
मेरा ठेंगा ……!!
कहानी – दूसरी किश्त :-
"सुखबीर आ रहा है !" माँ ने मुझे सूचना दी है . "आज ऑफिस मत जाना . " उन का हुक्म हुआ है . "और ,सुन ! ठीक से कपड़े पहन कर तैयार हो जाना !" अब की बार उन की हिदायत आई है .
ये तीसरा लड़का मुझे देखने आ रहा है . पहले दो के साथ खूब जंग रुपी है .पहले लडके के बाप ने पता नहीं कैसे पता कर लिया था कि मैं 'मंगली' हूँ ! लो, जी ! उस ने आसमान को अधर उठा लिया . उस के लिए मैं 'किलर गर्ल' थी …जिस ने शादी होते ही उस के लडके को लील जाना था ! कित्ता बुरा लगा था , मुझे ….? उफ़ …!! उस दिन मैंने अपने लड़की होने पर ही लानत भेजी थी . और जब दूसरे लडके के साथ बात बनने के बाद लडके वालों ने दहेज़ का पंगा डाला ….तो परिवार का दम-सा निकल गया ! पापा अपना सब कुछ बेच भी डालते …तब भी उत्त्ता पैसा पूरा न होता ! सौदेबाजी भी खूब हुई …पर किसी भी सूरत में बात न बनी . अब ये आ रहा है – सुखबीर ….!!
मुझे याद है कि ….लड़की के पैदा होते ही उस की शादी की चर्चा शुरू हो जाती है !
सर्व प्रथम तो लड़की को बला की सुंदर होना चाहिए ! सो …ये – पहला मोर्चा मैंने पहले से ही मार लिया था . फिर लड़की का पढ़ा-लिखा होना भी अनिवार्य हो गया है . और इस के बाद आता है – 'जॉब ' ! लड़की कमाती होगी …तो शादी होने में आसानी रहेगी ! मैंने कमाना भी शुरू कर दिया . लेकिन ….शादी ….?
आज सुखबीर आ रहा है ! देखते हैं , क्या रंग-ढंग बनता है ….!
न जाने क्यों मैंने आज अपने 'तैयार होने' को ज्यादा तबज्जो नहीं दी है ! मैं जो हूँ , सो हूँ ….मैंने सोचा है . अब ये सुखबीर की प्रोब्लेम्ब है …कि उसे क्या और कैसी लड़की पसंद है ! मैं उस की 'चोइस' क्यों बनूँ ….? लैट …हिम …डिसाइड ….!'
"आप 'जाब' करती हैं ….?" सुखबीर का पहला प्रश्न है .
"जी, हाँ …! मल्टी नेशनल …………"
"हाँ…! मेरी सरकारी नौकरी है !" सुखबीर बोला है . "आज-कल …सरकारी नौकरी मिलना …कोई हांसी -खेल नहीं …!" उस ने मुझे बताया है . लगा है जैसे हल्दी-घाटी से लौटा महाराणा प्रताप हो , ये सुखबीर ! "तनखा तो बहुत कम है ….आप के मुकाबले ! पर ऊपर की कमाई ……" वह कहता रहा है . पर मैंने कुछ सुना ही नहीं है ! मेरा मन उड़ गया है …!!
सुखबीर मुझे निरा गंवार ही लगा है ! लगा है – कि मेरे घरवाले अब …मेरी शादी …किसी से भी कर …अपनी जान छुड़ा लेना चाहते हैं ! अब उन्हें मेरी पसंद ….या ना -पसंद से कोई सरोकार नहीं है . उन्होंने अब मेरी शादी कर ही डालनी है …!!
"देख, शमा !" सुखबीर के जाने के बाद माँ बताने लागी हैं . "सीधा-सच्चा लड़का है . कोई अल-छल नहीं . कोई एब नहीं . और फिर कुल-खान-दान देखा-भाला है . बिरादरी की भी सारी शर्तें पूरी होती हैं . कुंडली मिल गई है . उस के साथ तुम्हारे चौबीस …..गुण मिलते हैं ." माँ हंसी हैं . "और फिर …दान-दहेज़ की कोई ज्यादा मांग-जाच नहीं है . सब आसानी से निबट जाएगा !"
"लेकिन , अम्मां ! मैं सुखबीर से शादी नहीं करूंगी ….!" मैंने दो टूक ज़बाब दिया है .
लो ! अब अम्मां सनाके में आ गई हैं ! मेरी ओर बटर -बटर देखती ही जा रही हैं . जैसे हुए किसी हिम-पात में उन की याददास्त चली गई हो – ऐसा लगा है ! और फिर पूरे घर में 'चक्रवात' सा कुछ घुस आया है . सब के सब आग-बबूला हो , दहकने लगे हैं ….प्रहार करने लगे हैं – मुझ अकेली लड़की पर !!
लेकिन मुझे अपने दोनों हाथों में लाल गुलाबों का गुलदस्ता उठाए खड़ा मधुर दिखाई दे रहा है ! मुझे मेरा भविष्य दिखाई दे रहा है …सच या झूट , ये तो राम जाने !!
पर, हाँ ! आज मैं कुछ तो देख पा रही हूँ ….अपनी आँखों से ! परिवार की आँखों ने तो अब देखना ही बंद कर दिया है !!
और , हाँ ! मैं ये भी जानती हूँ ….कि जिस दिन परिवार को पता चलेगा कि 'मधुर' बंसल है और हम 'शर्मा' हैं …..तो अंतरजातीय विवाह वाली बंदूकें फिर से फायर करेंगीं …!!
लेकिन डरता कौन है ….? मेरा….. ठेंगा ……!!
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श्रेष्ट साहित्य के लिए – मेजर कृपाल वर्मा साहित्य !!