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राम चरन भाग एक सौ इक्कीस

Ram charan

राम चरन के दिन का रुटीन अब आ कर सैट हो गया था।

सुबह वह मंदिर जाता था। मंदिर पहुंच कर पूजा के कपड़े पहनता था। सुंदरी ने वही पुराने कपड़ों के सैट बनवा दिए थे। दोपहर के बाद पूजा समाप्त कर और कपड़े बदल कर वो ऑफिस चला जाता था। लंच जनरल फ्रामरोज के साथ करता था। जनरल साहब के साथ उसकी खूब पटने लगी थी और बड़ा ही आनंद आता था जब वो अपने अनुभव बताते थे और लड़ी लड़ाइयों का बढ़ चढ़ कर वर्णन करते थे।

ऑफिस से लौटने के बाद राम चरन शाम की पूजा पाठ का नियम धर्म पूरा करता था और फिर शाम को मंदिर का ताला लगा कर पीछे के चोर दरवाजे से मंदिर के गर्भ गृह में प्रवेश करता था और किरन कस्तूरी के पूरे काम संभालता था। ऑपरेशन वंडरफुल जोर शोर से चल पड़ा था। हिन्दुस्तान में इस्लाम दो बातों के लिए जाने जाना लगा था – बिरयानी और वुमन।

सैक्स के भूखे और स्वाद के गुलाम हिन्दू युवक युवतियां आसानी से जाल में फंसने लगे थे। और इस्लामी जिहाद अब एक ठोस संभावना बन कर सामने आ गया था।

देर रात तक राम चरन गर्भ गृह में ऑपरेशन वंडरफुल को सफल बनाने के लिए हर संभव प्रयत्न करता था। घर लौटता था तो सुंदरी श्याम चरन के साथ सुख पूर्वक सो रही होती थी। ठंडा खाना खा कर वह चुपचाप सो जाता था।

“आप ..?” मंदिर में पूजा करने आई एक संभ्रांत महिला ने राम चरन को टोका था। “आप अब तक कहां थे?” उसने सीधा प्रश्न पूछा था।

राम चरन चौंका तो था पर संभल गया था।

“जी, मैं बहुत बीमार हो गया था।” राम चरन ने तनिक गमगीन आवाज में उत्तर दिया था।

“सो सैड।” उस महिला ने सर्द आह भरी थी। “अब तो ठीक हैं न आप?”

“जी बिल्कुल ठीक हूँ।”

“गॉड ब्लैस यू।” कहती हुई वह महिला मंदिर से बाहर चली गई थी।

की गलती का अहसास हुआ था राम चरन को। उसे यों उन पहले वाले पूजा के परिधान में अब मंदिर हरगिज नहीं लौटना चाहिए था। लेकिन ..

“ऑपरेशन वंडरफुल की स्पीड और बढ़ा दो।” उसके दिमाग ने एक हल सुझाया था। “इससे पहले कि हिन्दू जागें, काम तमाम हो जाना चाहिए।” उसके दिमाग ने साफ-साफ आदेश दिए थे।

कपड़े बदल कर राम चरन ऑफिस में लंच के लिए पहुंचा था।

“आइए सर!” जनरल फ्रामरोज ने राम चरन का स्वागत किया था। “माई मिसिज रोजी एंड माई डॉटर रानी।” मुसकुराते हुए उन्होंने उन सब का परिचय कराया था।

“भाई मन था हमारा कि आप से अवश्य मिलें।” रोज बोली थी। “हम देखना चाहते थे कि वो कौन सा फरिश्ता है .. जिसने ..?”

“यू कार वैलकम मैम।” राम चरन अदब से बोला था। “बैठिए न।” उसने रानी से आग्रह किया था।

रानी को देखते ही राम चरन को भूली याद की तरह संघमित्रा याद हो आई थी।

“सच कहती हूँ चरन साहब।” रोज ने बैठते हुए बात जारी रक्खी थी। “हम तो हैप्पी गो लक्की परिवार की तरह मौज मस्ती में जीते रहे। लेकिन जब रिटायर हुए तो समझ आई कि हमारे पास तो एक घर खरीदने के पैसे ही न थे। कई बार गिना जो मिला था – लेकिन वो तो सत्यमेव जयते की तरह अटल ही बना रहा था। भला हो आपका वरना तो हम लटक जाते।” रोज खुल कर हंसी थी।

राम चरन को एकाएक सलमा याद हो आई थी। ए हैप्पी गो लक्की सलमा – जिसके खर्चे का कोई आदि अंत ही न था। सामने खड़ी हंस रही थी। लेकिन पाकिस्तान की तो बात ही अलग थी। वहां तो जनरल्स का राज था। और ये इंडिया था।

“भारत सरकार ..?” राम चरन ने पहला तीर छोड़ा था।

“भाई क्या करे भारत सरकार?” उत्तर जनरल फ्रामरोज ने दिया था। “इतनी गरीबी है यार, किस-किस का पेट पाले भारत सरकार?” वो बताते रहे थे।

राम चरन का वार खाली गया था। लेकिन वो जानता था कि जनरल फ्रामरोज हिन्दू न था। और हिन्दू एक्स सर्विस मैन उससे जुड़े थे। आज नहीं तो कल ये करिश्मा होना ही था। अब तक हिन्दुस्तान में फौजियों द्वारा तख्ता पलट न हुआ था। लेकिन अब होना था।

ऑपरेशन वंडरफुल के लिए ये एक नायाब खबर थी।

मेजर कृपाल वर्मा रिटायर्ड

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