Site icon Praneta Publications Pvt. Ltd.

स्नेह यात्रा भाग तीन खंड दस

sneh yatra

बंबई पैसे वालों की है और पैसे वाले ही यहां टिक सकते हैं। श्याम अब समझ गया है और यह भी समझ गया है कि बाहर निकल कर किस तरह गम गायले से काम लेना होता है।

सन एंड सेंड में और दिल्ली के स्टार होटलों में फर्क साफ दिखाई देता है। यहां के लोग क्रिया कलापों में इस तरह खुल जाते हैं जिस तरह एक सुंदर फूल की पंखुरियां। लेकिन दिल्ली में एक घुटन सी, बोझ सा और मौन सा भरा होता है। लगता है जैसे वहां हर आदमी प्रधान मंत्री की मानसिकता का संताप ढो रहा हो। सब कुछ देश के प्रति जागरूक हो और सारी समस्याएं सबके सामने खड़ी हों। लगता है यातनाओं को सहने की शक्ति जन्म ले रही हो।

लेकिन बंबई में ऐसा कुछ नहीं लगता है। झुग्गियां और झोंपड़ियां भी यहां खुशहाल और आबाद लगती हैं। या यों कहें कि उनकी समस्याओं से भी हम अपने आप को जोड़ नहीं पाते। यहां लोग कमाने खाने के उद्देश्य से आते हैं ओर यहां के अच्छे बुरे से उन्हें कोई सरोकार नहीं होता। सड़कों पर बिखरा धन, सहज ख्याति, फिल्मों की चकाचौंध, समुद्र के किनारे फैले रेतीले विस्तार और इनसे दूर खुला खुला सपाट क्षितिज एक खुला मानस मन सा ही लगता है जिसमें से सभी संवेदनाएं भाप बन कर उड़ गई हों। यहां आकर चारित्रिक संज्ञाएं बदल जाती हैं, बोल चाल बदल जाती है ओर यहां तक कि धर्म ईमान भी गारत हो जाता है। इसलिए मैंने अपना काम कल पर छोड़ दिया है जिसे मैं आम तौर पर नहीं छोड़ता।

“अजी क्या धरा है फैक्टरियों में अब! टैक्स, पावर कट, झगड़े टंटे, राज नीति और सबसे बुरी बला हैं ये यूनियन! मुनाफा तो छोड़ो अपनी जान तक जंजाल में फंस जाती है।”

“लेकिन हमारी तो अपनी कंपनी है लाला जी!” लाला लखपत राय की दलील को मैंने काटा है जो शायद हर ग्राहक या मिलने वाला नहीं कर पाता। लाला लखपत राय धनांद हैं और पैसे को पानी की तरह बहाते हैं। शायद इनकी ख्याति बांटने से इसलिए है कि इन्हें पैसे बटोरते किसी ने नहीं देखा या जिसपर बीती हो वह चुपचाप खून के घूंट पी कर होंठ सी लेता है!

“अपनी कमियों का परिणाम ही तो हम भुगत रहें हैं कुंवर। वरना आज मैं क्यों मशीनें बेचता!” कहकर लाला लखपत राय विह्वल हो गए हैं। उनकी आंखें आंसुओं से भर आई हैं।

उनके चेहरे पर मेरी नजर रुकी रही है। श्याम ने मुझे कोहनी से फिर मारा है। फुस फुस आवाज में कह गया है ये साला अव्वल नम्बर का चोर है।

“क्या हम लोग फैक्टरी जा कर देख लें? उसके बाद ही ..?” श्याम ने अपना स्पष्ट मत पेश किया है।

“हां हां! शौक से! अरे गाड़ी लाओ चंपक!” लाला लखपत राय गोरी गाय की तरह रंभाए हैं।

बाहर निकलते ही श्याम ने फिर कहा है – घुटा आदमी है यह दलीप। मशीनों में जरूर कोई चार सौ बीसी है। मैं कहता हूँ नई मंगवा लेंगे और चार छह माह सही ..!

“देख ही लेते हैं!” मैंने स्थिर मन से कहा है।

बंबई के रेल पेल और धोखाधड़ी से मैं और श्याम हफ़्तों जूझते रहे हैं। श्याम भी अब चुस्त लगने लगा है। हर बात इस तरह बीच से काट देता है जैसे पतंग की डोर हो और उसे काटने का हक विरासत में मिला हो। मैं भी उसे न रोकता हूँ और न टोकता हूँ।

एक फैक्टरी उखड़ रही है तो दूसरी लग रही है और एक हार गया है तो दूसरा जीतने के लिए तत्पर और संजीदा जान पड़ता है। ये विफल और सफल समाज के अंश कुछ अनुभव अंजाने में ही रेत पर छपी पदचापों की तरह छोड़ते जा रहे हैं। कौन कहां और कैसे गिरा का विश्लेषण कठिन नहीं है सिर्फ इसके लिए थोड़ी सी तर्क शक्ति चाहिए। यहां आ कर जो पूंजीपतियों की खोज मैं कर पाया हूँ उससे यही विदित होता है कि कोई भी अपनी पूंजी लगा कर खुश नहीं है। किसी को शासन प्रबंध तथा मिली सुविधाओं से शिकायत है तो किसी को राज नीतिज्ञों की भ्रष्ट नीतियों से गहरी निराशा हुई है। स्टाफ और लेबर जब चीख चीख कर अपनी भूख और गरीबी का नंगा नाच नाचते हैं तो मिल की उत्पादन क्षमता घट जाती है और घाटा टांगें तोड़ कर रख देता है। मालिक की समस्याएं मजदूरों की बेबसी से जब लड़ जाती हैं तो उनके बीच में एक उबाऊ तनाव पैदा हो जाता है जो सारे मानवीय सौहार्द को चाट जाता है। पार्टी बंदी, विनाशकारी योजनाएं, हड़ताल और घिराव-धरना और जुलूस सभी परिचित स्थितियां हैं जो रोज पैदा हो जाती हैं। मैं इन्हें जानता हूँ और महसूसता हूँ। इन्हीं के विकल्प खोजने की चाह तो मेरे मन में धरी है। तभी तो मैंने अपना आराम हराम कर रक्खा है।

“बोर हो गए यार! साली बंबई न हुई आफत के परकाले ..”

“बस बेटा! अभी से थक गए?” मैंने श्याम के आहत से मन को उमेठा है।

“थका कौन है बे! पर ..”

“मन भर गया है?”

“हां!”

“श्याम ..?”

“हूं हूँ!”

“तूने अभी बंबई की रंगीनियां नहीं देखीं!”

“दिखाई क्यों नहीं?”

“यार! ये काम का भूत जो सवार है!”

“अच्छा फिर सही। तब तक के लिए मैं बंबई के बारे में अपना मत और फाइनल रिपोर्ट नहीं देता!” श्याम ने हंसने का प्रयत्न किया है।

मैं जानता हूँ कि काम में आदमी को धकेलने वाली शक्तियां कितनी महान होती हैं। वरना तो आदमी कभी काम को छूए तक नहीं। मुझे हालांकि काम में धंसने की जरूरत बाबा ने नहीं छोड़ी है। पर जो अदृश्य शक्तियां मुझे आगे धकेले जा रही हैं कम सम्मोहन नहीं रखतीं। मैंने हर चुनौती से लड़ना स्वीकार लिया है ताकि हर पल को मैं जी जाऊं और सोफी को इस अकर्मण्यता की कालिख को धो कर पाक और परिपक्व दामन दिखा सकूं। इसमें निहित विश्वास मेरे लिए एक आधार शिला बन गया है और मेरा साहस एक अजेय चट्टान!

मेजर कृपाल वर्मा

Exit mobile version