अनिताजी ने बेटी के पास तरह-तरह का सामान देखते हुए.. खुश हुईं थीं.. और कहा था,” अपना, तेरा और हमारा कुछ नहीं है.. जो कुछ भी है.. सब अपना ही होता है.. बस!.. तू खुश रहना सीख”।
“ पर माँ!. इन से सब ड्रामों से मेरा घर तो बसेगा ही नहीं”।
सुनीता ने अनिताजी से कहा था।
“ उसकी तू चिन्ता मत कर.. वो भी हो जाएगा.. मस्त रहना सीख”।
अनिताजी ने सुनीता को सब-कुछ सोचने से मना करते हुए.. जो कुछ और जैसे भी मिल रहा था.. उसी में मौज मनाने को कहा था। वैसे एक तरह से सुनीता की सोच बिल्कुल सही थी.. जब परिवार में किसी बात की कमी नहीं थी.. तो फ़िर बजाय उड़ाने-खाने और मौज मनाने के घर बसा लेना था। अनिताजी के लाख समझाने पर भी सुनीता का दिमाग़ इसी उधेड़-बुन में लगा रहता था.. एक अजीब सी सोच में डूबी रहती थी। “ इस तरह से frustrate होने का कोई भी फ़ायदा नहीं है.. रमेश अपनी सोच नहीं बदलेगा!”।
सुनील ने सुनीता को ग़हरी सोच में डूबे हुए देखकर कहा था। और सही भी था.. उस घर में रहते हुए.. अलग से घर बसाना असंभव बात लग रही थी.. वहाँ तो ज़िन्दगी कलाकारों से घिरी हुई थी। और अभी तो रमा और विनीत भी इसी मुद्दे को लेकर लाइन में लगे हुए थे। “ लगे रहो.. भइया!”।
उस घर में रहते हुए.. तो अलग से किसी में कुछ भी करने की हिम्मत नहीं थी.. दर्शनाजी जो बैठीं थीं.. जेलर की तरह.. हाई सिक्योरिटी पर।
रमेश सुनीता को लेने आ गए थे.. और बाज़ार से प्रहलाद के लिये महँगे खिलौने लेने जाने लगे थे,” इसकी क्या ज़रूरत है.. रहने दो!.. बच्चा है, अभी प्रहलाद!.. पढ़ेगा- लिखेगा नहीं!”।
सुनीता ने रमेश को बहुत समझाने की कोशिश की थी। पर रमेश की बातें कुछ कम ही समझ आया करतीं थीं। आँखों पर रईसी की पट्टी बाँध बंदा अपनी ही धुन में आगे बढ़ रहा था। खैर! बच्चों के लिये महँगे खिलौने वगरैह ख़रीद सुनीता और रमेश इंदौर वापस चले गए थे।
इंदौर पहुँचते ही रमेश ने प्रहलाद और नेहा के लिये खरीदी हुई महँगी कार और सारे खिलौनों की प्रदर्शनी लगाई थी.. खिलौने देखते ही दर्शनाजी ने रमेश से कहा था,” आड़े क्यों धर दिये.. ऊपर ले जांदा!”।
इस वक्त तो दर्शनाजी ने रमेश से कुछ भी न कहा था.. पर उनका मतलब यह था… कि तू जो कुछ भी लाता है.. उसे सीधे चुप-चाप ऊपर कमरे में ले जाया कर।
“ मेरे बाप का खा रहे हो सब!.. मेरे बाप के टुकड़ों पर पलते हो!”।
अगले दिन सुबह से ही रामलालजी के आँगन में प्रवचनों की बरसात होने लगी थी। दर्शनाजी ने मेरा बाप, मेरा बाप कर-कर कान पका दिये थे। अब तो पूरे घर में शोर हो रहा था.. कि सब उनके बाप के टुकड़े खा-कर पल रहे हैं। इसी शोर के बीच रमा की आवाज़ आई थी,” आप ये बात हमें मत बोल जाना.. विनीत को तो आपने यह भी नहीं कहा है.. कि.. ले!. तू भी अपने बच्चों को टॉफी खिला लेना!.. जो आपके बाप का खा रहे हैं.. उनको बोलो”।
‘ सब खा रहें हैं.. मेरे बाप का!.. फैक्ट्री में ट्रैक्टर मेरे बाप के पैसों का ही न है.. कमाई तो उसी ट्रैक्टर से हो रही है!”।
दर्शनाजी ने रोब के साथ ट्रैक्टर की धौंस दिखाते हुए बोला था।
अब ऐसे पैसे का क्या फ़ायदा न तो साँस ली जा सकती है.. और न ही खुल कर ज़िन्दगी के मज़े ही लुटे जा सकते हैं।
क्या??? हौंडा सीटी वाला मार गया!!!!!!