“राधा रमण हरि गोविंद जय जय!” कीर्तन अपने चरम पर है। ढोलक पर खूब थाप पड़ रही है। भक्त झूम रहे हैं। सब तल्लीन हो हो कर गा रहे हैं। “गोविंद जय जय बोलो गोपाल जय जय राधा रमण हरि गोविंद जय जय!” मैं भी मन प्राण से आज तल्लीन होकर सुर दे रहा हूँ और सर हिला हिला कर प्रभु का गुण गान कर रहा हूँ!

बड़े दिनों के बाद आज मैं महा प्रसन्न हूँ।

गुलनार को खोजने की लुका छुपी अब समाप्त हो गई है। वह अब कीर्तन में दिखाई नहीं देती। उसकी कोई मरने जीने की खबर भी मेरे पास नहीं है। मैं अब चाहता भी नहीं हूँ कि उस विगत को फिर से छू कर देखूं या कि उसे पास बिठाऊं। अब मुझे संन्यास में ही आनंद आता है। एक सफेद, उज्ज्वल और बेदाग चादर की तरह तन आये अपने जीवन को मैं फिर से क्यों दागी बनाऊं?

मैं तो अब स्वामी पीताम्बर दास हूँ।

मैं मानता हूँ कि औरत प्रकृति की पैदा की मूर्त माया है। उसके आकर्षण अजेय हैं। उसमें सारे संसार की उत्पत्ति निहित है। वह जहां सर्वानंद है वहीं सारे दुखों का मूल भी है। वह जहां परम प्रिया है वहीं जानी दुश्मन भी है। लेकिन मन को ये सब समझाना दुर्घर्श काम है। रमणी को देखते ही मन आपा खो बैठता है और फिर फंस जाता है संसार के माया जाल में।

“स्वामी जी!” बंशी बाबू ने मुझे पुकारा है। कीर्तन समाप्त हो गया है। प्रसाद वितरण भी हो चुका है। “चलकर प्रेम नीड़ की नींव का पत्थर लगा दें तो?” बंशी बाबू का आग्रह है।

हॉं हॉं! प्रेम नीड़ की नींव रखना – मेरे विचार का ही तो समर्थन है। आश्रम में शादी ब्याह हुआ करेंगे। नए नए प्रेम मिलन के प्रसंग आश्रम में और भी प्राण वायु का संचार करेंगे। शुभारम्भ के साथ साथ शुभ कामनाओं की आवृत्ति होगी और अनिष्ट दूर भागेगा।

“चलो चलते हैं!” मैं मान गया हूँ और अब हम प्रेम नीड़ का पत्थर लगाने जा रहे हैं।

शादी भी कैसा विचित्र अवसर है – खोने पाने का! कैसा क्रम है जहां जानकर भी हम अनजान बन जाते हैं, पुराने से नए हो जाते हैं और अपरिचित न रहकर एक अनूठा परिचय प्राप्त करते हैं। खजाने खोजते हैं हम और अनजानी डगर पर चल पड़ते हैं। और देखते देखते एक स्वप्निल संसार अचानक ही खड़ा हो जाता है।

“नहीं नहीं!” मैंने स्वयं से कहा है। “मैंने गुलनार को कहां याद किया है?” मैं अपने आप को बताता हूँ। “वो गुलनार नहीं है – पागल!” मैंने मन को फटकारा है।

“आइये स्वामी जी!” बंशी बाबू ने आग्रह किया है। “इधर से यों इस पत्थर को जमा दें।” उन्होंने बताया है।

लेकिन मेरी निगाहें तो उधर उस बर्तन घिसती औरत पर जा टिकी हैं! गुलनार जैसी है। और लो उसके सर का पल्लू खिसका है तो वो तो गुलनार ही है। उसने पल्लू को साधा है, सीधा किया है और ओढ़ लिया है। तो क्या .. तो क्या ये गुलनार ही है?

“ये क्या कर दिया स्वामी जी?” बंशी बाबू पूछ रहे हैं। “उलटा लगा दिया पत्थर। फिर से .. इस तरह – यों लगाइये।” और मैं अब कुछ नहीं सुन रहा हूँ, कुछ नहीं कर पा रहा हूँ।

“तबीयत ठीक नहीं क्या स्वामी जी?” बंशी बाबू पूछ रहे हैं।

“प .. प .. पानी?” मैंने कठिनाई से कहा है।

पानी पी कर मेरे प्राण लौट आये हैं!

जीने की राह तो न जाने कहां रह गई – मैं तो अब जीने का प्रयत्न कर रहा हूँ!

मेजर कृपाल वर्मा

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