कालू के कुर्ते पाजामे पहन राम चरन बहुत आकर्षक लग रहा था।

एक बारगी पंडित कमल किशोर उसे पहचान ही न पाए थे। लेकिन समझ आने के बाद उन्हें उस पर लाढ़ उमड़ आया था। वह लौट आया था और अब पंडित जी की आस थी कि आज फिर मंदिर में कल जैसा ही कोई चमत्कार होगा और ..

“चाय पी लो!” पंडित जी ने राम चरन से आग्रह किया था।

अचानक ही पंडित जी ने देखा था कि सैलानियों का एक बहुत बड़ा टोल मंदिर में प्रवेश कर रहा था। युवक थे, वयस्क थे, पुरुष थे, नारियां थीं और वो सब के सब किसी संस्था से जुड़े थे। राम चरन की समझ में चाय पीते-पीते सब समा गया था। ये वही सैलानियों का टोल था जिसने आज कालू को निहाल कर दिया था और अब मंदिर की बारी थी।

कुछ लोग ढोलू शिव के मंदिर को देख-देख कर खुश हो रहे थे और उसके चित्र उतार रहे थे, तो कुछ बावली में जा घुसे थे और उसके शिल्प की प्रशंसा कर रहे थे। बगीचे में भी कुछ हारे थके लोग शीतल छाया का आनंद ले रहे थे तो कुछ पंडित कमल किशोर के साथ आकर उलझ गए थे।

“ढोलू शिव क्यों कहते हैं इन्हें?” एक युवती ने प्रश्न पूछा था।

“मंदिर ढोलू सराय में स्थित है और ये सराय ढोलू वंश के राजाओं ने बनाई थी अतः यह उन्हीं के वंश की निशानी है।” पंडित कमल किशोर ने संक्षेप में उत्तर दिया था।

“शिव को क्यों पूजते हैं?” एक युवक ने पूछा था।

“शिव भोले हैं। शिव उदार हैं। शिव उपासना से प्रसन्न हो जाते हैं। मनोकामनाओं की सिद्धि से उपासक शिव की शरण में आ जाते हैं।” पंडित जी बताते रहे थे।

“मुगलों ने तो मूर्ति पूजा का खंडन किया था। मंदिर तोड़े थे और ..”

“लेकिन हुआ कब?” पंडित जी तनिक मुसकुराए थे।

“तो क्या मूर्ति पूजा पाखंड नहीं है?” इस बार प्रश्न एक बुजुर्ग ने किया था। कोई विद्वान थे।

“नहीं!” पंडित कमल किशोर का स्पष्ट उत्तर था। “महत्वपूर्ण प्रश्न है भक्त का। असाध्य कौन है? सगुण ब्रह्म है या निर्गुण ब्रह्म? निर्गुण को पाने का मार्ग दर्शन है और सगुण को पाने का मार्ग है – प्रकृति। पहला मार्ग असाध्य है तो दूसरा बहुत सरल है – शिव की भक्ति है!”

“कैसे?” बीच में एक और सज्जन बोल पड़े थे।

“एकलव्य को गुरु ने शिक्षा देने से मना कर दिया था तो उसने गुरु की प्रतिमा बनाई थी और सिद्धि प्राप्त कर ली थी।” पंडित जी ने जमा सभी लोगों को देखा था। “भगवान को या कि ब्रह्म को हम साकार नहीं देख सकते। लेकिन उसके प्रतीक को हम प्राप्त कर सकते हैं – एकलव्य की तरह और ..”

“ठीक बात है पंडित जी!” एक महिला ने हामी भरी थी। “भक्ति मार्ग बहुत सहज है – हमारे लिए!”

सभी लोग पंडित जी के बताए व्यवहारिक भक्ति मार्ग से सहमत हुए लगे थे।

“इस्लाम के बारे में आपकी क्या राय है पंडित जी?” एक युवक का प्रश्न था।

तनिक सी असहजता लोगों के बीच उग आई थी। हिन्दू मुसलमान का बजता ढोल अचानक ही खड़क गया था। लेकिन पंडित जी सहज थे। उन्हें प्रश्न भी बुरा न लगा था।

“इस्लाम का कॉनसेप्ट बुरा नहीं है – पर बड़ा नहीं है।” पंडित जी ने सहज स्वभाव में ही उत्तर दिया था।

“जबकि सनातन की व्याख्या करें तो – वसुधैव कुटम्बकम पर जाकर ही रुकता है।” उनका कहना था। एक सहमति मिली थी पंडित जी को। बात सभी को भा गई थी।

भीड़ जा रही थी। सबने पंडित जी के चरण स्पर्श कर आशीर्वाद प्राप्त किया था और श्रद्धा समान अनुदान दिया था।

पंडित जी रिक्शे में बैठ कर घर लौट रहे थे। वो महा प्रसन्न थे। आज तो कल से भी बड़ा चमत्कार हुआ था।

लेकिन विदा करते राम चरन के चेहरे पर पंडित जी को कल का सा उत्साह नजर न आया था।

मेजर कृपाल वर्मा रिटायर्ड

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