। ग्राहकों का आना जाना लगा था तो लगा ही रहा था। न जाने क्यों उस दिन कदम की चिड़िया भी थकान महसूस करने लगी थी। जम कर प्रश्न कर्ता आए थे। सब ने कदम के पास बैठे आनंद को अवश्य ही निहारा था। आनंद एक सहज मुस्कान चेहरे पर धरे अनन्य भाव से बैठा रहा था।
कल्लू के साथ चाय पीने के बाद आनंद का मन हुआ था कि तनिक बाजार में टहल आए।
“नहीं-नहीं। ये कमाई का टैम है।” कल्लू ने उसे सचेत किया था। “गुरु बिगड़ जाएंगे।” उसका कहना था।
वह बैठा रहा था। वह सोचता रहा था और अनुमान लगाता रहा था कि लोगों के पास प्रश्न ही प्रश्न हैं, उत्तर तो केवल चिड़िया के पास ही हैं।
“गुरु, कमाल हो गया आज तो।” कल्लू चुपके से राम लाल को बता रहा था। “आज जितना ग्राहक तो कभी जिनगी में नहीं पड़ा।” उसने गुरु की आंखों को पढ़ा था। “इसका तो .. कोई कमाल ..”
“देखता जा कल्लू। अगर बात बनी तो तू फिर देखना इस का कमाल।” वह तनिक सा हंसा था। “मैं यही तो देखना चाहता था कि इसमें कशिश है कितनी?”
“ग्राहक नहीं उठता इसे देख कर गुरु।” कल्लू ने भी बात की पुष्टि की थी।
“तभी तो ..” राम लाल भी हंस पड़ा था।
और फिर आनंद और राम लाल रिक्शे में बैठ घर लौट आए थे।

मेजर कृपाल वर्मा रिटायर्ड