तू .. तू तो बनेगा प्रधान मंत्री – दी पी एम ऑफ इंडिया अब गुल्लू भाई हुए! तुम्हें देखते ही मैंने अनुमान लगा लिया था गुल्लू कि तेरा चेहरा मोहरा बिल्कुल फिट बैठता है पी एम के खाके में! भारत का प्रधान मंत्री – एक महा दलित, किराए की झुग्गी में रहता .. और ..
“हमारी क्या जरूरत है बाबू भैया!” गुल्लू हंस कर बोला है। “बच ही गये मोदी जी!” वह प्रसन्न है। “नहीं तो ये कनास तो उनकी जान लेने पर ही तुले हुए थे।”
“अब तुम तैयारी करो गुल्लू पी एम बनने की। मुझे उम्मीद है कि तुम ..”
“पन बाबू भैया ..?”
“नहीं रे नहीं बाबू भैया नहीं! हम शेखर हैं। शेखर शक्तिमान कह सकते हो। और हमारा काम है पी एम प्रोड्यूस करना। मोदी के बाद कौन बनेगा पी एम उसका उत्तर है – गुल्लू, माने कि तुम। मैंने देख लिया है गुल्लू कि तुम्हारी प्रोफाइल भावी प्रधान मंत्री के सपने को साकार करती है!”
“मजाक मत करो – वो क्या कहें शक्तिमान भैया! जब ये बेईमान मोदी जैसे महान मानस की खाल खींच रहे हैं तो हम तो भुनी मोठ हैं इनके लिए! हमें तो मिनट में मार डालेंगे – जल्लाद!”
“मरने से मत डरो गुल्लू! एक न एक दिन तो तुम मरोगे ही ..”
“पन सुख से मरेंगे शक्तिमान जी। चार गज की किराए की झुग्गी में टांगें फैलाकर सोते हैं। हमें कोई गम गायला नहीं! बच्चे पढ़ते हैं, औरत काम करती है और हम भी ..”
“पी एम बनते ही तुम्हारे ठाट बाट हो जाएंगे गुल्लू! दुनिया देखेगी कि किस तरह रैग्स टू रिचिज उनके सामने घटा है और इसे हमने कर दिखाया है।”
“कैसे ..? कैसे कर दिखाएंगे? हमारे पास तो फूटी कौड़ी नहीं शक्तिमान जी! आप बेकार बखत मत गंवाओ हमसे कुछ प्राप्त होने वाला नहीं है।”
“तुम से मांग कौन रहा है? हाहाहा! अरे, एक बार तुम्हारा नाम अलंकार में छप जाए तो धन की तो वर्षा होगी! मैं तुम्हारा एक लाइफ साइज का फोटो लिव मैगजीन में भी छपवाऊंगा और साथ में होगी तुम्हारी कहानी – झुग्गी में घटती एक कहानी और देश हित में जाती तुम्हारी जवानी! फिर देखना गुल्लू कैसा चमत्कार होता है!”
“फिन वो क्या कहते हैं – चुनाव भी होगा? पन कैसे होगा! हमसे तो बोला ही नहीं जाता! हमें तो अंग्रेजी तो छोड़ो – हिन्दी में कहना कुछ नहीं आता!”
“यही तो बड़ी बात है गुल्लू! आज कोई जरूरत ही नहीं बोलने बक्कारने की। बस खड़े हो जाओ बिना मुंह धोए और बोली हिन्दी टूटी फटी! आज का यही फैशन है गुल्लू। एक दो अंग्रेजी का जुमला हम सिखा देंगे – बस! लोग ही नहीं देश विदेश भी मर मिटेगा तुम्हारी इस अदाकारी पर!”
“और ऊ चुनाव का खर्चा ..?”
“कराएंगे ही नहीं चुनाव! क्यों कराएं चुनाव? हमारे पास तकनीक है गुल्लू कि तुम सीधे पी एम बनोगे। मन मोहन कौन से चुनाव लड़े थे? हमने भी यही तकनीक ईजाद की है कि बैठो सीधे पी एम की कुर्सी पर!”
“फिर ये जो डोल रहे हैं भागे भागे – गप्पू पप्पू, मांजी बहिन जी और ग्वाले लाले – इन्हें ही बना दो न?”
“नहीं बन सकते! ये नहीं बन सकते – इस जिंदगी में! पब्लिक अपील तो है ही नहीं! पैसे वाली पार्टियां पब्लिक को नहीं चाहिये! उन्हें चाहिये समथिंग – एक दम मिट्टी से उठ कर आये कोई मातृ भूमि का लाल गुलाल! पसीने की गंध में डूबा, बिन नहाया, दाढ़ी भी बढ़ी हो और सर के बाल भी छितर-बितर हों! आंखें पनीली, बुझी बुझी सी हों – दरारों जैसी! तुम इसमें बेहद फिट बैठते हो गुल्लू!”
“अरे बाबू! ये सब हमारे बस का नाहीं!”
“लेकिन हमारे बस का तो है। हम तो तुम्हारे नाम पर ही पूरी कैबिनेट खड़ी कर देंगे!”
“वो कैसे शक्तिमान जी?”
“जब तुम पी एम होगे तो तुम्हें मंत्री भी चाहिये, मिनिस्टर भी चाहिये, सी एम भी चाहिये! सब आ जाएगा। साथ में ये धन भी लाएंगे ओर वोट भी लेकर आएंगे! हमने इन्हें इनका हक दे देना है ..”
“वो कौन सा हक?”
“खाने कमाने का हक! न खाऊंगा न खाने दूंगा की जगह आप ने कहना है कमाओ और खाओ! कौन बुरा है बोलो?”
“ये ससुर तो सब लूट खाएंगे शक्तिमान जी!”
“तो आप का क्या लूटेंगे? आप की तो झुग्गी भी किराए की है। और जो हम से मिलेगा वो तो ..”
“तो आप क्या लेंगे?”
“हम .. हम क्या लेंगे? हाहाहा! बस गुल्लू भैया तुमने यही नहीं पूछना कि हम क्या लेंगे?”
