लिहाज़

लहजे मे उसके वो लिहाज न था। बात करने का वो अंदाज न था। मुद्दत बाद मिले थे हम दोनो पर ,ये नया एक आगाज न था। खामोशी ढूंढती रही लफ्जो को ऐसा तो वो बेआवाज न था। कहता था वो जानता हू तुझको मगर ऐसा वो मेरा हमराज न था। जिंदगी से सुर न निकले कोईऐसा तो ये कभी टूटा साज न था।...

पत्थर की हो नारी

पत्थर की नारी हो तो पूजे है सब कोई। हांड माँस की नारी देखे, तो जाने क्या होई। वैसी ही है वो तो रे जैसे तेरी माँ ,बहना। लूटे लाज उसी की, और तुझे क्या कहना। छोटी छोटी बच्चिया बचती नही यहा तो। कहां छुपा ले इन को तू ही जरा बता तो। बात सोचने की है है जिम्मेदारी भारी।...
माता-पिता

माता-पिता

सबसे प्यारी और सबसे अनमोल चीज़ हर इंसान के लिए.. उसके माता-पिता ही होते हैं.. बचपन बड़ा प्यारा और सुखद बीतता है.. उन संग.. ऐसा लगता है.. माँ-बाप के साए में खड़े रहकर मानो कोई भी दुनिया का दुःख हमें छू भी नहीं सकता। प्यारे बचपन के प्यार से बीतने के बाद जब जवानी माँ-बाप...
प्यारे रिश्ते

प्यारे रिश्ते

पाँच सदस्यों का एक प्यारा सा सबसे सुन्दर परिवार हुआ करता था हमारा। हम तीन बहन-भाई व हमारे प्यारे से माता-पिता। धीरे-धीरे हमारे माता-पिता और हम तीन-बहन भाईओं रूपी यह वृक्ष बड़ा हुआ.. और हम तीनों विवाह के बंधन में बंध गए। सबसे पहले तो बड़े भाई साहब का ही विवाह हुआ था.....
खानदान 171

खानदान 171

” तेरे धोरे किमे तो होगा..!! बेटी एक फूटी कौड़ी नहीं है! घर में!”। दर्शनाजी ने रमेश के ख़र्चे के लिए पैसे देने से मना करते हुए.. कहा था। सुनीता का अंदाज़ा एकदम सही निकला.. दर्शनाजी और विनीत शुरू से एक ही निकले थे.. पिता को दिए हुए.. वचन,” घर बसा कर...
खानदान 171

खानदान 170

” हाँ! क्या हुआ..!! कौन से अस्पताल में..? बताया क्यों नहीं! अभी-अभी अम्मा से पता चला!”। प्रहलाद के फ़ोन पर विनीत का फ़ोन बजता है.. और विनीत क्या और कैसे हुआ.. अपने पिता का हाल ताऊ को फ़ोन पर बता देता है.. सुनीता प्रहलाद को रमेश के बारे में विनीत से बात...