माँ..!!
कहाँ हो तुम
मेरी आवाज़ सुन आजाओ
न!
कितनी तेज़ी से
आवाज़ हुई
कि तुम्हारी
रेल निकल
गई
कौन सी रेल में
बैठ निकल
गईं तुम
मैं देखती
ही रह गई
इतनी तेज़ी से
क्यों चढ़ गईं
थीं माँ तुम
छोड़ कर सबको
दौड़ी चली आई
थी मैं
पर तुम्हारी रेल निकल
गई
अब हर रेल के आते-जाते
इंतज़ार करती हूँ
तुम्हारा
अब नज़र नहीं हटती मेरी
रेलों पर से
हर खिड़की को
रेल की
झाँक-झाँक कर
देखूँ
कहीं ऐसा न हो
पता न चले
मुझे और तुम
बैठी रह जाओ
और एकबार फ़िर
तुम्हारी रेल निकल जाए