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खानदान 79

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रामलालजी पूरी तरह से बिस्तर में आ गए थे..  बस! इंजेक्शनों पर ही चल रहे थे। ऐसे परिवार में जहाँ पैसों को ही महत्व दिया जाता हो.. रामलालजी अपनी हिम्मत पर ही सांसें ले रहे थे.. ऊपर से उनकी जीवन साथी के तो कहने ही क्या थे। खैर! चल ही रही थी.. दादू की ज़िन्दगी दवाइयों और इंजेक्शनों पर।

रमेश अपनी अलग दुनिया रंजना के साथ बसा कर बैठा ही था। न कोई कारोबार और न ही कोई परिवार.. चौबीस घन्टे बस! रमेश के दिमाग़ में रंजना ही घूमती रहती थी। “ उनके कई एकड़ ज़मीन है.. देखना उस पर मैं ही कब्ज़ा करूँगा”। रमेश ने रंजना की संपत्ति के विषय में कहा था।“ अरे! मैने उससे कह दिया है! मैं ही तेरा बाप भाई हूँ! तू जो भी समझ ले!’।

रमेश अक्सर यही एक राग अलापता रहता था.. कि रंजना के बाप-भाई की कमी वो ही पूरी करेगा।

रमेश अक्सर ही बोलता रहता था, कि रंजना के पिता रंजना और उसकी तीन बहनों को बचपन में ही अकेला छोड़कर चले गए थे.. माँ ने अकेले ही तीन बहनों की परवरिश की थी। रंजना की माँ थी तो रमेश की ही उम्र की.. पर रमेश उसको माँ ही बोलता था। पूरे परिवार के साथ रमेश ने अच्छी-खासी प्यार भरी दोस्ती गांठ रखी थी.. छोटी बहन से लेकर बड़ी बहन तक सबकी नौकरी जम कर कर रहा था।

“ वो मुझे राखी बाँधेगी!”।

रक्षाबंधन वाले दिन रमेश के पास रंजना की छोटी बहन का फ़ोन आया था,” भइया! आप जहाँ भी हो! फ़ौरन आ जाओ! मुझे राखी बाँधनी है!”।

और रमेश ने आँव देखा था न तांव फ़ौरन त्यौहार मनाने भागा था। लोगों से कहता फिरता था.. मेरी रिश्तेदार है। पूरे इंदौर में लिये भागता था.. रंजना को।

“ अरे! वो तो आपके हस्बैंड ले गए!’।

यह बात एक उस दिन की है.. जब रमेश तीनों माँ-बेटियों को सफ़ारी में बैठाकर रंजना की बहन की शादी की शॉपिंग करवाने के लिये ले गया था.. और किसी एक साड़ी की ख़रीदारी की भूल के वक्त दुकानदार ने रमेश को रंजना का पति बताते हुए.. कहा था.. अरे! वो तो आपके हस्बैंड ले गए। ज़्यादातर लोग रंजना और रमेश को पति-पत्नी ही समझने लगे थे।

रमेश की दुनिया अब रंजना ही थी.. फ़िर एक दिन अचानक..

“ ये पैर को क्या हो रहा है! ये तो मोटा और लाल होता जा रहा है!”।

एक दिन अचानक जब रमेश और सुनीता संग बैठे हुए थे.. तो सुनीता की नज़र रमेश के पैर पर पड़ी थी.. जो सूजता ही जा रहा था.. ऐसा लग रहा था.. मानो फट ही जायेगा। रमेश तरह-तरह के मलहम घिस रहा था.. पैर पर. और उस रंजना से फोन पर बात करने में मशगूल था। सुनीता का ध्यान केवल रमेश के पैर पर ही था.. आख़िर धर्मपत्नी जो थी.. रमेश की। हैरानी तो सुनीता को तब हुई थी.. जब अचानक से ही रंजना का फ़ोन कट गया.. और रमेश अपने पैर का दर्द भूलकर रंजना के लिये परेशान हो गया था। पर रंजना मैडम ने रमेश से फोन पर बातचीत अचानक से ही क्यों बन्द कर दी थी… ऐसे थोड़े ही बात बीच में काटते हैं.. रमेश तो बेचारे रंजना की हाँजी में ही रहता था.. गलती से भी कोई गलती करता ही नहीं था। “ अरे! हाँ!! अब याद आया था, रमेश को! कि रंजना के फ़ोन में बैलेंस ख़त्म हो गया है.. बेचारे रमेश ने अपने पैर का दर्द भूलकर रंजना के फ़ोन में बैलेंस डलवाया.. तब जाकर महारानी जी का दोबारा फ़ोन आया था.. और दोनों ने बात करीं थीं।

ऐसी भी क्या माशूका हो गई थी.. डलवा लेती फ़ोन में बैलेंस!!

पर यहाँ भी खेल फैक्ट्री के आधे मालिक के साथ ही चल रहा था।

“ अगर थोड़ी सी देर और हो जाती.. तो पैर ही काटना पड़ जाता!”।

रमेश के ऊपर शनिचर का प्रकोप था। कौन लेकर भागा था.. रमेश को अस्पताल.. हल्के से चेहरों पर से मुखोटे हिले थे.. कहानी में एक ज़बरदस्त नया मोड़ आ रहा था.. अब आगे क्या???? जानने के लिये जुड़े रहिये रामलालजी के परिवार के साथ.. और पढ़ते रहिये खानदान।