प्रतिष्ठा ने पहली बार अपनी मां सीता देवी को यों बिफर कर रोते सुना था।

खून सूख गया था प्रतिष्ठा का। ऐसी कौन सी मजबूरी आन पड़ी थी और कौन कारण हो सकता था कि मां यों हिलकियां ले-ले कर रो पड़ी थीं। ऐसा क्या था कि बाबू जी का आभा मंडल उन्हें बचा न पा रहा था। वो कौन था जो उसकी देवी स्वरूप मां को यों सता रहा था?

“न न मानस! आज काम न होगा।” प्रतिष्ठा का गला सूख गया था। वह ठीक से बोल भी न पा रही थी। “मेरी तबीयत बिगड़ रही है। मैं … मैं …” प्रतिष्ठा चुप हो गई थी।

प्रतिष्ठा को यों अचानक विलाप करते सुन मानस भी घबरा गया था।

“क्या हुआ?” मानस ने प्रतिष्ठा को जोर दे कर पूछा था।

“पता नहीं।” प्रतिष्ठा की आवाज बैठ गई थी।

फिल्म हुस्न परी का निर्माण करता राधू रंगीला का पूरा का पूरा काफिला खड़ा रह गया था। प्रतिष्ठा का यों बेदम हो जाना और बेहोश होने को होना किसी की समझ में न आ रहा था।

प्रतिष्ठा ने बाबू जी को फोन मिलाया था। बार-बार इंगेज आ रहा था। प्रतिष्ठा ने फोन काट दिया था और हिम्मत बटोर कर बबलू भैया को फोन मिलाया था।

“हां-हां। प्रतिष्ठा मैं ही बोल रहा हूँ। कैसी हो?” बबलू की आवाज में खुशी की खनक थी।

“भइया! वो … मां …?”

“बिलकुल ठीक हैं। उन्हीं के कर कमलों से तो वूमन सैल के ऑफिस का उद्घाटन कराया है प्रतिष्ठा।” बबलू ने बताया था। “बड़ा उत्साह है पार्टी में।” वह कहता रहा था। “तुम्हारी पल्लवी भाभी को …”

सकते में आ गई थी प्रतिष्ठा। ये क्या पहेली थी – जो वह समझ न पा रही थी।

वूमन सैल और पल्लवी भाभी ये दो शब्द प्रतिष्ठा के दिमाग में हथौडों की तरह बजे थे। हो न हो हत्या की जड़ पल्लवी भाभी हो – प्रतिष्ठा को शक हुआ था। उसने फिर से बाबू जी को फोन मिलाया था।

“हां। कैसी है मेरी बेटी?” बाबू जी की आवाज तनिक बदली-बदली लगी थी।

“मैं तो ठीक हूँ बाबू जी। लेकिन … लेकिन मां को क्या हुआ?” प्रतिष्ठा ने सीधा प्रश्न पूछा था। “क्यों रो रही थीं मां?”

“कुछ नहीं रे!” बाबू जी की आवाज फट रही थी। “सीता को लगता है कि तुम्हें राजनीति में ही आना चाहिए था।” बाबू जी बताने लगे थे। “पार्टी ने नई वूमन सैल बनाई है। नारी शक्ति का राजनीति में जोड़ तोड़ होना भी जरूरी है – यह माना जा रहा है बेटी।”

“तो फिर मां …?” प्रतिष्ठा शक कर रही थी। “मां को … मां को कुछ नहीं बनाया वूमन सैल में?”

“पल्लवी को कहा है चलाने को। यंग है। राजनीति के दांव पैंच भी जानती है। सीता को ये सब नहीं सुहाता।”

“क्यों नहीं सुहाता?” प्रतिष्ठा फूट पड़ी थी। “बाबू जी …” प्रतिष्ठा का गला भर आया था। “पार्टी तो आपकी है बाबू जी।”

“पार्टी तो सबकी है प्रतिष्ठा।” बाबू जी ने समझाया था अपनी बेटी को। “कल को तुम भी तो …?”

प्रतिष्ठा की समझ में सारा खेल समा गया था। बूढ़े बाबू जी और मां को यंग बबलू भइया और पल्लवी भाभी के सामने खड़ा देख प्रतिष्ठा ने अपनी अनुपस्थिति को स्वयं भी महसूस किया था। उसने महसूस किया था कि वो बाबू जी की बेटी ही नहीं बेटा भी थी। और उनकी असली उत्तराधिकारी थी – जिसे मां रो-रो कर कहना चाहती थीं।

“कल ही मैं बंबई चली जाऊंगी।” प्रतिष्ठा ने घोषणा कर दी थी।

सीता देवी के मचाए बाएबेले ने विलोचन शास्त्री को झकझोर कर रख दिया था।

नारी शक्ति का प्रयोग और वूमन सैल की स्थापना के प्रसंग ने विलोचन शास्त्री को कहीं गहरे में छू दिया था। अचानक ही बबलू और उसकी पत्नी पल्लवी उन्हें पराए लगने लगे थे।

“कोई अपना, बहुत अपना ही आप के साथ विश्वासघात करेगा।” स्वामी अनेकानंद के कहे वचन विलोचन शास्त्री के कहीं बहुत भीतर से तूफान बनकर बाहर आना चाहते थे।

“कौन अपना कौन पराया?” विलोचन शास्त्री व्याख्या करने बैठे थे तो उन्हें तो जग बैरी हुआ लगा था।

कोई बेटा नहीं था उनका तो उन्होंने भाई के बेटे बबलू को ही अपना बेटा मान लिया था। बबलू उन्हें बहुत प्यारा लगता था। बबलू को उन्होंने बहुत दूर तक देख कर साथ लिया था और मान लिया था कि बबलू उन के बाद उनके परिवार का दायित्व संभालेगा। उनकी सोच में कोई खोट न था। वो तो अंदर बाहर से स्वच्छ थे, निर्मल थे, निर्लिप्त थे। उनके लिए तो देश हित ही सर्वोपरि था।

बबलू को साथ लेकर वो राजनीति में अब बहुत आगे निकल आए थे।

“हां। बबलू ही मेरा बहुत अपना है।” अंत में विलोचन शास्त्री ने स्वीकार किया था। “तो क्या … तो क्या बबलू मेरे साथ विश्वासघात कर सकता है?” उन्होंने स्वयं से कठोर प्रश्न पूछ लिया था।

उत्तर तुरंत बाहर न आया था। उन्हें शक था, संदेह था कि बबलू वैसा कुछ कभी न करेगा।

“बिना बबलू के और किसी को क्या लेना देना है तुम्हारी पार्टी से?” विलोचन शास्त्री के अंदर फिर से प्रतिक्रिया प्रारंभ हुई थी। “फिर से मुगालता पाल लोगे तुम।”

“क्या करूं …?” विलोचन शास्त्री ने स्वयं से ही पूछ लिया था।

“निकाल बाहर करो बबलू को पार्टी से।” उत्तर आया था। “शुभस्य शीघ्रम।” उन्होंने मन में संवाद बोला था। “अभी तो समय है। संभल जाओ।” अगली राय भी चली आई थी।

“नहीं-नहीं।” विलोचन शास्त्री तीन कदम पीछे लौटे थे। “नहीं।” उन्होंने मन में दोहराया था। “ये तो अपराध हो जाएगा। बबलू ने भी तो मेहनत की है। जान लगाई है। लड़ा है। खटा है और उसने वक्त पर सहारा दिया है। पार्टी की पहचान बन गया है बबलू।”

“सीता …?” फिर से विलोचन शास्त्री के सामने रोती बिलखती सीता आ खड़ी हुई थी। “सीता की बेटी …?” और भी एक प्रश्न पैदा हुआ था। “क्या संभाल पाएगी पार्टी को प्रतिष्ठा?” स्वयं से पूछ रहे थे विलोचन शास्त्री।

“नहीं!” स्पष्ट उत्तर आया था। “प्रतिष्ठा तो राजनीति की परिभाषा तक नहीं जानती। सीधी सच्ची है प्रतिष्ठा। जबकि पल्लवी …”

विलोचन शास्त्री ने नजरे उठा कर वक्त को पहचाना था।

चुनाव थे कितनी दूर। और अगर अभी पार्टी में विग्रह हुआ तो नाव डूबेगी – वो जानते थे।

“चुनाव जीतने के बाद प्रतिष्ठा को पार्टी हैंडओवर कर दो।” सम्मति उपजी थी विलोचन के संयत स्वभाव में। “आमने सामने होंगे बबलू और प्रतिष्ठा। जो जीते सो सिकंदर।” तनिक मुसकुराए थे विलोचन शास्त्री। “बंटवारे तो होते ही हैं।” उन्होंने मान लिया था।

परिवार के एक प्रबुद्ध आदमी की तरह विलोचन शास्त्री एक सही उदाहरण बन कर समाज के सामने आना चाहते थे। अभी तक अर्जित की अपनी पूंजी को वो गंवाना नहीं चाहते थे। बेटी हो – बेटा हो संतान सुख तो भाग्य की बात है, लेकिन जो निर्माण उन्होंने स्वयं किया है उसके मालिक तो वो स्वयं ही हैं।

विलोचन शास्त्री के मन में एक सुख उपजा था।

उन्होंने महसूस किया था कि वो अपने तेरे की तिकड़म से मुक्त हो कर ऊपर उठ गए थे। चुनाव में हार हो या जीत हो इससे असंपृक्त रहते हुए वो अपने सहज आचरण से नीचे न गिरना चाहते थे।

विलोचन शास्त्री ने एक बड़ी जंग जीत ली थी।

मेजर कृपाल वर्मा रिटायर्ड

मेजर कृपाल वर्मा रिटायर्ड

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