” थाणे में चला गया.. और उसनें हरिजन एक्ट लगा दिया.. तो तेरे लेने के देने पड़ जांगे.. मैं बतान लाग रया!”।

” कर ले! जो करना हो!”।

अब रमेश को बटवारे की इस कदर जल्दी लग रही थी.. जैसे कि कोई ट्रैन निकली जा रही हो..  पर दर्शनाजी और विनीत भी बेहद मज़बूत खिलाड़ी थे.. रमेश को मुद्दे तक जाने ही नहीं देते थे। इन लाखों रुपयों के हल्ले का रमेश को कोई भी फायदा नहीं हो रहा था।

” लगता है! ज़मीन का काम करवाना ही पड़ेगा!”।

रमेश ने पुश्तेनी ज़मीन को लेकर कहा था।

” अरे! ये मेरे नाम चढ़ गई.. तो फ़िर इनको अच्छी तरह से बताउंगा!”।

रमेश ने ज़मीन को लेकर विनीत और दर्शनाजी के लिये अकड़ दिखाते हुए कहा था।

” एक बार हरियाणे जाने की देर है! फ़िर तुम देखना सीधा नोटों का बैग लेकर फ्लाइट से आएंगें”!।

रमेश ने रंजना को फ़ोन पर ख़ुश करते हुए, कहा था।

अब तो रमेश के पैर ज़मीन पर नहीं टिक पा रहे थे..सपनों में चालीस लाख का फ्लैट छब्बीस लाख की गाड़ी घूमनें लगे थे.. सपनों में ही रंजना के साथ ज़िन्दगी रमेश को और भी हसीन लगने लगी थी। रमेश के चेहरे पर ख़ुशी देखकर सुनीता एकबार फ़िर से डर गई थी.. और इस अपने घर के टूटने और रमेश के खोने को लेकर एकबार फ़िर सुनीता दर्शनाजी की तरफ़ भागी थी।

” आपको नहीं पता! ये नया फ्लैट और गाड़ी लेने की बात कर रहे हैं.. लड़की के साथ पैसे लेकर भागना चाहते हैं.. प्रहलाद और नेहा को भी लालच दे रखा है! बच्चों को कहतें रहते हैं.. नया मोबाइल दिलवाऊंगा, और दस-दस हज़ार रुपये भी मिलेंगे”।

” खरीद लेन दे! फ्लैट और गड्डी! घूमा लेगा उसनें!”।

सुनीता की बातों को हँसी में लेते हुए.. दर्शनाजी ने यह कह कर बात ख़त्म कर दी थी.. दर्शनाजी का मज़ाक सुन कर सुनीता और ज़्यादा गंभीर और घबरा गई थी।

थोड़ा सा दिमाग़ लगाते हुए.. सुनीता को भी ज़िन्दगी के मज़े लूटने चाहिए थे.. अरे! आख़िर दूध के धुले तो दर्शनाजी और विनीत नहीं थे.. न ही कच्ची गोटी खेल रहे थे.. जो रमेश को ज़मीन पर हाथ टेक लेने देते ।

” जितना खा लिया! खा लिया! इबके यो हाथ टेक कर देखाइयो!”।

दर्शनाजी की बक़वास एकबार फ़िर से ज़मीन और हिस्से को लेकर चालू हो गई थी। लेकिन रमेश सारी तैयारी के साथ अपने गाँव ज़मीन का सौदा करने जाने को तैयार था।

” वा कोनी रया!”।

कौन.. ?? किसको क्या हुआ. . और कहाँ..!!

कहानी का दिलचस्प मोड़.. पढ़िये खानदान।

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