“पर्ची!” कल्लू अचानक ही आनंद के कमरे में घुस आया था। उसने डाक खाने से लाई पर्ची को आनंद की आंखों के सामने तान दिया था।
आनंद को मां और बिल्लू भूली याद की तरह स्मरण हो आए थे। वो जानता था कि वो दोनों उसके भेजे पैसों की आस में जी रहे थे।
“एक हजार ..?” अचानक पर्ची में लिखी रकम एक हजार को देख आनंद चौंका था। उसने प्रश्न वाचक निगाहों से कल्लू को देखा था।
“गुरु ने कहा है।” कल्लू का उत्तर था। वह मुसकुरा रहा था।
राम लाल का स्मरण होते ही आनंद अविभूत हो गया था। पांच सौ से सीधे एक हजार की रकम उसके घर भिजवा कर राम लाल ने फिर एक बार उसे मोल खरीद लिया था।
राम लाल की पैनी निगाह स्वामी अनेकानंद के आस पास होती क्रिया और प्रतिक्रिया पर टिकी थीं। स्वामी अनेकानंद के बारे संदेश चारों ओर चल पड़े थे। प्रेस ही नहीं, लोगों ने भी उसके बारे अफवाहें उड़ाना आरंभ कर दिया था। खास कर स्वामी का हवा में हाथ लहरा कर मूर्ति प्रगट करना एक अनहोनी बात थी।
और जो आशीर्वाद स्वामी अनेकानंद ने माधव मोची को दिया था, वो भी तो आश्चर्य चकित करने वाला था। सी एम और पी एम बनेगा माधव मोची – का संदेश संदेह पैदा करता था। माधव मोची में ऐसी कोई काबिलियत किसी को नजर न आती थी जो उसे इतने ऊंचे पद के लिए प्रमाणित करती थी। फिर भी स्वामी जी दिव्य पुरुष थे और उनकी भविष्यवाणी सच भी हो सकती थी।
विलोचन शास्त्री ने जब स्वामी जी की की भविष्यवाणी के बारे सुना था तो दंग रह गए थे।
“जमाना था कि जब विद्वान पूजे जाते थे।” शास्त्री जी लोगों को बताने लगे थे। “धूर्तों का युग चल पड़ा है। जो जितना गंवार – उतना ही होशियार।” उन्होंने जुमला कसा था। “अच्छे आदमी की कद्र ही नहीं है। घर घरानों को कौन पूछता है। हैं आप महान – तो रहें। अब तो समान और सहयोग का युग है। जो चाहे जिस गद्दी पर जा बैठे।”
“चचा। बिना दम लगाए चुनाव न निकलेगा।” बबलू ने सीधे-सीधे कहा था। “सीधी उंगली घी नहीं निकलता। इनको ..”
“नहीं बेटे।” कूदे थे बिलोचन शास्त्री। “कानून के खिलाफ हम कुछ नहीं करेंगे।” उनका आदेश था। “चुनाव अपनी जगह है। जनता जिसे चाहे चुने।”
“तो आप भी तो स्वामी से चल कर पूछ सकते हैं?” रामू पनवाड़ी ने सलाह दी थी।
“मैं इन ढोंग ढकोसलों में यकीन नहीं रखता रामू।” शास्त्री जी ने सीधे-सीधे कहा था। “ये लोग उल्लू बनाते हैं – आदमी का।” उनका कथन था।
“गया ये चुनाव भी हाथ से।” बबलू ने हाथ झाड़ दिए थे।
“कांटे से कांटा निकलता है – बातों से नहीं।” रामू पनवाड़ी झींक रहा था। “हाथ पर हाथ रख कर बैठे हैं – तो बैठे रहो।” उसका उलाहना था। “वरना साले इस नाई कल्लू को तो ..”
“इन कामों से बदनामी होती है, रामू। हम लोग खानदानी हैं। हमारी समाज में इज्जत है। लोग हमें पुश्तों से जानते हैं। जबकि ये लोग ..?” शास्त्री जी ने अपने लोगों को समझाया था।
माधव मोची की चारों उंगली घी में और सर कढ़ाई में था।
स्वामी जी के आगमन से होटल सुर्खियों में आ गया था। क्या देसी और क्या विदेसी हर तरह का ग्राहक टूट कर पड़ रहा था। कमरे कम पड़ रहे थे। ग्राहक बढ़ते ही जा रहे थे। उसका मन था कि एक मंजिल और बढ़ा दे। दाता दे रहा था तो क्यों न पल्ले में लिया जाए? लेकिन मानस का मन न था। मानस फिर से फिल्म वालों के चककरों में जा फसा था। माधव को डर था कि अगर चुनाव से पहले मानस कुछ उल्टा सीधा कर बैठा तो नैया डूब जाएगी। लोग अब लाइन पर थे। कल्लू का काम पटरी पर था। स्वामी जी का प्रचार और प्रभाव बढ़ता ही जा रहा था। बस एक बार चुनाव जीत लें, उसके बाद तो पांच साल पड़े थे। उसे अब सारा खेल समझ आ गया था।
“बिलोचन शास्त्री भी स्वामी जी से भविष्य पूछने मंगलवार को आ रहे थे।” माधव को खबर मिली थी तो वह दंग रह गया था।
“दुनिया को राह दिखाने वाले भी अंधे हो गए।” माधव ने व्यंग किया था। “डर गया है शास्त्री।” माधव ने मान लिया था। “डर गया तो मर गया।” वह हंसा था। “कल्लू ..!” उसके दिमाग में अचानक ही एक नाम कौंध गया था। “बुलाओ कल्लू को शीघ्र।” वह मुसकुराया था। “शास्त्री की काट कल्लू ही करेगा।” माधव ने खुले शब्दों में कहा था। “नउआ और कउआ भिड़ेंगे तो महा समर होगा।”
“चुनावों से पहले फिल्म बनेगी।” राधू रंगीला ने खुला ऐलान किया था। “ये हमारी टीम का विचार है।” वह बताने लगा था। “इस दौरान हम सबके पास डेट्स हैं।”
“लेकिन पापा मानेंगे नहीं।” मानस का उत्तर था। “किसी कीमत पर भी वो ..”
“मनाते ही क्यों हो?” रंगीला हंसा था। “फिल्म तो तुम्हें बनानी है, उन्हें नहीं।” राय दी थी रंगीला ने।
एक चुहल चल पड़ी थी। रंगीला का विचार सभी को पसंद आया था।
“ये अच्छा रहेगा मानस सर।” रंगीला फिर बोला था। “मैं इस फिल्म को परम गुप्त रखना चाहता हूँ।” रंगीला ने अपनी बैठी टीम को निगाहें पसार कर देखा था। “ये जो जोड़ी है ना – मानस और प्रतिष्ठा की, इसे केवल और केवल फिल्म रिलीज हो तभी जनता के सामने आना चाहिए। और मैं चाहता हूँ कि हुस्न और इश्क का जोरदार धमाका हो – स्क्रीन पर। बहुत दिन हुए दर्शकों को कोई प्रेम कहानी देखने को नहीं मिली है और .. प्रतिष्ठा का हुस्न जब एकाएक उजागर होगा और मानस का इश्क और प्रतिष्ठा का हुस्न परदे पर भिड़ेंगे, लड़ेंगे और फिर मिलेंगे … तो … सोचो …?”
तालियां बजी थीं। लगा था – रंगीला ने फिल्म, ‘हुस्न परी’ जैसे रिलीज कर दी हो।
“मान जाइए मानस भाई।” उर्मिल – संवाद लेखक ने खुशामद की थी मानस की। “हम सब तो तैयार हैं। अब सहज में सब काम सिलट जाएगा।”
“एक और सूचना देता हूँ।” राधू रंगीला को जोश चढ़ गया था। “लंदन में अब आसानी से फ्लोर मिल जाएगा। पहले क्लाइमैक्स शूट करेंगे, उसके बाद तो …”
“और भाई …।” सुमंत बोला था। सुमंत ने फिल्म के गीत लिखे थे। “इधर चुनाव में दोनों परिवार उलझे होंगे और हम लोग तब अपना काम कर लेंगे – शांति पूर्वक।” वह हंस रहा था। “जब तक किसी को कानों कान खबर लगे – फिल्म रैडी।”
प्रतिष्ठा चुप थी। उसने अभी तक किसी को भी घर में सूचना न दी थी कि वो मानस के साथ फिल्म बनाने जा रही थी। क्यों कि वह जानती थी कि विलोचन शास्त्री मरते दम तक राजी न होंगे कि वो फिल्मों में काम करे। लेकिन …
“अभी नहीं।” प्रतिष्ठा हिम्मत बटोर कर बोली थी। “बाबू जी को पहले मनाना होगा।” उसने सुझाव दिया था।
“और वो कभी मानेंगे ही नहीं।” मानस ने विरोध किया था। “देखो डार्लिंग। बात साफ है। शास्त्री जी न तो फिल्म के लिए मानेंगे और न ही शादी के लिए राजी होंगे। मरजी तुम्हारी है। चूज द वे यू लाइक। मानस और बाबूजी के बीच …”
लोगों को सांप सूंघ गया था। बात बनते-बनते बिगड़ गई थी। अगर प्रतिष्ठा ही फिल्म में नहीं आती तो फिल्म का बनना या बिगड़ना बराबर ही था।
वही ऊंच नीच और जाति बिरादरी का जहर वहां बैठे सभी लोगों के दिमागों में घुल गया था। समाज को तो सब जानते थे। सब जानते थे कि प्रतिष्ठा और मानस दो न मिलने वाले किनारे थे। लेकिन उन के बीच पनपा प्यार भी वक्त की मजबूरी था। दोनों एक दूसरे को दिल से चाहते थे। हालांकि उनके प्यार की महक अभी तक उड़ी नहीं थी लेकिन एक दिन … कभी न कभी तो … ये विस्फोट होना ही था।
“एक बार फिल्म बना लेते हैं प्रतिष्ठा।” मानस ने ही प्रतिष्ठा को मनाने का प्रयत्न किया था। “फिल्म बनने के बाद आधी मुसीबत तो टल जाएगी। शादी भी फिर देर सबेर हो ही जाएगी।” उसने हंसने का प्रयत्न किया था।
“मां से पूछ लेती हूँ।” प्रतिष्ठा ने आग्रह किया था।
“फिर तो बात बिगड़ जाएगी।” राधू रंगीला बीच में बोल पड़ा था। “हम जो सस्पेंस क्रिएट करना चाहते हैं वो तो प्रतिष्ठा जी पहले ही खत्म हो जाएगा। लोगों के दिमाग पहले ही पॉल्यूट हो जाएंगे। बट आई वॉन्ट टू गिव दैम ए फ्रैश प्रेम कहानी।”
प्रतिष्ठा चुप थी। मानस परेशान था।
“मनाली चलते हैं डार्लिंग।” मानस ने सुझाव सामने रक्खा था। “सोच समझ कर निर्णय लेंगे।” उसने मान लिया था।
प्रतिष्ठा भी मान गई थी।

मेजर कृपाल वर्मा रिटायर्ड