रात का समय हो चुका था.. परिवार में इंदौर किए गए फ़ोन पर अभी चर्चा चल रही थी। सुनील ने सुनीता से साफ़-साफ़ शब्दों में कह डाला था.. कुछ भी हो इंदौर से अगर तुम्हारे लिये कोई  फ़ोन आता है, तो तुम बिल्कुल भी बात मत करना.. और फ़ोन भी मत उठाना। अगर कोई फ़ोन उठाएगा तो वो मैं या फ़िर पिताजी होंगें। सुनीता ने अपने बड़े भाई को एक बार भी यह न बताया था… कि उसकी रमेश से रास्ते से किए गए फ़ोन के विषय में बातचीत हो चूकी हैं। क्यों नहीं बताया था.. सुनीता ने सुनील को कि रमेश से उसकी पहले ही बातचीत हो चुकी हैं.. एक बदतमीज़ आदमी को यूँ सिर पर रखना और उसकी की गई बदतमीजियों को बढ़ावा देना कहाँ की अक्लमंदी थी। अगर यही करना था, तो बाप-भाई आगे सुनीता को अपनी परेशानी का ढिंढोरा पीटना ही नहीं चाहये था.. फ़िर तो अनिताजी की बात मान आराम से ही रहना था। खैर! सुनील को सुनीता और रमेश के बीच की बिल्कुल भी जानकारी न थी, उसने साफ़-साफ़ शब्दों में कह डाला था,” कल सवेरे में रामलालजी से खुद ही बात करूँगा.. कि वे रमेश को कुछ देना चाह रहे हैं.. कि नहीं”।

सुनील ने सुनीता को समझाया भी था.. कि बदतमीज़ आदमी को सिर पर चढ़ाना बेवकूफ़ी होती है। इतनी बड़ी सपोर्ट सुनीता के पीछे खड़ी थी.. पूरा का पूरा परिवार सुनीता का साथ देने के लिये तैयार खड़ा था.. फ़िर सुनीता पीछे क्यों हटी थी.. क्या दिमाग़ में चल रहा था.. उसके.. क्यों इतनी कमज़ोर पड़ रही थी.. की कोई भी उस पर हावी हो सकता था। सुनील ने सुनीता को एक बार फ़िर से समझाया था. कि,” अगर रमेश का फ़ोन आता है, तो उससे भी बदतमीज़ी से ही बात करना ताकि उसे पता चल जाए.. कि सामने वाले को कैसा लगता है”।

बातें तो सुनीता सब की सुन रही थी, पर न जाने कौन सी सोच का धुआँ उसके अन्दर चल रहा था। शाम होते ही सुनीता ने पिताजी से कहा था,” पिताजी! मुझे रमेश से बात करनी है”।

अब घर से बात न करवा सकते थे.. मुकेशजी इसलिये पहले कुछ सोचा! और फ़िर बोले थे,” डर मत! अभी फैसला हो जाने दे! अभी हम तेरी मदद कर सकते हैं.. और तेरा फैसला भी करवा देंगें… नहीं तो तू आज से पन्द्रह साल बाद इसी दरवाज़े पर खड़ी हो जायेगी”।

पिता की राय भी सुनीता के दिमाग़ के ऊपर से होकर चली गई थी। खैर! मुकेशजी ने फ़िर कुछ सोचा था, और बोले थे,” चल! ठीक है! मैं तेरी रमेश से बात करवा देता हूँ”।

मुकेशजी और सुनीता रमेश से बात करने के लिये पास के टेलीफोन बूथ पर पहुँच गए थे। मुकेशजी टेलीफोन बूथ के बाहर खड़े हो गए थे, और सुनीता अन्दर रमेश से फ़ोन पर बात कर रही थी। “ तुम्हारे घर में ये शकुनी है.. मैं ये कर दूँगा मैं वो कर दूंगा”।

रमेश सुनीता से फ़ोन पर फ़िर से वाहियात बक़वास किए जा रहा था.. और सुनीता रमेश की बकवास सुन रही थी। सुनीता ने रमेश की सारी वाहियात बक़वास सुनी.. फ़ोन रखा, और टेलीफोन बूथ से बाहर आ गई थी। पिताजी बाहर ही खड़े थे.. पर सुनीता ने पिताजी को कुछ भी न बताया था.. और उनके साथ सीधे घर आ गई थी। रमेश तो रमेश था ही.. पर यहाँ सुनीता भी पूरी की पूरी ग़लत थी। पता नहीं क्या सोच कर रमेश जैसे दो कौड़ी के आदमी को इतनी शय दे रही थी। पढ़ी-लिखी होकर भी समाज में एक कमज़ोर व्यक्तित्व का प्रदर्शन कर रही थी.. सुनीता। सुनीता अपने अन्दर खुद कहीं पर कमज़ोरी महसूस कर रही थी.. इसलिये बार-बार एक मूर्ख इंसान की तरफ़ दौड़ रही थी।

खैर! पिता संग अब घर लौट आई थी.. सुनीता। शाम को सुनीलजी, मुकेशजी और सुनीता अब एक ही कमरे में थे.. सुनीलजी ने कहा था,” धुआँ है.. तो आग पक्का होगी ही। कब कमाना-खाना सीखेगा ये.. रमेश!”। मुकेशजी सुनील की बातें चुप-चाप और गौर से सुन रहे थे। आख़िर बात तो सही कही जा रही थी। पर फ़िर भी मुकेशजी रमेश की ही तरफ़दारी करते हुए कहा था,’ अरे! सीख जाएगा.. हर घर का अपना-अपना तरीका होता है, कोई-कोई थोड़ा लेट ही काम-धंधे से लगता है”।

खैर! सुनील अपने पिता की बात को बिना ही काटे वहाँ से चला गया था। अब सुनीता ही अपने पिता के संग अकेली कमरे में रह गई थी.. और मुकेशजी ने सुनीता से सवाल किया था,” कल को कमा कर कौन!खिलायेगा.. ये तो कुछ करता नहीं है.. अगर रामलालजी ने कुछ न दिया तो!”।

“ कमाने-खाने की चिन्ता नहीं है, मुझे! बस! ये जो लड़की पाल रखी है.. यह भाग जाए”। सुनीता ने अपने पिताजी को जवाब में कहा था।

क्या कर रही थी.. सुनीता! क्यों एक पढ़े-लिखे और जागरूक परिवार की होकर भी कदम-कदम पर अपनी मूर्खता का प्रदर्शन कर रही थी। जो सुनीता कर रही थी, उसे पतिभक्ति नहीं बेवकूफ़ी और कमज़ोरी का नाम दिया जाता है। तभी तो रमेश असल में कुत्ते की जात का होते हुए शेर की तरह दहाड़ रहा था.. जान चुका था.. की धर्मपत्नी निहायत ही संस्कारी और मूर्ख स्त्री है। चलो! भई! बाप-भाई को लड़की का क़िस्सा बता कर बेचारों को परेशान भी किया.. और अब खुद ही एक कदम पीछे यानी दोबारा से पतिदेव रमेश की तरफ़ सरक समाज के सामने कमज़ोरी का उदहारण बन कर खड़ी हो गई थी।

अब रमेश और दर्शनाजी से सुनीता की फ़ोन पर एक बार फ़िर से बात हुईं.. अब माँ ने सुनीता को एक अलग दृष्टिकोण से बात को समझाने की कोशिश की थी।

क्या सुनीता जागरूक तरीके से सोच पाएगी इस विषय को.. या फ़िर डरा सहमा सुनीता का दिमाग़ फ़िर सुनीता को उसी कुएँ में दखेल देगा।

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