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गुहार !

guhaar

भोर का तारा – नरेन्द्र मोदी .

महान पुरुषों के पूर्वापर की चर्चा !

उपन्यास अंश:-

कांग्रेस के हाथ मैं अब सम्पूर्ण भारत की बागडोर थी ! हर आदमी की नब्ज़ पर अब कांग्रेस की उंगली धरी थी . ऐसा कुछ भी न था जो कांग्रेस के वश में न था !  

“अब इस नरेन्द्र मोदी को और वश में करना है ?” कांग्रेस के नेताओं की संगठित मांग थी . “और इस अमित शाह को मिटाना है …..समूल नष्ट करना है , इसे ?” उन का एक मात्र नारा था . 

मैं महसूस रहा था कि कांग्रेस को रोकना …टोकना …या कि परास्त करना – बेहद ही संगीन काम था ! मैं तो खाली हाथ खड़ा था ! जब कि कांग्रेस के साथ …देश ….और विदेश ..सब था !! 

कांग्रेस ने बड़ी ही बारीकी से देश को बाँट दिया था . वोट और नोट की राजनीति में कांग्रेस दक्ष थी . देश के हर कौने पर कांग्रेस का दखल था ! और हर आदमी के दिमाग पर इन्ही का झंडा लहरा रहा था ! जन-मानस को कांग्रेस के सिवा और कोई पुरुष या पार्टी नज़र ही न आते थे ! हिन्दू-मुसलमान …दलित और महा दलित …हरिजन और गरीब-अमीर में बाँट कर …और कुछ लोगों को आरक्षण का कवच पहना कर …एक निश्चित लाईन पर खड़ा कर दिया था ! अब न तो उन का कोई सोच था ….और न कोई सच !

“द …डर्टी …ट्रिक्स …ऑफ़ द …कांग्रेस …..” अमित का चेहरा तमतमा रहा था . “बर्क लाईक ….बोमस ….!” वह कहा रहा था . “हमें कुछ ऐसा करना होगा …..जो ….लोगों तक सच्चाई को ले कर पहुंचे ?”

“हम ….और हमारे कार्यकर्ता  ही ये सब कर पाएंगे !” मैं उदास था . “काम बहुत कठिन है ! लोग कांग्रेस के खिलाफ कुछ भी सुनने को तैयार नहीं हैं !”

“जब कि ….देश नाक तक भ्रष्टाचार में डूबा हुआ है ….? सरकारी तौर पर छूट …और लूट जारी है ! सब मिल-बाँट कर …देश की संपत्ति को खा-उड़ा रहे हैं !” अमित टीस आया था . 

“देयर …इज  ए …नेक्स्सस ….! पूँजी पतियों की साठ-गांठ … एन जी ओज की सहमति …..और …सरकारी तंत्र का सहयोग ….कुल मिला कर एक चक्रव्यूह बन गया है …जिसे भेद पाना कठिन है !” मैं विवश-सा बोल रहा था . “तीस्ता सीतलबाड़ को ही …लो ?” मैंने अमित को घूरा था . “इस का एन जी ओ – सेंटर …फॉर जस्टिस एंड पीस …..आज देश की सरकार से भी बड़ा हो गया है ! सैक्युलरिजम …को ले कर इस ने ….इस तरह से समाज में झंडा गाढ़ा है कि …कोई भी माई का लाल …इसे हाथ नहीं लगा सकता ?”

“ठीक कहते हो ! इस सैक्यूलरिज्म की आड़ में….ये औरत टट्टी की ओट में शिकार खेल रही है ! इस के और इस के पति – जावेद के बचत खाते में …जानते हो कितना पैसा जमा हुआ है ….? हमें परास्त करने के काम के लिए ….इस ने बेसुम्मार दौलत कमाई है !”

“सुना है ….विदेशों तक से …फन्डिंग ….हो रही है ….?”

“हाँ ! और इस का तो …अमरीका सरकार के साथ …लगातार संपर्क बना हुआ है ! हर किस्म की सहायता इसे मिल जाती है !”

“और मीडिया भी बिका हुआ है ….?” 

“राजदीप सरदेसाई …और उस की पत्नी – सगरिका घोष ….ने तो मिल कर …’नरेन्द्र मोदी विरोधी’ मंच तक बना दिया है ! ये कांग्रेस के खरीदे हुए मुहरे हैं ! इन पर विजय पाना तो दूर ….हम तो इन्हें टच…तक नहीं कर सकते ….? इन की जनता पर धाक है ….जनता को इन के कहे-सुने पर विश्वास है !”

“और इन्होने झूठ बोलने की कसम उठा ली है ….?” 

हम दोनों हँसे थे ! खूब हँसे थे !! लाचारियाँ ही इतनी थीं ….कि कोई भी आशा-किरण ढूंढ लाना कठिन था ! और जब कठिनाईयां ला-इलाज़ हो जाएं ….तो मैं हंस पड़ता हूँ ! सच कहता हूँ ….ये मेरी हंसी ही मुझे ….इन मुसीबतों ..से उबार लाती है ! एक दवा की तरह काम करती है , ये ! और हमेशा ही एक नया विकल्प ले कर लौटती है ….! मुझे अनुप्राणित कर देती है ….और फिर से लड़ने का हौसला देदेती है !!   

“वो काम हो गया ….?” मैंने अमित से पूछा था.

“हो गया !” उस ने उत्तर दिया था . 

मैं अपलक अब अमित को देखे जा रहा था ! मुझे कतई विश्वास न हो रहा था कि …अमित जो कह रहा था …वह सच था ? ये तो हो ही नहीं सकता था ….! मैं जानता था कि जो काम …मैंने सौंपा था …वह काम …..

मैं बताता हूँ …अपने शकों …और शंकाओं का कारण –

मुझे मुसलमानों का हत्यारा साबित करने के लिए तीस्ता सीतलबाड़ ने एक गहरी चाल चली थी . खबर फैलाई थी कि …अनगिनत बे-गुनाह मुसलमानों के शव … लूनावाडा मैं …पानंम  नदी के किनारे…दफनाए गए थे ! इन शवों की जांच कराने …गिनती कराने …और अपराध साबित कराने …के लिए तीस्ता सीतलबाड़ ने उन की खुदाई कराने की …मांग की थी ! खबर इतनी संगीन थी कि ….देश-विदेश तक का मीडिया खोज-खबर लेने के लिए …जुट आया था ! पुलिस और सरकारी तंत्र पूरी हतकत में था ! तीस्ता ने बड़ी ही सावधानी से …इस घटना को रचा था ! मरने वाले लोगों के परिजनों तक को …कोई सूचना न थी ! वहां उन्ही लोगों को बुलाया था …जिन से कोई सरोकार सिद्ध होता था ! 

तीस्ता सीतलबाड़ ने अपने बेहद विश्वासपात्र …और उसी के एन जी ओ में काम करने वाले ….अपने सहयोगी …रईस खान को इस काम को अंजाम देने की जिम्मेदारी सौंपी थी ! रईस खान को भी इस काम के बदले …बहुत बड़ा नफा होना था ….!

शवों को खोद कर रईस खान ने बाहर निकल वाया था ! 

जांच के बाद मालूम हुआ था कि …उन शवों में आधा दर्जन लोग स्थानीय नागरिक थे ! बाद में शवों का डी एन ए तक लिया गया था ! 

खबर उछलते-उछलते आसमान छू गई थी ! ‘नरेन्द्र मोदी अब जेल जाएंगे …..’ की खबर एक सर्प की तरह संनाने -मन्नाने लगी थी ! 

“हाँ ! मैंने ही अपने शपथ -पत्र में कहा है कि …कब्रों की खुदाई मेरे सामने हुई थी ! उस वक्त मैं वहां था . लेकिन मुझे यह भान तक न था कि …इन कब्रों की खुदाई …अबैध तरीके से की जा रही है …!” हैड लाईन्स टुडे के वरिष्ठ पत्रकार राहुल सिंह ने स्पष्ट बयान दिया था ! उन्होंने एक और भी खुलासा किया था . “जिस वक्त कब्रों की खुदाई चल रही थी …उस वक्त तीस्ता …सी एन एन – आई वी एन के मुख्य सम्पादक राजदीप सरदेसाई से ..लगातार फोन पर जुडी हुईं थीं ! ये दोनों सूचनाओं का आदान-प्रदान कर रहे थे !”

यह तीस्ता का सब से बड़ा दुर्भाग्य रहा ….!! 

केस का खुलासा हुआ था और ……. 

“रईस खान अरेस्ट हो गया है !” अमित ने फिर से बात की पुष्टि की थी . 

पहली बार ….हाँ , सच कहता हूँ कि पहली बार ….मेरी बांछें खिल उठी थीं ! पहली बार मुझे आभास हुआ था कि …देव मेरी और था ! परमात्मा मुझे किसी भी कीमत पर हारने न देना चाहता था !! 

“अब तीस्ता की बारी है !” अमित भी खुश-खुश बता रहा था . “परमात्मा ने चाहा तो …..अंदर जाएगी ….!”

“सच ….?” मैं उछल पड़ा था . 

“हाँ,हाँ ! रईस खान ने बयां दिया है कि …उस ने तो सब कुछ तीस्ता के कहने पर ही किया था !”

“फिर ….?” मैं आगे का पूछ रहा था . 

“नर-कंकाल- मामले में गोधरा की फास्ट ट्रैक कोर्ट में  तीस्ता ने अग्रिम जमानत की अर्जी लगाई है !”

“अपोज़ करेंगे …? हमें तो विरोध करना ही चाहिए ….? ये जेल जाएगी तो हमें …कुछ राहत मिलेगी !” 

“नहीं ! मामले को सुलगने देते हैं ! आंच को जलने देते हैं . लोगों को खूब भड़कने देते हैं ! तीस्ता के पर काटने से काम नहीं चलेगा , भाई जी …!”

“तो …..?”

“उड़ने देते हैं ! भरे उड़ान ! छुए आसमान ! हमने देखना ही तो है कि ….इस झूठ में दम कितना है …?” 

अमित की बात में दम था !! 

अचानक ही मेरा दिमाग दादा जी के संवाद पकड़ लाया था !

“अब अंग्रेजों की चालों में दम न था ! उन की चाल और चालाकियां अब लोगों की समझ आने लगीं थीं . लेकिन प्रथम विश्व युद्ध जीतने के बाद ….उन की बातों में दंभ था ….गुरूर था …दर्प था …और अभिमान था ! उन्होंने हम भारतीयों को …गंवार और अनपढ़ मान लिया था ! उन के लिए अब हम भेड़ -बकरियों के सामान थे …जिन्हें डंडे के जोर से हांका जा सकता था …. रेवड की तरह पाला-पोषा जा सकता था ….और फिर किसी भी मुबारक मौके पर हमें काट-काट कर खाया जा सकता था !”

“कैसे दादा जी ….?” मैंने हुलम कर पूछा था . 

“ऐसे, नरेन्द्र कि ….प्रथम विश्व युद्ध जीतने के लिए …४३०००भार्तीय सैनिक मरे थे ….और ….६५०००घायल हो कर देश लौटे थे ! ये गरीब तो अंग्रेजों के लिए लड़े थे ? इन्हें तो चंद तगमों के अलावा और कुछ न मिला था . जो मिला था – वह तो अंग्रेजों का ही था ? यहाँ तक कि  …जो देश को ‘स्वराज’ देने की बात थी ….अब नदारद थी ! अब तो उन के हौसले बुलंद थे …और अब तो वो भारत को फिर से ….नए सिरे से संगठित करने में जुट गए थे ! फिर से नए-नए एक्ट आने लगे थे …कानून बनने लगे थे ….और पहरे बिठा दिए थे …ताकि लोग आपस में मिलें-जुलें तक नहीं ….और …..”

“बड़े चालाक थे ….अंग्रेज …, दादा जी ….?” मैंने हैरानी से पूछा था . 

“बेहद चालाक …और बे-रहम भी …..! लोगों पर जुल्म ढाते वक्त इन्हें तनिक भी शर्म न आती थी …? इन्हें सन १९१५ की क्रान्ति से भय हो गया था कि …सन १८५७ जैसी कोई नई स्थिति खड़ी न हो जाए …? अतः अंग्रेज अब ‘दमन’ की नई नीति ले कर भारत में चल पड़े थे ! अब उन का हाथ खुला था ….रास्ता भी साफ़ था …..”

“और हमारे लोग ….?” मुझसे रहा न गया था तो पूछा था . 

“हमारे लोग …निर्णय ही न कर पा रहे थे ….कि करें …तो …क्या करें …? गाँधी जी ने …लखनऊ समझौते के तहत मुसलमानों को मना तो लिया था …पर कोई संगठित कदम न उठ पा रहा था ! ‘स्वदेश’ का छोटा=मोटा आन्दोलन ही चल पा रहा था ! पंजाब में कुछ तोड़-फोड़ हो रही थी . रेल की पटरियां उखाड़ना ….या ..टेलीफोन के तार काट देना ….जैसी छोटी हरकतें हो रहीं थीं ! इस से अंग्रेज भयभीत न था ! और जो पकडे जाते …उन के साथ बहुत …बहुत …बुरा सुलूक होता …ताकि औरों को सनद रहे ….और ….”

“लोग डर गए थे, दादा जी ….?” मैंने घबराते हुए पूछा था . 

“हाँ….और ना …! डरे नहीं थे ….बल्कि दिशाहीन हो गए थे ! फिर से एक मार-धाड़ का युग आरंभ हो गया था ! जो सैनिक घायल हो कर लौटे थे ….उन में रोष था . वो कुछ हथियार चुरा कर लाए थे …..और अब ‘स्वराज’ संग्राम में कूद पड़ना चाहते थे . देश की जनता को भी अब अंग्रेज ठग नज़र आने लगा था ! लोग मान गए थे कि ….’इण्डिया वास …द …ज्वेल ऑफ़ ..द ब्रिटिश क्राउन ‘ ! अंधे के हाथ बटेर लग चुकी थी …..अब अँधा उसे छोड़ता क्यों ….?”

सच ही तो कह रहे थे , दादा जी ! इतना बड़ा देश उन के कब्जे में था – तो अब उन्हें रोक कौन सकता था ? ‘धन-जन’ दोनों ही उन के पास थे …..और वो भी ‘फ्री ऑफ़ कॉस्ट” ! उन के लिए लड़ने वाले सैनिकों ने तो मुफ्त ही जान गवाई थी ? और जो घायल हुए थे ….वो एक दीन-हीन जिन्दगी जीने के लिए मज़बूर थे ! 

और तो और लड़ाई में हुए खर्चे की भरपाई के लिए ….नए टैक्स ….नए एक्ट …और नए-नए हथकंडे …अंग्रेज अपनाने लगे थे ! देश फिर से लुटने लगा था ! 

“एक अजीव घटना अमृतसर में घटी थी !” दादा जी फिर से बताने लगे थे .  

“क्या ….?” मैं उत्सुक था कहानी की अगली कड़ी सुनने के लिए . 

“एक कोई …नर्स थी ! भला सा नाम था – उस का ..? इसाबेल …या कुछ ….”

“क्या हुआ था …उस को ….?”

“पंजाब में तो आतंक छाने लगा था ! वह पढ़ाती थी . स्कूल बंद कर …जब वह लौट रही थी …तो कुछ लोगों ने उसे छेड़ दिया …! वह डर गई . और उस ने जा कर सीधे जनरल डायर के यहाँ गुहार लगाई थी !”

…………………….

श्रेष्ठ साहित्य के लिए – मेजर कृपाल वर्मा साहित्य !! 

  

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