प्रवहमान चंद्रप्रभा को देखते ही मेरे जेहन में कामातुर नदियां बह निकलती हैं।

मैं हूँ। गुलनार है। दोनों निर्वस्त्र हुए नदी की स्वच्छ जलधारा में तैर रहे हैं – किलोंलें कर रहे हैं। गुलनार हंस रही है। मेरा मन फूला नहीं समा रहा है। मैं झपटा हूँ और मैंने गुलनार को पकड़ लिया है। गुलनार ने विरोध नहीं किया है। वह भी मुझसे लाजवंती की लता की तरह लिपट गई है। हमारे गरमाते-भरमाते शरीर शीतल पानी का आनंद उठा रहे हैं। हम दोनों किसी प्रेम लोक के आजन्म पुजारी हैं। हम ही सच हैं .. और हम ही शाश्वत हैं।

“फिजूल है ये वैराग्य!” अचानक मेरे दिमाग में विचार आया है। “ढोंग है ये स्वामी जी होना और लोगों को आशीर्वाद देकर मूर्ख बनाना। सच तो वही संसार है जहां प्रेम है, लगाव है ओर जुड़ाव है। अपना रचित संसार ही सही सुख देता है। यहां – इस आश्रम में एक खैराती की तरह यों पड़े रहना ..”

मैं अब अंतिम सीढ़ी तक उतर आया हूँ।

सीढ़ी पर बैठ कर मैंने अपने पैर चंद्रप्रभा के शीतल जल में डुबो दिए हैं। अजीब सी आनंदानुभूति हुई है। शीतल जल के मात्र स्पर्श से मेरे शरीर में एक अद्भुत सिहरन भर गई है। कहीं लगा है कि मुझपर वासनाओं का चढ़ा बुखार कम हुआ है। मेरा विवेक लौट आया है। एक बड़ा सुकून मिला है। लेकिन अपने पास बुलाती गुलनार का तिलिस्म अभी भी टूटा नहीं है।

“गुलनार और उसके बेटों ने ही तो नदी में फेंका था, तुम्हें पीतू!” आवाज पीपल दास की है – मैं पहचान गया हूँ। “गुलनार खुश थी। तुम्हारा परिवार भी खुश था। तुम्हें चाहता कौन था? और अब अगर लौटोगे भी तो .. क्या ..?”

मैं तनिक सा सहम गया हूँ। आज बड़े दिन के बाद बोले हैं पीपल दास। मैं इनकी अनुकंपा और मिले आश्रय का आज तक आभारी हूँ। पीपल दास दिव्य लोक के निवासी हैं। इन्हें सब ज्ञान है। ये सदा सच बोलते हैं।

अब मुझे एक शर्म चढ़ गई है। मेरी जबान अटक गई है। मुझे एहसास हुआ है कि मैं अपनी त्याग तपस्या को भूल विषय वासनाओं के दलदल में जा भटका था। अब .. अब क्या उत्तर दूँ पीपल दास को?

“मैं .. मैं तो मरना चाहता हूँ, पीपल दास!” मैंने रुआंसी आवाज में कहा है।

“लेकिन क्यों?”

अब क्या उत्तर दूँ? मुझे कष्ट तो कोई है ही नहीं। मैं तो मुक्त हूँ, मस्त हूँ और स्वस्थ हूँ। मैं तो स्वामी हूँ, पूज्य हूँ और परमात्मा हूँ। फिर मैं क्यों मरूं? गुलनार …

“गुलनार ..” मैं डरते डरते बोला हूँ। मैं पीपल दास से गुलनार का पता पूछना चाहता हूँ।

“माया है . गुलनार!” पीपल दास ने सौम्य स्वर में कहा है। “गुलनार भी प्रभु की ही माया है। वो ही भेजते हैं अपनी माया को ठगने के लिए!” तनिक हंस गए हैं पीपल दास। “और तुम आ गए इस माया के लपेटे में! लेकिन क्यों?” वो मुझसे पूछ रहे हैं। “क्या क्या लोगे प्रभु से पीतू? जिसे माया दर्शन देती है – वही मारा जाता है। अच्छे अच्छे ऋषि मुनि तक ..”

मैं चुप हूँ। पीपल दास ने मुझे हिला सा दिया है। अब एक अनूठा आनंद है जो मेरे पास आ बैठा है। शनै शनै वासनाओं का ज्वर उतरने लगा है। अफसोस लौटा है सबसे पहले। फिर शर्म चढ़ आई है और अंत में पश्चाताप आया है।

“मैं बावला हो गया था पीपल दास जी।” कठिनाई से बोल पाया हूँ – मैं।

“होता है! ऐसा ही होता है पीतू! बड़ी प्रबल है ये प्रभु की माया!”

“गलती तो हो गई पीपल दास जी! अब ..?”

“प्रभु अपने भक्तों को कभी नहीं भूलते! तुमसे तो बहुत प्यार करते हैं, प्रभु। तभी तो ईश्वर हैं और तुम मनुष्य – टुच्चे, स्वार्थी और निर्लज्ज!”

मैं शर्मसार हुआ बैठा ही रहा हूँ!

अब मैं अकेला हूँ। अब मेरा विवेक मेरे पास लौट आया है। अब मैं निर्विकार हूँ। मैं अब प्रभु की शरण में लौट आया हूँ।

प्रभु का भक्त मैं अब उन्हीं का नाम ले ले कर ऊपर कुटिया तक जाती सीढ़ियों को चढ़ रहा हूँ . एक के बाद एक और ..

यही भक्ति मार्ग है – यही मेरा मार्ग है!

मेजर कृपाल वर्मा

Discover more from Praneta Publications Pvt. Ltd.

Subscribe now to keep reading and get access to the full archive.

Continue reading