अब माँ की कही हुई बातों पर सुनीता आराम से अमल कर रही थी। बाहरी अमल करते हुए सुनीता अपने संग सेतू को लिये घूम रही थी। सुनीता की सोच उसके चेहरे पर छपती जा रही थी.. जिसको देख अनिताजी ने एक बार सुनीता को फ़िर से समझाया था,” कोई बात नहीं घूमने दे लड़की के साथ! पर तू आराम से रह”।
चलो! कोई बात नहीं, होता है.. पैसे वालों के नवाबों के रईस शौक तो होते ही हैं। सुनीता को तो आराम से ही रहना पड़ता.. पर क्यों पाल रहा था, रमेश लड़की!. .. सुनीता की अभी उम्र कम थी.. जिसके कारण अभी उसका तजुर्बा भी कच्चा था.. यह बात गहराई से एक बार अनिताजी को ज़रूर सोचनी चाहिए थी। आख़िर एक महिला ही दूसरी महिला की तकलीफ़ बेहतर समझ सकती है। अनिताजी को बाहर मुकेशजी के साथ किसी काम से जाना पड़ गया था.. रास्ते में गाड़ी में पती-पत्नि की आपसी बातचीत हुई और अनिताजी ने रमेश और सुनीता का क़िस्सा मुकेशजी के आगे बता दिया। लड़की रखने की बात सुनते ही मुकेशजी ने कहा था,” रमेश इस तरह का लड़का लगता नहीं है.. ज़रूर सुनीता को कोई गलतफहमी या फ़िर शक है.. बिटिया से कहो ऐसा कुछ नहीं है.. आराम से रहे”।
“ मैने भी सुनीता को यही समझाया है”। अनिताजी ने मुकेशजी से कहा।
यह बात अब घर के बड़े सुपुत्र सुनील जी के आगे आ गई थी। जिन्होंने भी अपने माँ-बापू को यही कहा था, “ ज़रूर सुनीता को कोई गलतफहमी है.. रमेश इस तरह का आदमी नहीं है”।
खैर! जो भी हो! इस वक्त परिवार रमेश की ही तरफ़दारी कर रहा था। रात का समय था.. घर में सभी सदस्य सो रहे थे, कि रमेश के फ़ोन की घन्टी बजी थी,” मैं मंदिर में खड़ा हूँ, सेतू भी मेरे साथ है.. अरे! क्या बताऊँ यह रो रही है.. इसने मुझे भी रुला दिया है.. बेचारी सीधी-साधी है! इसके आँसू पोंछने तो बनते ही हैं”। इतना कह कर रमेश वाकई में फ़ोन पर ही रोने लग गया था।
सुनीता फोन पर हो रहे बातचीत रूपी नाटक को अभी पूरी तरह से समझ पाती कि रमेश ने तुरन्त ही अपना रोना कम कर सिसकते हुए कहा था,” अरे! शादी कर लूँ क्या! मैं इससे! बहुत टेंशन हो रही है!”। और फ़ोन कट गया था। दोबारा इस तरह का कोई फ़ोन सुनीता को इस बीच नहीं आया था। सुनीता और रमेश की फ़ोन पर यह बातचीत लगभग एक घन्टे तक चली थी.. जिसको केवल एक ही इंसान नोट कर रहा था, वो थे.. मुकेशजी।
रमेश उधर से इतनी ज़ोर-ज़ोर से फ़ोन पर बक़वास कर रहा था.. और इधर सुनीता की हालत ख़राब हो रही थी। फोन कटने के बाद सुनीता की बात पर गौर कर रहे मुकेशजी ने सुनीता को आवाज़ देकर अपने कमरे में बुलाया था.. और पूछा था,” क्या हो गया! ये रमेश इतनी देर तक फ़ोन पर दिमाग़ क्यों ख़राब कर रहा था.. तुम्हारा!.. ये आदमी फ़ोन पर इतना दिमाग़ ख़राब कर सकता है.. तो अपने घर पर क्या करता होगा! मुझे ऐसा लगता है.. जैसे ये रमेश किसी मंदिर-वन्दिर में न होकर अपने कमरे में ही है.. और इसकी माँ नीचे अपने कमरे में सारी बक़वास सुन रही है, मंदिर वाली बात झूठ बोल रहा है.. ये!”।
परेशान सुनीता ने अब पिता आगे पूरी दास्ताँ सुना डाली थी। जिसे सुनने के बाद मुकेशजी ने कहा था” क्या! तमाशा है, देखना पड़ेगा! किसके आँसू पोंछ रहा है.. ये”।
रात बहुत हो गई थी.. मुकेशजी ने सुनीता से कह दिया था,” अभी सो जाओ! इस नाटक का क्या करना है.. सवेरे देखेंगे”।
सवेरे मुकेशजी के घर में हमेशा की तरह सब्जी-मंडी से सब्जियाँ आ गईं थीं.. किसी को खाने पर बुलाने का विचार हो रहा था। सुनीता वहीं आसपास चेहरे पर रात वाली बात की छाप लिये फ्रिज में और रसोई में सब्जियाँ रख रही थी.. मुकेशजी ने बिटिया का चेहरा पढ़ लिया था। अचानक से सुनील भी अपने कमरे से अपने पिता के कमरे में नीचे उतर आया था.. पिता के चेहरे पर एक अजीब सी दास्ताँ को छपा देख सुनील पूछ बैठा था,” क्या बात है! पिताजी! आप कुछ टेंशन में लग रहे हैं!”।
“ अरे! कुछ नहीं वो रात को ज़रा…..”। और मुकेशजी ने सुनील के आगे रात को सुनीता और रमेश का फ़ोन का सारा वार्तालाप बयां कर दिया था। आख़िर भाई था, सुनील! सुनीता का.. और बहुत पहले से ही थोड़ा बहुत भाँप गया था.. रमेश के बारे में.. तो बस! फ़ोन पर हुई बक़वास को सुन आग बबूला हो उठा था,” साला! लफ़ंडर कहीँ का!.. काम -धंधा करता नहीं है.. इसके बाप-भाई हमारे आगे आकर रोते हैं.. लड़कीबाजी करता फ़िर रहा है”। सुनील के मुहँ से अंगारे की तरह शब्द निकल रहे थे.. रमेश के लिये।
अनिताजी ने बहुत शाँत करने की कोशिश की थी.. सुनील और मुकेशजी को.. पर मामला आज काबू से बाहर था। ग़ुस्से के भयंकर नशे में दोनों बाप-बेटा दफ़्तर के लिये निकल गये थे। अचानक कुछ ही घन्टों बाद रमेश का फ़ोन सुनीता के लिये फ़िर से आया था,” क्या है! ये सब मुझसे कह रहा है.. कौन सी रखैल पाल रखी है.. तूने!”। और फ़ोन कट गया था।
इतना फ़ोन पर सुनने के बाद सुनीता ने रमेश को फ़िर से फ़ोन लगया और पूछना चाहा था, कि क्या कह रहा है.. वो। सुनीता के फ़ोन लगाने पर रमेश ने सुनीता को बताया,” सुनील ने मुझसे और मेरी माँ से बदतमीज़ी से बात कीं.. और कह रहा था, कि मैं रखैल पालता हूँ”। और फ़ोन काट देता है।
शाम को सुनील और मुकेशजी जब घर आते हैं.. तो मुकेशजी फ़ोन वाला क़िस्सा खुद ही बता देते हैं,” हमनें रस्ते से इंदौर फ़ोन मिलाया था.. फ़ोन रमेश की माँ ने ही उठाया था.. फ़ोन उठाते ही सुनील ने उस बुढ़िया से पूछ लिया था.. कौन सी रखैल पलवा रखी है, तूने! इतना सुन बुढ़िया ने फ़ोन रमेश के हाथ में पकड़ा दिया था.. फ़ोन कान पर लगाते ही रमेश को भी हमनें सीधा कर दिया था.. कौन सी रखैल पालता है.. हमें भी तो बता!”।
मुकेशजी का कहना था, कि दोनों माँ-बेटा फोन पर कांप रहे थे.. और उनके पास कोई जवाब न था.. एकदम सीधे हो गए थे।
बुढ़िया और रखैल जैसे शब्दों के तीरों ने दर्शनाजी की शैतान बुद्धि को किस प्रकार कुरेद कर कुछ और शैतानी सोचने पर मजबूर कर दिया था.. क्या! रखैल शब्द ने रमेश का ब्याह का नशा उतार दिया था.. या फ़िर शातिर दिमाग़ रमेश ने एक बार फ़िर सुनीता की कमज़ोरी पकड़ तुरन्त ही नए नाटक की रचना कर डाली थी।