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आधुनिक परिप्रेक्ष्य में ज्योतिष विज्ञान की प्रासंगिकता

आज का युग विज्ञान का युग है और विज्ञान दिनबदिन प्रगति की और अग्रसर है। नई तकनीके ईजाद हो रही है, ज्ञान का शोध करके नये-नये आविष्कार किये जा रहे है जो मानव जीवन स्तर में नई क्रांति ला रहे है। इन सबसे ज्योतिष विज्ञान भी अछूता नहीं रहा है। हजारों वर्षों से इस पर अध्ययन-मनन किया जा रहा है, जो भविष्य में नई सम्भावनाओं को गतिमान कर रहा है। हम देखते है ग्रहों की गति, सूर्योदय-सूर्यास्त, दिन-रात, चन्द्रग्रहण-सूर्यग्रहण, आँधी-तुफान, सर्दी-गर्मी बरसात व मौसम आदि का पूर्वानुमान आधुनिक विज्ञान व ज्योतिष विज्ञान दोनों के माध्यम से तर्कसंगत सम्भव हो पा रहा है। अनुमानों व परिणामों में पहले से अधिक बेहतर तालमेल बैठ रहा है।
विगत कुछ वर्षों से हमारे देश में ज्योतिष की एक नई शाखा का विकास हुआ है, जिसके आधार पर वैज्ञानिक ढ़ंग से की जाने वाली सटीक तिथियुक्त भविष्यवाणी जिज्ञासु प्रवृति व बुद्धिजीवी वर्ग के मध्य चर्चा का विषय बनी हुई है। तिथियुक्त भविष्यवाणियां काफी आत्मविश्वास के साथ कर पाने के लिये ‘‘गत्यात्मक गोचर प्रणाली’’ का विकास किया गया। गत्यात्मक गोचर पद्धति एवं ‘‘गत्यात्मक गोचर प्रणाली’’ के विकास के साथ हीं ज्योतिष वस्तुपरक विज्ञान बन गया है। जिसके आधार पर सभी प्रश्नों के उत्तर ’’हाँ’’ या ’’नहीं’’ में दिये जा सकते है। गत्यात्मक ज्योतिष की जानकारी के पश्चात समाज में फैली हुई विभिन्न धार्मिक एवं ज्योतिषीय भ्रांतियां बहुत हीं आसानी से दूर की जा सकती है। साथ हीं साथ लोगों को अपने ग्रहगोचर और समय में उचित तालमेल बिठाते हुऐ उचित निर्णय लेने में सहायता मिल सकती है। आने वाले युग में गत्यात्मक ज्योतिष, ज्योतिष के महत्व को सिद्ध करने में कारगर साबित होगा, ऐसा मेरा विश्वास है और ऐसा कामना भी करता हूँ।
देश के सरकारी, अर्ध-सरकारी व गैर-सरकारी संगठनों के ज्योतिष के प्रति उपेक्षित रवैया तथा उनसे प्राप्त होने वाले सहयोग की कमी के कारण इस लक्ष्य को प्राप्त करने में कुछ अधिक समय जरूर लगेगा, इसमें कोई सन्देह नहीं है। यह भी एक कटु सत्य है कि आज भी संसार के सभी विज्ञानकत्र्ता ज्योतिष को विज्ञान का दर्जा देने से कतराते है। कारण और निवारण का सिद्धांत अपनाकर भौतिक जगत की श्रेणी में ज्योतिष तभी रखा जा सकता है, जब ये पूरी तरह समझ लिया जाये। वातावरण में परिवर्तन जैसे तुफान आना, चक्रवात पैदा होना, हवाओं का रूख बदलना, भूकम्प-बाढ़ आदि की पूर्व सूचना देना आधुनिक विज्ञान द्वारा कथित की जाती है जबकि ये प्राथमिक सूचनाऐं ज्योतिष द्वारा हीं मिलती है। अगर ज्योतिष विज्ञान व आधुनिक विज्ञान का बेहतर तालमेल बनाया जाये तो सारी घटनाऐं और सटीकता से कथित की जा सकती है, जिनका परिणाम निःसन्देह ज्यादा सटीक मिलेगा जो मानवमात्र के लिऐ कल्याणपरक सिद्ध होगा।
ज्योतिषशास्त्र के अन्तर्गत खगोलशास्त्र, पदार्थ विज्ञान, आयुर्वेद व गणित का अध्ययन भी प्राचीनकाल से किया जाता रहा है। तथ्यों के आधार पर आज से करीब 2200 वर्ष पूर्व वराहमिहिर ने 27 नक्षत्रों व 7 ग्रहों तथा धु्रव तारें को वेधने के लिये बड़े जलाशय में स्तम्भ का निर्माण करवाया था। जिसका वर्णन हमें भागवतपुराण में भी मिलता है। इस स्तम्भ में 7 ग्रहों के लिऐ 7 मंजिले और 27 नक्षत्रों के लिऐ 27 रोशनदान काले पत्थरों से निर्मित करवाये गये थे, इसके चारों तरफ 27 वैद्यशालाऐं मन्दिरों के रुप में निर्मित करवाई थी। जिन्हे प्राचीन भारतीय शासक कुतुबद्दीन ऐबक ने तुड़वाकर मस्जिदे बनवा दी उसके बाद अंग्रेजी शासन में इस स्तम्भ के ऊपरी भाग को तुड़वा दिया, जो आज भी 76 फुट शेष है। जिसे हम आज दिल्ली की सुप्रसिद्ध ईमारत कुतुबमीनार के रुप में जानते है।
ज्योतिष विज्ञान का क्षेत्र इतना विस्तृत है कि इसे सभी विज्ञानों का अधिष्ठाता माना जा सकता है। यह कहने में को अतिश्योक्ति नही होगी कि ये ऐसा विज्ञान है जो खगोलीय घटनाओं से सम्बन्ध जोड़ता है तथा ब्रहमाण्ड और मनुष्य के बीच अंतः सम्बन्ध स्थापित करने का प्रयास करता है। ज्योतिष विज्ञान आज भी उतना हीं महत्वपूर्ण है जितना की प्राचीनकाल में था, जरुरत है आधुनिक परिप्रेक्ष्य में इसे आधुनिक विज्ञान के साथ जोड़कर बेहतर तालमेल बिठाने की।

Dr Radheshyam Lahoti