खानदान 158

खानदान 158

” माँ चलीं गईं..!!!”। बबलू अपने छोटे भाई के मुहँ से यह ख़बर सुनते ही सुनीता बिलख-बिलख कर रोने लगी थी.. ” बस! माँ! कोई बात नहीं! नानी ने अपनी पूरी लाइफ अच्छे से बताई ! और एक सुखी जीवन जिया! अब उनका जाने का समय आ गया था.. उन्हें जाना था.. अपनी बीमारी...
खानदान 159

खानदान 159

अपनी माँ के दुःख के संग.. एकबार फ़िर सुनीता ने रामलालजी के नाटकीय मंच में कदम रखा था। प्रहलाद का दाखिला तो हुआ ही नहीं था.. पर उसनें अपना मन-पसंद काम वहीं इंदौर में ही शुरू कर दिया था। रमेश की नज़र प्रहलाद पर ही थी.. ” कहाँ जाता है! ये!”। ” पता...
हम आखिर

हम आखिर

भूलने को तो बहुत सी बातें भूल जाती हूँ मैंमगर जो भूलना चाहती हूँ वो क्यू याद आते है।कुछ लोग बिछङ कर भी साथ साथ होते है।कुछ साथ हो कर भी क्यू बिछङ जाते है।हमसफर ,हमराह ,हमजुबाँ तो मिल जाते हैंहमख्याल, हमनवाँ ही क्यू दिल को भाते हैं।सजाये रखते हैं हम जिनको दिल के कूचे...
गीत

गीत

फ़िर वही गाँव वही घर याद आ रहा है! ए मेरे मन तू इन बूँदों में वही गीत क्यों गा रहा है! भीगी हुई हवाओं में मन गुज़री हुई यादों को पकड़ने क्यों दौड़ रहा है! आने वाले समय की यादें बटोर कोई नया गीत गुनगुना फ़िर एक नई कहानी लिख! और एक नया गीत...
खानदान 157

खानदान 157

शादी-ब्याह के सपने, घी-दूध के निकलने के वहम औरत की बाएं आँख का फड़कना बहुत बड़ा अपशकुन होता है.. सुनीता के दिल को दहला कर रख दिया था.. माँ को लेकर एक तो बेचारी वैसी ही परेशान थी.. दूसरा एक नया सपना सुनीता को डरा कर रख देता था। इसी डर के रहते सुनीता हर बार मायके फ़ोन...
खानदान 157

खानदान 156

” एकबार माँ से मिलने समय निकालकर ज़रूर आ जाना”। सुनील ने अपनी बहन से कहा था। ” पर माँ की हालत में तो दिन रोज़ सुधार हो रहा है! न.. आपने बताया था!”। सुनीता का भाई से सवाल था। हाँ! पर एकबार मिलने में बुराई भी कोई नहीं है!”। ” ठीक है!...