अब सुनीता को लेकर रमेश का ग़ुस्सा सातवें आसमान पर था। और वो ख़ुद ही रंजना को लेकर गहरे राज़ खोल रहा था। सुनीता के सामने कुछ इस तरह से खोले थे.. रमेश ने सारे राज़..
” अरे! इसकी मौसी कोई मंत्री-वन्त्री नहीं है! झूठ बोलती है! ये! छोटे से फ्लैट में पड़ी है.. बोलती थी.. बंगला मिला हुआ है। और वो इसकी मौसी का लड़का.. जिसे ये बॉक्सर बता रही थी.. कह रही थी.. गोल्ड मेडलिस्ट है! अरे! घन्टा निकला.. रेडियो जॉकी है! इसकी तो मैं हरेक चाल पहले ही समझ गया था.. बताऊँ तो गा मैं इसको अच्छी तरह से..!!”।
” वैसे मेहनत में तो आपने कोई कमी नहीं छोड़ी थी.. पर आपको मिला तो कुछ भी नहीं.. याद है! कितनी मेहनत से लड़की के घर के लिये तोते का पिंजरा बनवा कर दिया था”।
सुनीता रमेश से बोली थी।
” हाँ..!! पता होता तो.. घन्टा बनाकर देता मैं पिंजरा! ऐसा पिंजरा बनाता कि याद रखती!”।
आगे सुनीता ने फ़िर से बात रखी थी..
” बसों में सामान रखवाने भागे फ़िरते थे.. उस लड़की का! टाइम से नौकरी तो खूब बजाई थी.. पर अफ़सोस की बात तो यह है! कि कुछ हासिल नहीं हुआ!”।
” उडाले-उडाले मजाक! अभी थोड़ा मेरा टाइम ख़राब है! देखना यह तो पैरों में घिसरेगी..!!”।
रमेश रंजना को फ़ोन करने से बिल्कुल भी पीछे नहीं हट रहा था.. दोनों के बीच बात बदतमीज़ी पर यानी के गाली-गलौच पर पहुँच गई थी। अपनी हुई बेइज़्ज़ती रमेश रंजना को ख़ुद ही साफ़ शब्दों में बताने लगा था… लगता तो देखने में शेर था.. पर असल में तो वो कुत्ता निकला… जो भप्प करने मात्र से ही डर जाता था। रंजना के एक बार फोन पर बुरी तरह से चिल्लाने पर ही रमेश की हवा खिसक गई थी।
” अरे! मैं तो यहाँ काली के मंदिर में पूजा कर रहा था.. मैने यहीं मंदिर में बिल्कुल इसकी मौसी जैसी खड़ी देखी! मैने बताने के लिये फोन किया.. तो लगी फोन पर ही चिल्लाने! गाली देकर मुझे कहने लगी.. अपनी हद में रह बुड्ढ़े! नहीं तो वहीं पुलिस भेज दूँगी..!!”।
” वो काली अम्मा को मानती है..!!”।
अच्छा..!! तो यह राज़ भी अभी बाकी था.. ये नया नाटक..!! काली के मंदिर जाना.. जिसे जानने के लिये पढ़ें खानदान।