” तन्ने पेलयां न बताया कि तन्ने पाँच-लाख रूपये की ज़रूरत सै! तो हम इंतज़ाम करते.. अब इतनी जल्दी इतने रुपये कित्ते देंगें! कोशिश करेंगें! गाम में कोई हमनें देता हो तो!”।
रमेश के चाचा ने रमेश से कहा था।
अब तो गाँव में रमेश और प्रहलाद के रोज़ के फ़ोन जाने लगे थे.. कितने पैसों का इंतेज़ाम हो गया.. यह पूछने के लिए।
” लाख रुपये दे सकते हैं! हम बस! गाम में कोई भी पैसे देन ने राजी कोनी!”।
चाचा का फोन रमेश के पास आया था.. जो केवल लाख रुपये का ही इंतेज़ाम कर पाने में कामयाब हुए.. थे।
पैसे पूरे नहीं थे.. फीस भरने के लिये.. प्रहलाद किसी की भी बात मानने को तैयार था.. ही नहीं था.. जूनून सवार हो गया था.. बच्चे पर! कि दाखिला लेना है! तो सिर्फ़ और सिर्फ़ बैंगलोर में..!
इसी जूनून के चलते प्रहलाद रमेश के पीछे बुरी तरह से पड़ गया था.. और रमेश विनीत के आगे एकबार फ़िर फीस के पैसों को लेकर खड़ा हो गया था..
” दे-दे ने पैसे जब न मान रया तो!”।
विनीत के आगे रमेश ने साफ़ बोल दिया था.. अरे! दे-दे पैसे जब बच्चा नहीं मानता तो!”।
पर विनीत ने किसी भी प्रकार की कोई भी हामी नहीं भरी थी।
” अरे! या अपने गहने गिरवी रखने की कहे है..!!”।
रमेश ने परिवार के सामने एक नया तीर चला डाला था.. कि सुनीता अपने गहने गिरवी रखने की बात कर रही है! और तीर वाली बात भी नहीं थी.. प्रहलाद ने दोस्तों की सलाह पर. माँ से गहनों वाली बात कह भी दी थी.. ” जब पापा उस लड़की को पालने के लिए गहने बिना पूछे निकाल कर बेच सकते हैं! और ऐश कर सकते हैं! तो क्या आप मेरी पढ़ाई के लिए अपने गहने गिरवी नहीं रख सकतीं! मैने गोल्ड लोन वालों से बात कर ली है!
सुनीता यहाँ प्रहलाद की बात को काट नहीं पाई थी.. लेकिन गोल्ड लोन वाली बात विनीत और दर्शनाजी के कानों में तो चली ही गई थी..
” कर्जा सिर पर चढ़ जाता है! तो डंडा लेकर लोग खड़े हो जाते हैं!”।
दर्शनाजी ने किसी और से बात करते हुए.. सुनीता को इशारा किया था।
Confusion की स्थिति में खड़ी सुनीता जान तो सब रही थी.. अन्दर की बात.. कि इस घर में जब रमेश का ही कुछ नही है! तो इसके बच्चों को तो खैर! मिलना ही क्या था.. पर प्रहलाद की जिद्द के आगे एकदम चुप खड़ी थी।
कोई बात नहीं ! अपने बेटे की अंधी जिद्द पर एकबार फ़िर गोल्ड लोन वाली दुकान पर जा खड़ी हुई थी। गहनों पर अच्छा-ख़ासा लोन मिलने को तैयार था.. फ़िर न जाने क्यों कौन सी बात दिमाग़ में आई थी.. और सुनीता ने बात वहीं ख़त्म कर दी थी..
” ताऊजी कह रहे थे.. न कि तू एकबार दिल्ली का भी देख ले! तो बेटा आगे देख लेते हैं! नहीं तो सबकुछ जोड़-जाड़ कर दाखिला तो हो ही जाएगा!”।
” ये लोग कुछ नहीं देंगें! दिल्ली आ जाओ!” ।
तरीके तो शायद सारे लगा लिए थे.. पर शायद बात नहीं बनी थी.. फ़िर उसी गड्ढे में बरसात के मेढ़क की तरह ज़िन्दगी शुरू हो गयी थी। जुड़े रहें खानदान के साथ।