जब भी हम मेरे अपने लिखते हैं, या फिर अपनों का ज़िक्र करते हैं,तो हमारा ध्यान रिश्ते नाते, माँ-बाप ,भाई-बहन पर जाता है। यहाँ पर मैं जो “मेरे अपनों “की बात कर रहीं हूँ, वो न तो मेरे नाते रिश्तेदार हैं, न ही मेरे माता-पिता,न ही मेरे भाई बहन हैं। पर फ़िर भी मेरा एक रिश्ता है उनसे जो मैं हर रोज़ महसूस करती हूँ, और उस रिश्ते को मानवता से जोड़ती हूँ। बहुत अच्छे शब्द नहीं हैं मेरे पास अपने अहसासों को अभिव्यक्त करने के लिए,क्योंकी पेशे से मैं एक लेखिका नहीं हूँ, एक आम स्त्री हूँ जो अपनी बातें और अपने अनुभव आप सभी मित्रों के साथ बाँटना चाहती है। हाँ! तो बात कर रही थी अपने ,अपनों के विषय में…जो हैं मेरे पेड़-पौधे। बचपन से मुझे पेड़-पौधों और फूलों से कोई ख़ास लगाव न था,अच्छे और सुन्दर तो लगते थे..जैसे सभी को लगते हैं, पर और कोई लेना-देना ख़ास नहीं था। विवाह के पष्चात मैं भोपाल आ गई। भोपाल का वातावरण और मिट्टी बहुत ही अच्छी है।बहुत ज़्यादा बारिश होने के कारण शहर में हरियाली बहुत है,और मिट्टी भी उपजाऊ है, काली मिट्टी होती ही अच्छी है पेड़-पौधों के लिए। यहाँ आपको हर घर में अच्छे फूल-पौधे देखने को मिलेंगे। अचानक मुझे भी गमले रखकर फूल-पौधे लगाने का शौक हो गया,जो पहले कभी न था। मेरी छत्त काफी बड़ी है,और छत्त पर धूप छाँव भी ठीक-ठाक रहती है,इसीलिए छत्त पर एक-एक करके गमले रखकर यह शौक मैंने पाल लिया। कौन सा पौधा कहाँ रखना है, कैसे क्या करना है,इन सब बातों में मैं दिन रोज़ दिलचस्पी लेने लगी थी।
गुलाब के फूलों से मुझे बेहद प्यार हो गया था, जो कि आपको यहाँ भोपाल में हर घर में ज़रूर मिल जायेंगे। देसी गुलाब और वैरायटी गुलाब सबका पता चलता जा रहा था मुझे। कहाँ कौन सा फूल रखना है यह भी सीखती जा रही थी मैं। शुरू में हमने छोटे यानी मीडियम साइज के मिट्टी के गमले खरीदे थे, उनमें मैंने काफी सारे इन्नर प्लांट लगाए कुछ इधर-उधर से कटिंग्स लाकर लगायी थीं… और कई रंगो के गुलाब के फूल भी लगाये। मेरे पास वैरायटी वाले गुलाबों के कई रंग थे…जैसे..सफ़ेद, लाल-काला मिक्स,पीच और पोस्ट-आफिस रेड कॉलोर का गुलाब कुल मिलाकर शायद तेरह रंगों के गुलाब थे,उनमें से दो देसी लाल रंग के गुलाब भी थे। बोगेन्विला के फूल भी लगाए थे मैने जिनमे गोल्डन,लाल और पिंक कलर है मेरे पास अभी तक।जैसा कि मैंने बताया कि शुरू में ज़्यादा नॉलेज न होने के कारण मैने पौधे मीडियम साइज के गमलों में ही लगाए थे,जब वह पौधे बडे होने लगे तो उनमें से कुछ पौधे मर गए और निकालकर फेंकने पड़े। वैसे तो मैं अपने पेड़ पोधो का काम खुद ही कर लेती हूँ, पर कभी जो ज़्यादा मुश्किल सा लगता है ,तो माली भी बुला लिया करती हूँ। उस दिन मैने अपने घर में पौधे का काम करने के लिये माली भइया को बुलाया हुआ था। जो पौधे मर गए थे,उन्हें माली ने गमले से निकालकर फेंकने के लिए रख दिए थे। मैने पूछा था”भइया क्या कर रहे हो?”जवाब मिला था”अजी,साहब! यह पेड मर गया है फेंक देते हैं”। कम उम्र और जीवन का तजुर्बा न होने के कारण मैं माली भइया के सामने ही दुखी हो गयी थी। मैने कहा था”अरे!भईया मुश्किल से इस कलर का पौधा ढूँढ़कर लायी थी,और आप कह रहे हो मर गया फेंकना पड़ेगा”। माली का कहना था”पौधा ही तो है साहब!और आ जायेगा,इन्सान छोड़कर चले जाते हैं”। तब इस बात की गहराई कम उम्र होने के कारण मेरी समझ में न आई थी, या यूँ कह लीजिए बचपन से भरे-पूरे खानदान और एक खुशमिज़ाज़ माहौल की खुशकिस्मत बालिका रही हूँ। कभी किसी बात या फिर किसी रिश्ते का आभाव न देखा है,और न ही महसूस किया है। मैं बहुत ही खानदानी और संस्कारी माहौल में पली बड़ी महिला हूँ। दुख किसे कहते हैं, यह अहसास कभी नहीं हुआ मुझे। जैसे-जैसे इन्सान की उम्र बढ़ती है, ज़िन्दगी समझ आने लगती है।
विवाह के कुछ पशचात ही मुझे मेरे नानाजी छोड़ कर चले गये थे,जिनसे मुझे बेहद लगाव था,धीरे-धीरे समय गुज़रता चला गया,और बहुत से ऐसे रिश्ते हैं जो कि मेरे दिल के बेहद करीब थे,आज मेरे साथ नहीं हैं। सबसे प्यारा रिश्ता और अहसास एक इन्सान के लिए उसकी माँ ही होती है..बहुत अफ़सोस के साथ मुझे लिखना पड़ रहा है कि बीमार होने के कारण,और शरीर के साथ न देने के कारण उन्होंने भी मेरा साथ छोड़ दिया। आज उन माली भईया के वो शब्द”अजी, साहब! इन्सान छोड़कर चले जाते है,ये तो सिर्फ पौधा ही है”। कि गहराई और सच्चाई समझ में आती है। जब भी मैं अपने पेड़ पौधों के साथ होती हूँ, उन्हें ठीक कर रही होती हूँ, तो पहले की तरह पौधे के खराब होने या मरने पर ज़्यादा अफसोस नहीं करती,क्योंकि वक्त ने मुझे कुछ और ही शिक्षा दे डाली है। खैर!धीरे-धीरे मेरे पेड़ पौधे बड़े होने लगे। मैने अपने पौधों की देख-रेख के लिए कोई माली नहीं रखा हुआ है,मैं खुद ही देख-रेख करती हूँ। बहुत ज़्यादा ज़रूरत पड़ने पर ही माली को बुला लेती हूँ। जैसा कि मैने बताया था कि कई रंगो के गुलाब लगाये थे ,मैंने।उनमें से कुछ गुलाब के पौधे गमले में ही मर गए थे।बेहद दुख हुआ था, मुझे क्योंकि प्यार से लगाये और सींचे थे मैने। एक बहुत ही सुन्दर गुलाब का पौधा था मेरे पास ,जिसका रंग सफ़ेद और गुलाबी मिक्स था,वैरायटी वाला रोज़ था। इस पौधे का गमला मैने एक कोने में रखा हुआ था,इस गमले में इस रंग का गुलाब कभी-कभी देखने को मिलता था। बारिशों में कभी एक -आध खिल जाता था, और बाकी पूरे सीजन कोई इस रंग का फूल देखने को नहीं मिलता था। फिर अचानक एक दिन छत्त पर घूमते हुए मेरे दिमाग में एक ख़याल आया..मैने देखा एक बड़ी सी खाली पेंट की टंकी रखी हुई है, बस!उस बड़ी टंकी के तले में छेद करके मैने मिट्टी भरी और इस सफ़ेद और गुलाबी रंग वाले गुलाब को शिफट कर दिया। कब मैने यह गुलाब मिट्टी के गमले से बाहर निकाला तो क्या देखा मैने कि मिट्टी कहीं नहीं दिख रही है, केवल जड़ो से पैक हो गया है पौधा। जड़ो का इतना ठोस नेटवर्क हो गया था, कि पौधे को साँस आनी मुश्किल हो रही थी। खैर!मैने इस गुलाब को पेंट वाली टंकी में ट्रांसफर कर पानी-वानी देना शुरू कर दिया था,कुछ दिनों में नतीजा सामने आया था, पौधा खुश हो गया था,नयापन फूटता हुआ दिखाई दे रहा था, साँस आ गयी थी पौधे को …फिर मैंने इस गुलाब की टंकी को धूप वाली जगह में रख दिया था। फाइनल रिजल्ट इस शिफट किये हुए गुलाब का यह आया था,अब पौधा नई-नई गुलाब की कलियों से भर गया था,और दिन रोज़ नई पत्ती और नई शाखाएँ आ रहीं थीं।
इस गुलाब के पौधे की शिफ्टिंग ने मुझे एक नई जीवन की सच्चाई के साथ जोड़ दिया था,वो यह कि कभी-कभी जीवन में उन्नति करने के लिए गमला और मिट्टी दोनों का बदलना ज़रूरी होता है,अगर हम इस बदलाव से डरते रहेंगे तो हम भी खत्म हो जाएंगे और हमसे जुड़े पत्ते और शाखायें रूपी और भी किसी रिश्ते का वजूद न रहेगा। गमले के बदलने से यह बात मैने बिल्कुल अच्छी तरह सीख ली है,कि परिवर्तन लाने के लिए गमला, मिट्टी और स्थान का बदलना बेहद ज़रूरी होता है। इन्सान को अपने और अपनी काबलियत पर भरोसा रखते हुए परिवर्तन से डरना नहीं चाहिए। क्योंकि होता वही है जो परमात्मा ने निर्धारित कर रखा होता है। मृत्यु अटल है,इस सत्य को जानते हुए हर इंसान को अपनी ज़िंदगी में अपने अंतर्मन से आती हुई आवाज़ को सुनकर निर्णय लेना चाहिए,डरकर नहीं।परमात्मा पर भरोसा करके आगे कदम बढ़ाने वाले इन्सान को ही मेंज़िले मिलती हैं,कभी-कभी अपनी जीत का झंडा लहराने के लिए मिट्टी और गमला दोनों बदलने पड़ते है।
इसी सच्चाई को स्वीकारते हुए मैंने सभी गुलाब के पौधों को बड़े गमलों में शिफट कर उनकी जगह बदल दी। आज सभी फूलों से भर गए हैं, और ऊँचे भी हो गए हैं। जैसा मैंने अपने बहुत ही सुन्दर पोस्ट आफिस रेड रोज का ज़िक्र किया था, इस रोज़ को भी मैंने बड़ी टंकी में शिफट कर दिया था पर पोसिटिव रिजल्ट आने की बजाए पौधा सूखता जा रहा था…मैं बहुत गजब गई थी पूरा पौधा चेक कर डाला था, कि कहीं कीड़ा तो नहीं लग गया है,पर नहीं ऐसा कुछ भी न था। खूब पानी भी दिया,सारे तरिके करके देख लिये थे,पेर पौधे में कोई इम्प्रूवमेंट नज़र नहीं आ रहा था,हारकर मैने गमला उल्टा कर दिया,और देखा कि’अरे! तले में तो मैं छेद करना ही भूल गयी हूँ,”। बस!फटाफट बड़ा स्क्रू ड्राइवर लेकर छेद किया,गमला सीधा करके उसमें पानी-वानी भरा, पर अफसोस …इस खूबसूरत से गुलाब को में बचा नहीं पाई ,पौधा मर चुका था। बहुत बुरा लगा मुझे ,और यही सच्च सामने आया,कि जो होना होता है,होकर ही रहता है,आप कितने ही समझदार बन लीजिये होनी कभी नहीं रूकती।इस गुलाब के पौधे का अंत ऐसे ही लिखा था,शायद इसीलिये में गमले के तले में छेद करना भूल गयी थी,परमात्मा अपने ऊपर कुछ भी नहीं लेते हम इंसानों को ही मोहरा बना कर इस्तेमाल करते हैं।
इसी तरह से कुछ गेन्धे के न चाहते हुए पौधे गमले में हो गए थे,तो वो भी इन अपने पोधों के बीच मे से निकल फेंके…और फिर वही जीवन की सच्चाई को अपने पौधों और अपने आप से कनेक्ट कर दिया मैने…कि अगर आप नेगेटिव सोच वाले लोगों से घिरे हैं तो आपका ऊपर उठना मुश्किल होता है…फिर वही मेरे पौधों की तरह गमला और मिट्टी हिम्मत कर के बदल डालो।

