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खानदान 141

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सुनीता विनीत को लेकर एकदम सही सोच रही थी.. अब परिवार ही ऐसा था.. पैसा प्रेमी। पर यहाँ कोई नई बात नहीं थी.. हर बिज़नेस परिवार में, जहाँ पर हिस्से का विभाजन सही तरह से नहीं होता.. वहाँ रिश्तों में मन-मुटाव आ ही जाता है.. पैसों की ज़रूरत किसे नहीं होती! सभी को तो चाहये.. पैसा!

यहाँ बटवारे के नाम पर तो कुछ था, ही नहीं! जो भी था.. वो विनीत ने समेट कर टाटा-बाई-बाई बोल ही दी थी.. गलती पूरी विनीत की भी नहीं थी.. अगर कोई और विनीत की जगह होता.. तो वो भी यही करता! परिवार में काम नहीं छीना-झपटी की प्रथा डाल रखी थी.. जो जिसने हड़पा.. वो उसी का हो गया था.. हाथ लगा हुआ, माल मेरा! ” मैने कमा रखा है!”।

परिवार का स्लोगन बना रखा था।

ठीक इसी तरह से प्रहलाद के दाखिले को लेकर विनीत मुहँ से बेशक नहीं बोलता! पर सोच वही थी..” तेरे बाप ने कमा कर रखें हैं! क्या!”।

हिस्से का चक्कर था.. और माताजी सामने बैठीं थीं.. नहीं तो बोल भी देता! पर हेर-फेर कर कहना वही चाहता था.. समझदार को इशारा काफ़ी होता है! सुनीता ने सही इशारा समझ लिया था.. पर रमेश को भी देखना चाहती थी, जो हर वक्त बाप होने का दावा कर चिल्लाता रहता था,” मैं बाप हूँ…!!”।

बच्चा हर मुमकिन कोशिश करने लगा हुआ था.. कि उसका दाखिला हो ही जाए! अपने ताऊ-ताई इस वक्त भगवान लग रहे थे..

इधर ताऊ-ताई भी बेवकूफ़ बनाने की योजना पूरी ही बनाए बैठे थे.. सीधे मना करना बनता ही नहीं था.. प्रहलाद हिस्सेदार जो था। और गलत भी कुछ नहीं था.. पोता तो रामलालजी का ही था..

प्रहलाद का दाखिला अब चर्चा का विषय बन गया था..

” ऐसे-कैसे पैसे नहीं देगा..! ये तो प्रहलाद के दाखिले के लिए मना कर ही नहीं सकता! सब पैसे देगा! दादा लाई है! इसे कोई रोक ही नहीं सकता!”।

परिवार के दाव-पेचों से अनजान और चालों से बेख़बर अनिताजी ने फ़ोन पर अपनी बेटी से बातचीत के दौरान  कहा था।

एक बात गौर करने वाली थी.. प्रहलाद विनीत के दरवाज़े के चक्कर काट रहा था.. और रमेश तसल्ली की नींद सो रहा था..

” हाँ! तू बैंक लोन की बात कर ले!”।

बच्चे को बेवकूफ़ बनाते हुए.. परिवार को थोड़ी सी भी शर्म महसूस नहीं हो रही थी.. बाप का किया, बेटे में से निकालने के चक्कर में थे.. क्या..!! पर ऐसा कौन सा गुनाह था.. रमेश का जो उसके बच्चों का भविष्य दाव पर लग गया था।

चक्रव्यूह में फँसा एक परिवार.. रचियता चैन की साँस लेता हुआ.. कहानी ने एकबार फ़िर जोर पकड़ लिया था..

प्रहलाद का दाखिला अब हवा के संग.. दूर-दूर तक फैल चुका था… आगे की कहानी हर खानदान के साथ।

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