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खानदान 150

सुनीता के लाख समझाने पर भी घर में चिल्ला-चोट और हंगामा देख.. प्रहलाद ने दिल्ली जाने का फैसला ले लिया था..

” मेरे पास थोड़े से पैसे हैं! मैं अपनी टिकट ख़ुद ही करवा कर दिल्ली चला जाऊँगा!”।

प्रहलाद माँ के आगे बोला था।

” दिल्ली जाकर वहाँ नानी के घर क्या करेगा! बेटा.. तू यहीं अपनी आगे की पढ़ाई कर ले! इसी माहौल में बचपन से बड़ा हुआ है.. अब अचानक से क्या हो गया..!!”।

सुनीता ने प्रहलाद को समझाते हुए, कहा था।

बात माहौल और बचपन की बिल्कुल भी नहीं थी.. बल्कि प्रहलाद के सारे दोस्त शहर छोड़ कर बाहर जा चुके थे.. अब बालक बुद्धि थी.. और फिर सबकुछ होते हुए.. बच्चा बार-बार यही बात सोच रहा था.. कि उसका दाखिला नहीं कराया गया.. फैक्ट्री और हिस्सा कहीं न कहीं सभी के दिमाग़ में था.. मिलना मिलाना कुछ भी नहीं था.. हकीकत यही थी।

” कोई बात नहीं! प्रहलाद को दिल्ली भेज दो! माहौल बदलेगा! और यहाँ दिल्ली में कुछ सीखने को ही मिलेगा! ये लोग न ही कुछ देंगें!.और न ही कुछ करने देंगें!”।

अनिताजी ने सुनीता को प्रहलाद को लेकर समझाते हुए कहा था।

और प्रहलाद नानी के घर चला गया था। हैरानी की बात तो यह थी.. कि घर से बच्चे के अचानक से यूँ अकेला दिल्ली जाने के निर्णय पर किसी ने यहाँ इंदौर में कोई सवाल नहीं किया था.. ऐसा लगा था.. मानो प्रहलाद से कोई लेना-देना ही न हो!”।

घरों में ऐसा होता है.. क्या.??

रमेश ने भी प्रहलाद के घर से जाने पर कोई सवाल नहीं किया था।

एकबार फ़िर यूहीं समय निकलता गया..

” अब तो बहुत दिन हो गए.. प्रहलाद को वापिस भेज दो माँ!”।

सुनीता ने फ़ोन पर अनिताजी से कहा था.. रमेश को या फिर परिवार के किसी भी अन्य सदस्य को कोई लेना देना नहीं था।

” नानी..!! मैं कहीं भी नहीं जाऊँगा! वहाँ का माहौल ठीक नहीं है!”।

प्रहलाद ने रोते हुए.. कहा था।

और फ़िर वापिस नहीं आया।

” ये चेहरा ऐसा कैसे..? वीडियो कॉल करा जाए!”।

किसके चेहरे को देख.. यूँ दिल उदास हो गया.. जाने खानदान में।

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