“आपकी चिट्ठी आई है।” कदम खाने के बर्तन उठाने आया था तो आनंद को बताया था।

आज शनिवार था। स्वामी अनेकानंद आज माधव मानस इंटरनेशनल के प्रांगण में श्रद्धालुओं से मिल रहे थे। लंच ब्रेक था। स्वामी अनेकानंद ने भोजन ग्रहण कर लिया था। और तभी कदम ने उन्हें आया पत्र पकड़ा दिया था। पत्र देख स्वामी अनेकानंद अचंभित रह गए थे।

“आप का छोटा बिल्लू।” पत्र के अंत में लिखा था। स्वामी अनेकानंद को समझते देर न लगी थी कि ये पत्र उनके छोटे भाई बिल्लू ने लिखा था।

बड़ी सावधानी से स्वामी अनेकानंद ने आए पत्र को अपने आप में छुपा लिया था।

स्वामी अनेकानंद को याद आ गया था कि कल ही कल्लू ने उन्हें हजार रुपये घर भेजने की रसीद दी थी। घर पर पैसा तो पहुंच रहा था। उन्हें तसल्ली थी। लेकिन फिर जो पत्र आया था वो किस लिए होगा – उनके मन में चिंता व्याप्त हो गई थी।

आज गजब हो रहा था कि स्वामी अनेकानंद आए श्रद्धालुओं की व्यथा सुन ही न पा रहे थे। उनके दिल दिमाग में तो बिल्लू, मां और उनका गांव तोची गढ़ – समस्तीपुर बिहार … और … और वो अपना घर – रह-रह कर उठ खड़े होते और वो …!

ढाई कमरे का मकान मां ने बनवाया था। दो कमरे दो आने वाली बहुओं के लिए थे तो अकेला रसोई घर दोनों का साझला था।

“तु कहां रहोगी मां?” आनंद ने प्रश्न पूछा था।

“मेरा क्या है रे। घर के किसी भी कोने में पड़ी रहूंगी।” विहंस कर मां ने उत्तर दिया था।

मां अपने दो बेटों और उनकी होने वाली गृहस्थियों के लिए खट रही थीं।

अचानक ही आनंद को अपना घर दिख गया था। घर के पिछवाड़े खड़ा नीम का पेड़ उससे बतियाने लगा था। उसे याद था जब मां घर का ताला लगा कर काम पर चली जाती थी तो स्कूल से आ कर वो और बिल्लू नीम के पेड़ पर चढ़ कर घर की छत पर कूद जाते और फिर घर में दाखिल हो जाते।

“चलिए स्वामी जी।” आनंद ने कदम की आवाज सुनी थी तो होश लौटा था।

सभी श्रद्धालु जा चुके थे। आज का काम समाप्त हुआ था। स्वामी अनेकानंद अब पर्ण कुटीर में लौट आए थे। उस परम एकांत में उन्होंने बिल्लू का लिखा पत्र पढ़ा था।

प्रणाम भइया – पढ़ते ही आनंद को बिल्लू याद हो आया था – चुलबुला सा उसका छोटा भाई बिल्लू जिसे वो जी जान से प्यार करता था।

मरने से पहले मां का मुंह देखना चाहो तो चले आओ भइया – बिल्लू ने सीधा-सीधा लिखा था। तुम्हारा नाम ले लेकर जी रही हैं अब तक – बिल्लू ने बताया था। क्या करूं? सारे हकीम वैद्य लगा दिए लेकिन … लेकिन …

आनंद की आंखें सजल हो आई थीं। वह रो रहा था।

उनकी जुबान पर एक ही नाम है – आनंद। मेरा आनंद …!

दुखी हूँ भइया! और अब क्या लिखूं? तुम्हारा छोटा बिल्लू।

कोई पर्ण कुटीर में घुस आया था। आनंद ने आंखें पोंछ ली थीं।

“स्वामी जी। मैं अमेरिका जा रही हूँ।” विभूति थी। “मेरी अमानत हैं मेरे पापा। आप को सोंप कर जा रही हूँ।” वह कह रही थी। “लौटूंगी तो ले लूंगी।”

अब गांव तो आनंद को भी लौटना था। तोची गढ़ जाना था। लेकिन …?

कदम ने आनंद के घर से आए पत्र की भनक राम लाल और कल्लू को दे दी थी।

“जरूर ही कोई गुल गपाड़ा हो गया होगा।” कल्लू ने कयास लगाया था। “पैसे तो कल ही भेजे हैं।” उसने राम लाल को सूचना दी थी।

“बड़ा ही मुबारक मौका है कल्लू।” राम लाल चिंतित हो उठा था। “विदेशी लोग होटलों में भरे पड़े हैं। जगह नहीं मिल रही है बंबई में। सुनहरी मौका है। लेकिन आनंद …?”

“मैं टटोलूंगा।” कल्लू ने वायदा किया था। “अगर कोई बेगार हुई तो मैं चला जाऊंगा।” कल्लू ने राम लाल की विपदा हर ली थी।

मां की बीमारी पर आनंद बुरी तरह से आंदोलित हो उठा था।

मरने से पहले मां का मुंह देखना हो तो चले आओ भइया – बिल्लू की आवाजें आनंद साक्षात सुन रहा था। वह जानता था कि उसकी मां अपने दो बेटों के लिए ही जीती थी। उसे हर हाल में मां के पास पहुंचना चाहिए – उसका दिल दिमाग बता रहा था। वह बड़ा था। बिल्लू उससे बहुत छोटा था। मां अपने आनंद के लिए …

आनंद की आंखों से आंसू बह चले थे। आनंद भाव विभोर हो उठा था।

मन था कि उठे और भाग चले अपनी मंजिल की ओर। पहुंचे अपनी देवी स्वरूप मां के पास। लेकिन … लेकिन वह तो विवश था। उसे एहसास हुआ था कि वो तो … वो तो मात्र कदम की चिड़िया था। पिंजरे में कैद था आनंद। चाबी राम लाल के पास थी। उसकी जेब में तो कोई पाई पैसा तक न था। उसके तो कपड़े भी संन्यासी के थे। वह तो पिंजड़े में पड़ा-पड़ा केवल डैने मार सकता था। अपना ही बदन घायल कर सकता था। बाकी तो सब राम लाल, कल्लू और कदम के पास था। न जाने कितना कमा रहे थे? तीनों अनपढ़ थे पर मालिक थे। वह एक एम ए पास तक पढ़ा लिखा, पागल बना हुआ था?

“कमा कर खाना – लेकर देना गृहस्थी का धर्म है!” अचानक आनंद मां की आवाजें सुनने लगा था। “कन्या रूप में औरत कोरी होती है। लेकिन छूने पर स्त्री बन जाती है। छू लेने के बाद कभी भी छोड़ना नहीं चाहिए स्त्री को। पाप लगता है।” मां बताती थी। “झूठ नहीं बोलना। ईमानदारी आदमी का गहना है।” मां के उपदेश थे।

“गलत।” सहसा आनंद ने ऊंची आवाज में कहा था। “ये जो जगत व्यापार ठग रहा है? ये जो लूट खसोट हो रही है? ये क्या है मां? मैं और बिल्लू ही भूखे क्यों मरें?” वह पूछ रहा था। “तुम मत मरो मां। इस बार मुझे मौका दो। इस बार … इस बार मैं और बिल्लू …” हांफने लगा था आनंद।

“क्या लिखा है चिट्ठी में?” राम लाल ने विनम्र स्वर में पूछा था। “खैरियत तो है!” उसने आनंद के मुरझाए चेहरे को पढ़ा था।

“मां … मां …!” आनंद का गला भर आया था। “शायद मां …” वह बोल नहीं पा रहा था। दुनिया को गुण ज्ञान देने वाला स्वामी अनेकानंद आज कोरा अज्ञानी था। रो रहा था।

“धीरज धारिए। बनाते हैं कोई तरकीब।” राम लाल ने दिलासा दिया था।

“हम हैं न भइया।” कल्लू बोल पड़ा था। “रोते क्यों हो?” और कल्लू स्वयं भी रोने लगा था।

आनंद जाने के बाद लौटेगा – राम लाल को शक था। और अगर वह न लौटा तो राम लाल का बना बनाया बानक बिगड़ जाएगा – वह जानता था।

“चेला बनाने में चूक हो गई।” राम लाल ने अपनी गलती मान ली थी।

मेजर कृपाल वर्मा रिटायर्ड

मेजर कृपाल वर्मा रिटायर्ड

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