बड़ा बेशर्म होता है – ये मन!

गुलनार से जूते खाने के बाद भी गुलनार से ही चिपका रहता था – ये मेरा मन! गुलनार के सिवा मुझे और कुछ सूझता ही नहीं था। मन बार बार सलाह देता था कि किसी तरह मैं गुलनार को पटा लूँ, मना लूँ, बहका लूँ और फिर उसके अछूते संसार में प्रवेश पा लूँ। वहां जाकर .. वहां पहुंच कर .. फिर मैं ..

भंवरे की तरह मेरा मन फूल सी खिली गुलनार के आस पास ही मंडराता रहता था। जैसे बयार के बहने पर फूल हिलता डुलता है लेकिन भंवरा भी तो बयार पर तैर तैर कर फूल को गीत गा गा कर सुनाता है, रिझाता है और किसी तरह भी उसपर बैठ कर शहद पान करना चाहता है और फिर फूल की सुगंध को समेट कर भाग जाना चाहता है – मैं, पीतू भी वही चाहने लगा था।

और गुलनार ..? मुझे अपने लिए तड़पता देख वह खूब हंसती थी, खूब रिझाती थी, खूब खेल पात बनाती थी लेकिन शादी की शर्त को बरकरार रखते हुए मुझे परिधि के भीतर ही खड़ा रखती थी।

“हम शादी कब करेंगे गुलनार?” मैंने झक मार कर एक दिन उससे पूछ ही लिया था।

“जब तुम कमाने लगोगे पीतू!” गुलनार ने मेरी बलैयां लेते हुए कहा था। “मैं .. मैं .. उस पीतू को दूल्हा बनाऊंगी जो दो रोटी का जुगाड़ बिठा लेगा।” हंस कर कहा था गुलनार ने।

“लेकिन .. लेकिन .. गुलनार ..”

“क्यों? तुम पहले भी तो कमाते थे?” गुलनार ने मुझे याद दिलाया था।

मैं दंग रह गया था। गुलनार कहां से कहां तक सोच जाती थी और मैं पागल, बेवकूफ कुछ भी नहीं सोचता था। मुझे तो गुलनार के सिवा इस दुनिया में और कुछ दिखाई ही नहीं देता था।

और हॉं! ये बात भी शत प्रति शत सच थी कि मुझे गुलनार के सिवा इस भरे पूरे संसार में और कुछ दिखाई ही नहीं देता था।

मरता क्या न करता। मैंने कहा – मन भाई! गुलनार तो तभी मिलेगी जब कमाऊ पूत बन जाओगे!

बहुत भटका था मैं भोजपुर में काम के लिए। खूब मिन्नतें की थीं मैंने लोगों की। कहा था – मुझे कचौड़ियां बनानी आती हैं – वो कचौड़ियां जिन्हें खाकर लोग दीवाने हो जाते हैं। राम मिलन गवाह है – पूछ लो उसे जाकर। लेकिन धक्कों के अलावा मुझे किसी भी सेठ ने, दुकानदार ने ओर साहूकार ने कुछ न दिया था।

इस दौड़ भाग में मैं सूख कर ढांकर हो गया था।

“स्वामी जी! बल्ली न कुछ खा रहा है न पी रहा है!” शंकर बता रहा था। “तीन दिन हो गये आज ..”

“इसका मन बिगड़ गया है शंकर!” मैंने हंस कर कहा है। “कोई मन की अधूरी चाह है जिसके लिए उसकी जिद है कि ..”

“फिर क्या होगा?”

“मन को तो मनाना ही होगा शंकर!” मैंने उपाय बताया है।

मन के मानने पर ही जिंदगी चलती है – मैं तो ये खूब जानता हूँ!

मेजर कृपाल वर्मा
मेजर कृपाल वर्मा

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