रमेश अब रंजना के परिवार में भी चर्चा का विषय बन गया था। रंजना की माँ-बहनों को भी अब रमेश पर शक से होने लगा था।
” कहाँ गये वो हज़ार रुपये! दे दिये होंगें उस मुस्टंडे को!”।
रंजना की बडी बहन रंजना से अपने दिये हुए, हज़ार रुपये के नोट पर बोली थी। और बोलती भी क्यों नहीं.. पैसा ऐसे ही थोड़े बनता है। यह बात रंजना ने रमेश के आगे कहते हुए बोला था,” मेरी बहन आपके लिये ऐसे बोल रही थी”।
असल में यह बात कहना तो ख़ुद रंजना ही चाहती थी.. पर अपने मुहँ से स्वयं न बोलकर बहन का नाम ले रही थी.. बिल्कुल इसी तरह से वाकए को रमेश ने सुनीता के आगे भी गा दिया था। चलो! सुनीता यह बात तो सुनकर ख़ुश हो गई थी, कि.. रमेश और रंजना में अब अनबन होने लगी है.. लड़की के भागने के अब सुनीता को संकेत मिलने लगे थे।
” दादू की गाड़ी फोड़ लाए!”।
सुनीता के पास रमेश का फ़ोन आया था.. गाड़ी आगे के हिस्से से ठुक गई है! जिस गाड़ी में रमेश रंजना को लिए इंदौर की सड़कों पर घूम रहा था.. वो गाड़ी रामलालजी अपने पीछे छोड़ गए थे.. सुनीता यही चुगली करने दर्शनाजी के पास तेज़ी से भागी थी।
” के..!!”।
ख़बर सुन दर्शनाजी थोड़ी सी देर के लिए परेशान हो गईं थीं.. फ़िर अपने-आप को संभालते हुए, बोलीं थीं,” देखि जागी!”।
दर्शनाजी का कहने का मतलब यह था.. जो भी होगा.. देखा जाएगा।
” अरे! जिसने भी ये गाड़ी ठोकी थी.. उसनें मुझे पाँच हज़ार रुपये दे दिए हैं.. पर इतने पैसों में कहाँ ठीक होने वाली है.. ये गाड़ी!”।
गाड़ी पोलो कार थी.. जो इंजन की तरफ़ से दूसरी किसी स्कार्पियो गाड़ी से ठुक गई थी.. गाड़ी के चालक ने रमेश को पाँच हज़ार रुपये देकर रफा-दफा किया था। अब जैसे रामलाल विला में गाड़ियों का तमाशा बनता आया है.. वैसे ही इस गाड़ी का ठीक होना भी चर्चा का विषय बन गया था.. और वैसे भी रमेश इसमें रंजना को जो घुमाता था।
” आपकी गाड़ी वो ठीक नहीं कराएगा!”।
सोलह साल के लड़के की तरह रंजना से मिलने जाना.. और अब पता नहीं गाड़ी भी ठीक हो पाएगी की नहीं.. कुछ भी कहो! रामलालजी का परिवार अपने आप में ही नाटकों का भंडार है। आइये पोलो गाड़ी के नाटक में शामिल होते हैं.. खानदान के साथ।