हिरन गोठी के जन कल्याण आश्रम में जन्माष्टमी का उत्सव जोर शोर से मनाया जाने वाला था।
एक सप्ताह का प्रोग्राम था। स्वामी अनेकानंद इस महान उत्सव के अवसर पर होटल माधव मानस इंटरनेशनल से उठ कर आश्रम में बने अपने पर्ण कुटीर में पधारेंगे की घोषणा भी हो चुकी थी। उनका प्रोग्राम एक दिन – शनिवार को ही होटल के परिप्रेक्ष्य में होगा ये भी तय हो गया था। शनिवार का दिन होटल में तथा अन्य दिन आश्रम में दर्शन देने का प्रोग्राम राम लाल ने तय किया था। इतवार का दिन खाली था।
सनातन स्वरूप श्री एक सौ आठ स्वामी अनेकानंद जी की पर्ण कुटीर पर लगी नेम प्लेट पढ़ कर आनंद चौंका था। शायद ये राम लाल की कोई अगली चाल थी – उसने सोचा था।
पर्ण कुटीर की संरचना बड़ी ही चतुराई से की गई थी। प्रथम दृष्या पर्ण कुटीर बड़ा ही पावन, पवित्र और संस्कारी स्थान दिखता था। घास फूस का इस्तेमाल कर पर्ण कुटीर को एक दम प्रकृति के साथ जोड़ दिया गया था। आस पास छोटा उपवन था। फूलों के बिरवे थे और सामने समुद्र के खुले खिले विस्तार थे। आनंद का मन खिल उठा था। होटल के बंद कमरे से निकल जैसे वो किसी स्वर्ग लोक में आ पहुंचा था – ऐसा लगा था।
लेकिन पिछले द्वार के उस पार वही सब सुविधाएं थीं जो होटल में उपलब्ध थीं।
आनंद ने निगाहें पसार कर हिरन गोठी जन कल्याण आश्रम के दर्शन किए थे।
बेजोड़ संरचना थी। हर तरह की सुविधाएं थीं। लोगों को ध्यान में रख कर बंदोबस्त किया गया था। जो दे सकते थे उनसे लिया जा रहा था और जो अशक्त थे उनके लिए सब मुफ्त था। हर प्रकार की सुविधा सर्व साधारण के लिए उपलब्ध थी।
एक सप्ताह चलने वाले जन्माष्टमी उत्सव के अंत में भंडारा था। भंडारे से पहले की पूजा में माधव मोची को मग्गू भगत के रूप में पेश करने की कल्लू की कला थी। चुनावों को ध्यान में रखते हुए कल्लू चाहता था कि मग्गू को एक नए अवतार में चुनाव में उतारें। अगर कुछ नया न हुआ तो मग्गू चुनाव हारेगा। विलोचन शास्त्री का महारथी बबलू इस बार पूरे दम खम के साथ चुनावी दंगल में उतर रहा था। नारी शक्ति का प्रतीक वूमन सैल कल्लू को कोई नई काट लगी थी।
“ईंट का जवाब पत्थर ही होता है।” कल्लू खुश-खुश मग्गू को बता रहा था। “वूमन सैल का उल्टा होगा – सनातन का शेर।” कल्लू ने घोषणा की थी। “बस थोड़ा कपड़ों का हेर फेर करना होगा तुम्हें। बन जाओ सनातनी – हर्ज भी क्या है?”
मग्गू मौन था। कल्लू की चाल और चालाकियां उसे कभी-कभी डराने लगती थीं। वह भी अब पब्लिक को जानता था और पहचानता भी था। लोगों के लिए अब वो नया न था। चाल बदलेगी तो लोग …
“लोग भूल जाते हैं भाई।” कल्लू हंस रहा था। “नए के सामने पुराना फीका पड़ जाता है।” कल्लू की दलील थी। “तुम्हारा ये नया अवतार लोगों को बहुत भाएगा – मैं गारंटी देता हूँ। जन कल्याण आश्रम का पूरा का पूरा श्रेय तुम्हीं को मिलेगा – देख लेना।” कल्लू ने मग्गू को मना लिया था।
बड़े दिनों के बाद आज आनंद खुले में आ खड़ा हुआ था।
अचानक उसका मन हुआ था कि गदगदी लगा कर भाग ले। भागता ही चला जाए जब तक कि अपने गांव को न छू ले। अपने घर की कुंडी खटखटाए। और जब मां दरवाजा खोले तो पुकारे – मां मैं आ गया। और तब मां के आंचल में मुंह छुपा कर खूब रोए। इतना रोए कि अब तक के किए सारे छल छिद्र आंसुओं में धुल-धुल कर स्वच्छ हो जाएं ताकि उसका अंतर निखर आए और वह फिर से जिंदगी को जीना आरंभ करे।
राम लाल ने उसे लोहे के जाल में बुरी तरह से जकड़ दिया था।
“भोजन ग्रहण करें स्वामी जी।” कदम ने आनंद का मौन तोड़ा था तो वो लौट आया था।
आनंद कदम की चिड़िया ही तो था।
राम लाल को पर्ण कुटीर पर आया देख आनंद के कान खड़े हो गए थे।
“कैसा लगा आपको पर्ण कुटीर?” राम लाल ने मुसकुराते हुए प्रश्न पूछा था।
“नया कुछ नहीं है।” आनंद ने शांत स्वभाव में उत्तर दिया था। “हम लोग गांव में पहले भी झोंपड़ी में रहते थे।” आनंद बताने लगा था। “बड़ा सुख था वहां।” आनंद का चेहरा खिल उठा था। “पिताजी की घर बनाने की औकात न थी। झोंपड़ी डाली थी। सच कहता हूँ राम लाल जी हमारी झोंपड़ी गर्मियों में ठंडी और सर्दियों में गरम रहती थी। हम दोनों भाई …”
“घर क्यों नहीं बनाया था?” राम लाल ने बीच में पूछ लिया था।
“बाद में बनाया था। पिताजी चल बसे थे तब मां ने कमाना आरंभ किया था। मैं और बिल्लू – मेरा छोटा भाई भी काम करने लगे थे। मां कहती थी कि घर न बना तो मेरे दोनों बेटे कुँवारे रह जाएंगे। हाहाहा।” आनंद खुल कर हंसा था। “और आज भी हम दोनों …”
“शादी का संस्कार होता है तभी होती है, आनंद बाबू।” राम लाल ने भी हंस कर कहा था। “जिस दिन का लग्न लिखा होता है … उसी दिन …”
सहसा आनंद को याद हो आया था कि राम लाल भी कुंवारा था। बर्फी का साथ छोड़ने के बाद भी उसने अभी तक शादी न की थी।
“कोई कष्ट तो नहीं है?” राम लाल ने चालू प्रश्न पूछा था।
“नहीं। सर्व आनंद हैं।” आनंद का उत्तर था।
राम लाल कई पलों तक चुप रहा था। उसने कई बार आनंद को निगाहों में भर कर तौला था। आनंद आज उसे बहुत गहरा दिखा था।
“मौका है आनंद बाबू।” राम लाल ने धीमे से कहा था। “अगर हैंडिल कर लो तो …?”
आनंद खबरदार हुआ था। वह जानता था कि राम लाल बिना मतलब के समय न गंवाता था।
“कैसा मौका?” आनंद ने पूछ ही लिया था।
“एक खरबपति माधव मानस इंटरनेशनल में आ कर ठहरा है। आपका नाम सुन कर अमेरिका से आया है। किसी अज्ञात बीमारी का शिकार है। डॉक्टरों ने जवाब दे दिया है। अगर आप हैंडिल कर लें तो …” चुप हो गया था राम लाल।
आनंद भी चुप बना रहा था। वह राम लाल के मनसूबों से वाकिफ था।
“बिल्डर है।” राम लाल कुछ सोच कर बोला था। “अगर जन कल्याण आश्रम की बिल्डिंग बनवा दे तो …?” राम लाल ने अपना मंनतव्य बताया था।
आनंद कुछ न बोला था। बात उसकी समझ में आ गई थी। लेकिन ये आनंद के मन का सौदा न था।
“कल्लू सारी डिटेल बता देगा आपको।” राम लाल ने अंत में कहा था और चला गया था।
आनंद ने महसूसा था कि राम लाल का आदेश मान कर ही वह फायदे में रहेगा। हर माह एक हजार रुपया उसके घर जाता था। अगर राम लाल का काम न हुआ तो … राम लाल …
लेकिन आनंद का मन आज विद्रोह करने पर उतर आया था।
उसे याद आ रहा था – अपना गांव, अपना घर अपनी मां और छोटा भाई बिल्लू। उसका मन कह रहा था कि लात मारे राम लाल को और लौट चले अपने गांव। दो रोटी कमाने में लगता क्या है? बूढ़ी मां ने भी तो कमा कर खाया था। वह तो आज भी … शायद आज भी काम पर लगी होगी। बिल्लू और वो मिलकर कमाएंगे तो क्या गुजर न होगी?
“मुझसे न होगा राम लाल जी।” मन में संवाद बोला था आनंद ने। “मैं चला अपने गांव।” उसने घोषणा की थी।
“मोहन मकीन – खरब पति की बेटी आपसे मिलना चाहती है आनंद बाबू।” कल्लू ने सूचना दी थी। “मौका है।” कल्लू मुसकुराया था। “बहुत मोटा असामी है।”
मोहन मकीन की बेटी विभूति मकीन से मिल कर आनंद फिर एक बार राह भूल गया था।

मेजर कृपाल वर्मा रिटायर्ड