चांदनी रातों में मैं कुटिया में बत्ती नहीं चलाता हूँ। चंद्र कलाएं चारों ओर से आ आ कर मुझसे लिपट जाती हैं। स्निग्ध, शीतल और उज्ज्वल ये चंद्र कलाएं मुझे दैवीय लताओं सी लगती हैं – जो मुझे अपने में समेट कर मेरे सारे संताप हर लेती हैं!

मेरा मन इनके साथ खूब खेलता है।

“याद है पीतू ..?” ये तो गुलनार की आवाज है। चंद्र कलाएं चली गई हैं। घुप अंधेरा भर आया है। “जिस दिन तुम निराश थे, उदास थे और हार गये थे!” गुलनार ने मुझे याद दिलाया है।

“हॉं हॉं याद है!” मैं अब गुलनार के मुकाबले के लिए मुड़ा हूँ। “मैं तो अब क्वारा ही मरूंगा गुलनार!” मैंने कहा था।

“हार गये हिम्मत?” तुम हिस्स हिस्स कर हंसी थीं – ये मुझे खूब याद है।

“क्या करूं और क्या न करूं?” मैं हर तरफ से डूबने लगा था।

“कुछ भी कर लो!” तुम बोली थीं। “कोई भी अपना काम, कचौड़ियां ही?”

“पैसे खत्म!” मेरा दो टूक उत्तर था। “और बाजार में बिना पैसे के तो कोई जूते भी नहीं मारता गुलनार!” मैं टीस आया था।

आज से भी ज्यादा गहन अंधेरा था – हमारे बीच। चुप्पी थी। मैं गुलनार की चलती सांसें गिन रहा था तो गुलनार मेरे होने या कि न होने को गिन रही थी। हारा मर्द बदबू छोड़ता है – ये मैं भी जान गया था। अब गुलनार मुझे कभी भी छोड़ कर ..

“लो! ये मेरी पायल बेच दो!” गुलनार की मधुर आवाज ने उस तीखी चुप्पी को रोंदा था। “एक बार का काम तो चल ही जाएगा?” उसने पूछा था।

गदगद हो गया था मैं! गुलनार .. गुलनार .. उस गहन अंधेरे में मुझे मेरा चमकता दमकता सूरज लगी थी। उसी रात उगी थी हमारी आशा किरण। उसी रात .. हम दोनों लिपट लिपट कर सोए थे। और वही रात थी जिसके बाद कभी हमारा सूरज न डूबा था।

मंदिर और आश्रम के बीच में खुले मैदान के किनारे हमने अपनी कचौड़ियों की दुकान सजाई थी। मैं कचौड़ी बना रहा था और गुलनार ढाक के पत्तों पर धर धर कर ग्राहकों को कचौड़ियां परोस रही थी। लम्बी कतार, फिर और लम्बी कतार और फिर और लम्बी कतार ..

“शादी ..?”

“स्वामी जी ने दिन निकाल दिया है!” कहते हुए गुलनार का चेहरा आरक्त हो आया था। “शादी भी स्वामी जी ही करेंगे।” शर्मा कर बताया था गुलनार ने। “बेटी मानते हैं मुझे।” उसने मुझे वो सूचना दी थी जिसे मैं भी जानता था।

तब मुझे लगा था कि अब आ कर हमें जीने की राह मिली थी। एक लम्बी डगर मुझे दिखी थी जिसपर हमें चलते चलते अनंत से जा मिलना था .. और ..

लेकिन सच कहता हूँ कि ये वक्त बेईमान है। हम से झूठ बोलता है। हमें ठग लेता है। हमें चकमा देता है। हमें कभी राजा तो कभी रंक बना देता है। हमें सुख दुख भी यही देता है, लेकिन गिन गिन कर देता है।

“अगर खुला दे दूँ तो अकेला एक आदमी ही सब कुछ खा जाएगा और पचा भी जाएगा।” वक्त ने मुझे सयास देखा है। “अब तो आप भी स्वामी जी हैं।” वह हंसा है। “मैं और आप अब अलग कहां हैं?” उसका प्रश्न है।

सच है। पात्रता देख कर न दोगे तो अनर्थ होगा।

“मैं देखता हूँ अब आप गुलनार को क्या दोगे?” वक्त ने उलाहना दिया है मुझे।

हॉं हॉं! याद आया। गुलनार ने अपनी पायल बेची थी मेरे लिए ..

लेकिन .. लेकिन गुलनार के लिए तो मैं कब का मर चुका हूँ श्रीमान!

मेजर कृपाल वर्मा
मेजर कृपाल वर्मा

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