बिच्छू की तरह डंक मारते मन को मैंने बड़ी सावधानी से पकड़ा है।
गुलनार को देखते ही बमक गया था – मेरा मन। अचानक ही मैं माया मोह के महासागर में गोते खाने लगा था। विगत ने हाथ के इशारे से मुझे पास बुला लिया था और बिठा लिया था। फिर गुलनार भी मेरे पास आ बैठी थी।
बेटे का जन्म हुआ था तो मैंने गुलनार की आंखों में झांका था। गर्व था उन आंखों में – बेटे को जन्म देने का। गुलनार का बेटा कुछ भी बनेगा की सभी संभावनाएं सही थीं। मैं भी सोच रहा था कि मेरा बेटा अवश्य ही नाम कमाएगा और मैं उसके नख शिख को पढ़ने और पहचानने का प्रयत्न कर रहा था। जैसे वो दर्पण था – और मैं उसमें अपना ही चेहरा देख रहा था। अब मैं पहचानने का प्रयत्न कर रहा था कि क्या ये मैं ही हूँ?
बधाइयां बजी थीं। हमने जश्न मनाया था। हमने खुशियों को बांटा था और कहा था – ये हमारा बेटा है लोगों। देखना आप लोग – देखना कि ये हमारा बेटा भविष्य को नापेगा और हमारा नाम रोशन करेगा।
लेकिन भविष्य हम पर हंस रहा था। क्योंकि उसे तो सब पता था – अज्ञानी तो हम ही थे।
हमने कंधे से कंधा मिला कर एक साम्राज्य जैसा ही खड़ा कर लिया था। गुलनार को अपने चार बेटों पर गर्व था। गुलनार की मुट्ठी भी गर्म थी। गुलनार ने नाम और नामा खूब कमाया था। मैं तो था ही नींव का पत्थर और मुझे तो रहना ही अंधकार में था। इसलिए मुझे भी कोई एतराज न था। मैं तो अब गुलनार के लिए ही जी रहा था। मैं तो गुलनार के किये एहसान के तले दबा दबा उसी के लिए लड़ रहा था।
लेकिन वो दिन भी आया जब गुलनार ने मुझ नींव के पत्थर को निकाल कर नदी में फेंक दिया था।
गुलनार को अपने चार बेटों पर घमंड था। गुलनार के पास मोटा धन था और धन कमाने की सामर्थ्य भी थी। गुलनार के लिए मैं अब कुछ रहा नहीं था। शराब में डूबा डूबा मैं न जाने कब उसके लिए हेय हो गया था। मुझे तो पता ही नहीं चला था कि गुलनार ने ..
लेकिन आज मुझे गुलनार को यों आश्रम के बर्तन घिसते देख अच्छा नहीं लगा।
सच मानिये कि मैंने कभी गुलनार को कोई दुख नहीं दिया। मैंने तो गुलनार को एक कोमल फूल की तरह हमेशा ही हथेली पर रक्खा। मैंने उसे बेहद प्यार दिया, सहारा दिया, इज्जत दी और उसके लिए खूब पसीना बहाया। मैंने उसके वैभव को खूब खूब सराहा था और ..
“हुआ क्या?” मैं भी अब स्वयं से प्रश्न पूछ रहा हूँ। “चारों बेटों में से कोई नहीं लौटा?” मैं जानना चाहता हूँ। “लेकिन क्यों?” मैं समझ ही न पा रहा हूँ। “क्या आश्रम के बर्तन घिसना ही गुलनार की नियति थी? हे प्रभु! मेरी गुलनार ..”
“नींव के पत्थर को निकाल कर नदी में फेंकना ही इसका अपराध है।” आवाज आ रही है। “गिरना ही था – इसका महल।”
भला बुरा कैसे होता रहता है – हम समझ ही नहीं पाते।
बुरा करने चलते हैं – तो भला हो जाता है। और जब मन प्राण से भी किसी का भला करने का प्रयत्न करते हैं – तो बुरा हो जाता है। गुलनार की नियति मेरा योगदान तो जरूर है – पर मैं उसे जानता कब था?
जीने की राहें बनती बिगड़ती रहती हैं लेकिन हमें पता कब चलता है?
