वो क्यू याद आते है

वो क्यू याद आते है

भूलने को तो बहुत सी बातें भूल जाती हूँ मैंमगर जो भूलना चाहती हूँ वो क्यू याद आते है।कुछ लोग बिछङ कर भी साथ साथ होते है।कुछ साथ हो कर भी क्यू बिछङ जाते है।हमसफर ,हमराह ,हमजुबाँ तो मिल जाते हैंहमख्याल, हमनवाँ ही क्यू दिल को भाते हैं।सजाये रखते हैं हम जिनको दिल के कूचे...
खानदान 166

खानदान 166

रमेश ने सुनीता को बैग खोलकर चैक करवाने के लिए कहा था.. पर कुछ आनाकानी कर सुनीता अपने ले जाने वाला बैग न खोलते हुए.. नीचे चली गई थी। और फ़िर वही ड्यूटी का नाटक तो था ही.. ” अरे! थोड़ा इस बैग की ड्यूटी देना.. इसमें मेरा गोल्ड है.. दिल्ली ले जाना है! यहाँ रह गया तो...
खानदान 166

खानदान 165

” घर आ रही है! न!”। माँ ने सुनीता से फोन पर पूछा था.. बात अनिताजी के सामने की थी। ” हाँ! माँ!  सामान का इंतज़ाम देख लूँ.. फ़िर आ जाऊँ गी! अब दोनों बच्चे मेरे साथ आइएंगे.. घर अकेला रह जाएगा.. सोचना तो पड़ता ही है! बताउं-गी.. मैं आपको इंतज़ाम...
खानदान 166

खानदान 164

एक दिन का रमेश का खर्चा अब पाँच-सौ रुपए से नीचे नहीं था.. अपने-आप को फैक्ट्री का मालिक दिखाने के लिए.. कोई भी तरीका अपनाने को तैयार हो गया था। फैक्ट्री के मालिक से रमेश का मतलब.. कम से कम एक ही शाम के हज़ार रुपए उड़ाने से था। बोलता भी था.. ” हम कोई भूखे-नंगे...
खानदान 166

खानदान 163

” इधर-उधर से सामान उठानिए का घर कभी नहीं बसता है! मेरा हल्दी पीसने का grinder घर से बेरा न कब उठ गया.. पता ही नहीं चला!”। दर्शनाजी यहाँ अपनी हल्दी पीसने वाले ग्राइंडर का रोना रो रहीं थीं.. जो उन्होंने ख़ुद ही रमेश को इशारा कर रसोई से उठवा दिया था। जेब भरने...
खानदान 166

खानदान 162

रमेश के इस घर में सामान बेचकर पैसा लाने के बिज़नेस में सुनीता चाहे अनचाहे शामिल हो गई थी.. वक्त के लपेटे में न चाहकर भी ईश्वर की ऐसी करनी हुई.. कि मुकेशजी और उनका बिज़नेस गिरता ही चला गया। हर माँ-बाप हर कीमत पर बेटी का सुख चाहता है.. इसलिए मुकेशजी ने सुनीता को कभी...