पूरा हंगामा चीखना-चिल्लाना अब सब हो चुका था.. सारी दुनिया को ख़बर भी लग गई थी.. कि भई! हाँ! एक और दहेज का मोटा कड़ा निकल गया है। इस बार भी रमेश का कुछ नहीं बिगाड़ पाई थी.. सुनीता! मोटा माल बेचकर रमेश की कई दिन की ज़रूरतें भी हो गईं थीं.. पर कमाल की बात तो यह थी.. की रमेश बड़े प्यार और आराम से सामान उठाता था, और बेचकर अपनी भी मौज मस्ती करता था.. प्रहलाद और नेहा की भी मौज करवाता रहता था। मौज-मस्ती खाना-पीना सब एकदम बढ़िया चल रहा था.. पर आगे चलकर इन सब का नतीजा शून्य आने वाला था.. अपने नतीजे को बेहतर जानते हुए, भी सुनीता अपने लिये और अपने परिवार के लिये कुछ भी नहीं कर पा रही थी।
सुनीता को मुकेशजी और अनिताजी को छोड़कर मायके से केवल घर छोड़ने की सलाह ही दी जाती थी.. सलाह में दम था, और कहीं भविष्य को देखते हुए.. बात भी सही थी। पर पता नहीं क्यों.. सुनीता का दिमाग़ सही बात को अपनी निजी ज़िन्दगी में उतार पाने से डर रहा था। फ़िर वही पिता के कहे हुए.. शब्द हर बार की तरह दिमाग़ में घूम जाते थे,” कुछ भी हो! रमेश के साथ ही घर बसा कर दिखाओ!”।
मुकेशजी का हर बार सुनीता से यही कहना हुआ करता था,” एक औरत का उसके आदमी के बगैर संसार अधूरा है!”
सुनीता ने हर बार अपने पिता की बातों को न काटते हुए.. जवाब हाँ में ही दिया था.. एक निडर नारी की तरह से सही को सही और गलत को ग़लत साबित कर, आगे बढ़ने की हिम्मत न जाने किस डर से जुटा नहीं पाई थी.. उसी कुँए में ऊपर-नीचे साँस करके डुबकी लगाए जा रही थी.. जिसका भविष्य केवल अंधकार के सिवा और कुछ भी नहीं था।
सब कुछ भूलकर एक बार फ़िर से सुनीता रानी इसी साँचे में रमेश से साथ अग्रसर हो लीं थीं। हमेशा की तरह रमेश का यह सोना बेचकर पैसा भी ख़त्म हो गया था। अब रमेशजी छोटी-मोटी हस्ती तो थे, नहीं! और पैसे चाहिये थे.. कहाँ से आते!
” वे साठ लाख, सैंतालीस लाख और सताईस लाख कित गए!”।
” तूं मेरे गेल नोटों की बात न किया कर!”।
” और किस गेल बोलूँ मैं!”
” बटवारा तो तन्ने करना सै!
” मेरा हिस्सा तिरेसठ लाख का बन रया सै!’।
रमेश को विनीत के बैंकों में ट्रांसफर हुए.. साठ- लाख, सैंतालीस-लाख और सताईस-लाख रुपये याद आ गए थे.. जिनमें रमेश के हिसाब से उसका हिस्सा.. तिरेसठ लाख का सीधा-सीधा बनता था। यही रमेश अपनी माँ को समझाने की कोशिश कर रहा था.. जो कि ख़ुद भी पहुँची हुई.. खिलाड़ी थी। दर्शनाजी रमेश को इस बात को आगे बढ़ने ही नहीं दिया करतीं थीं। और क़िस्सा बटवारे पर आकर ख़त्म हो जाया करता था। बटवारा तो रंजना के रहते होना नामुमकिन लग रहा था.. क्योंकि मुद्दा यह था.. की रमेश लड़की को अपना हिस्सा खिला देगा।
क्या वाकई में रंजना ही बटवारे के रास्ते का रोड़ा थी.. या फ़िर कहानी का सच कुछ और ही था। सही सच को जानने के लिये हमारे और खानदान के साथ बने रहें।

