कुछ तुमसे कहूँ
कुछ तुम सुनोगी
अब क्या कहूँ मैं
तुम क्या सुनोगी
बचपन निकल गया उड़ते-उड़ते
जवानी तुम संग खेले खाए
फ़िर वो निकल गई उड़ते-उड़ते
ब्याह दिया माँ परदेस में मुझको
तुम्हारा साथ छूट गया चलते-चलते
गिने दिनों में छोड़ गईं तुम
तुमसे माँ का रिश्ता ख़त्म हो गया देखते-देखते
तुम्हारी यादों संग अब रह गया है.. जीवन
जब भी तुम्हें मुड़कर अब देखती हूँ.. मैं
न जाने कहाँ खो गईं तुम देखते-देखते
आ जाओ माँ
फ़िर मिलो न आकर
नहीं तो यह समय भी बीतेगा
उड़ते-उड़ते
आओ अब मिला करो
रोज़ सपनों में तुम..माँ
कहीं शेष समय न निकल जाए
उड़ते-उड़ते

