रात ढलती आ रही थी। आसमान पर चांद उग आया था। चंद्रप्रभा में नाचती चांद की तस्वीर हम दोनों से ठिठोली कर रही थी। ज्यों-ज्यों जीवन के रहस्य हमारे सामने उजागर हो रहे थे त्यों-त्यों हम दोनों बौखलाते जा रहे थे।
झींगुरों के स्वर वेद मंत्रों की तरह हमें सांत्वना देने में सहयोग कर रहे थे। कभी-कभार चंद्रप्रभा में टर्रा कर कूद जाता मेंढक हमारी की गलतियों पर नाराज हुआ लगता था। पवन के शीतल झकोरे हमें जीने का आशीर्वाद दे रहे थे। जंगल हमारी कहानी कान दे कर सुन रहा था।
“कचौड़ियों का धंधा नहीं चला था – तो दिशाहीन हो गया था परिवार!” गुलनार ने कहानी का अगला सूत्र पकड़ा था। “मैंने सोचा – घर खरीद लूँ। लेकिन बबलू नहीं माना था। उसे जिद थी कि पहले हम आमदनी का जरिया लगाएं और तब घर-बार बसाएंगे।”
“बात तो ठीक थी।” स्वामी जी ने समर्थन किया था बबलू का।
“हां! लेकिन फिर बबलू ने अपने मालिक की लड़की से शादी कर ली थी।”
“चंचल था – बबलू!” स्वामी जी विहंसे थे।
“सुमेर को सिनेमा देखने का चस्का लग गया था, तो समीर आवारागर्दी करने लगा था। छोटा लालू किसी काम का न था। मैं बेटों को लेकर झींकने लगी थी।”
गुलनार चुप थी। स्वामी जी भी चुप थे। उन दोनों के सामने उन के चारों बेटे अपना-अपना करतब दिखा रहे थे।
“एक दिन अचानक सुधीर बंबई भाग गया!” गुलनार ने धीमे से कहना आरंभ किया था। “मैंने जब अपने खजाने को टटोला तो वो गायब था। सुधीर सारा पैसा लेकर भागा था।” गुलनार की आवाज टूट गई थी। वह चुप हो गई थी।
स्वामी जी भी सुधीर की की हिमाकत पर क्षोभ से भर आए थे। यों परिवार का पैसा ले कर उड़ जाना उन्हें भला न लगा था।
“सुधीर यों नालायक निकलेगा – मैं तो कभी सोच भी न सकता था।” स्वामी जी ने अफसोस के साथ कहा था।
“इसके बाद तो मैं आपा खो बैठी थी। बहुत नर्वस हो गई थी। क्या करती?” गुलनार ने स्वामी जी को आंखों में भर कर देखा था। “तब मुझे एहसास हुआ था कि अब तुम्हारी मौत का श्राप सामने आएगा! परिवार बसेगा नहीं! उजड़ कर रहेगा। सब मिट जाएगा। अपराध अंजाने में ही उग आते हैं – मैंने महसूस किया था। अब मेरा भी बुरा वक्त आएगा – मैं ताड़ गई थी।”
गुलनार गंभीर थी। स्वामी जी भी हिल गए थे। रंगीन सपने जब बिखरने लगते हैं तो बेहद कष्ट होता है। संतान का दिया सुख और दुख दोनों ही अपने कर्मों की प्राप्ति होते हैं। जो जैसा करता है – वैसा ही भरता है।
“सुधीर के भाग जाने के बाद बबलू भी बेरहम हो गया था।” गुलनार की आवाज में वेदना भरी थी। “जोरू का गुलाम था बबलू!” गुलनार ने सीधे-सीधे आरोप लगाया था। “जो उसकी बहू कहती वही सच था। मैं जबान खोलती तो मुझे धमका देता।” रुआंसी हो आई थी गुलनार।
“कारण ..?” स्वामी जी ने आहिस्ता से पूछा था।
“आमदनी कम थी बबलू की और खर्चे ज्यादा थे। मेरे पास तो कुछ बचा न था। सारा बोझ भार बबलू के ऊपर आ गया था।”
“फिर ..?” स्वामी जी ने सचेत होते हुए पूछा था।
“उसकी बहू बिगड़ी थी। बोली – ये खा-खा कर सिलमदरा हो गई है। दो घरों का काम संभाल लेगी तो पैसे आएंगे। पड़ी-पड़ी माटी खराब हो गई है इसकी! और उन दोनों की सहमति से मैं पड़ोस के दो घरों में काम करने लगी थी। तुमने तो मुझे रानी बना कर रक्खा था! तुम्हारे राज में तो मैं गुलनार थी – परी परिंदों सी कोई महारानी थी जिसका संसार था लेकिन अब ..? औरों के कपड़े धोना, उनके मैल माखर धोना, झाड़ू पोंछा ..! उफ! मेरी नाक सड़ जाती तो मुंह पर साड़ी के पल्लू का ढाटा बांध लेती!”
“और पैसे ..?”
“बबलू की बहू ले लेती! मुझे हाथ हथेली कुछ न लगता!”
“फिर ..?”
“मैं बीमार पड़ गई थी।” गुलनार रो रही थी।
गुलनार के आंसू पोंछने उठा स्वामी जी का हाथ हवा में ठहर गया था।
अपने जीने की राह से स्वामी जी भटकना न चाहते थे।

मेजर कृपाल वर्मा रिटायर्ड