
क्या मैं अकेला ही रहूँगा ?
महान पुरूषों के पूर्वापर की चर्चा !!
उपन्यास अंश ;_
मुझे एक और तथ्य मिला था . लिखा था – मार्टन बर्न ,एंड कंपनी ने इस पीठ की संरचना की थी . इस पीठ को बनाने में इस कंपनी का बड़ा हाथ रहा था . इस के चीफ इंजिनियर भी स्वामी विवेकानंद की तरह के परब्राज्य थे . आश्रम और मिशन एक नहीं – दो थे ! हालांकि उन दोनों का उद्देश्य एक था ! पर संचालन तो दो तरह से होता था . मिशन के स्कूल में अस्पताल थे , यूनिवर्सिटी थीं ….और भी बहुत सारी संस्थाएं थीं . विदेश में भी मिशन की शाखाएं थीं . स्वामी जी को भारत ही नहीं पूरा विश्व ही जान गया था !!
१८९३ में स्वामी जी के विश्व पार्लियामेंट ऑफ़ रिलीजन्स में दिये वकतव्य के अंश … मैं एक शिला-लेख के सामने खड़ा पढ़ रहा था . “मानव धर्म एक है ….इश्वर अंश एक है !” उन्होंने कहा था . लोगों ने तब स्वामी जी को एक आश्चर्य की तरह देखा था . भारत से आया एक सन्यासी शुद्ध अंग्रेजी भाषा में अपने जटिल विचारों को कितनी सुगमता से कहे जा रहा था ! “प्रभु में हम सब का बराबर -बराबर का साझा है . अल्ला हो …राम हो ….ईशा हो या मूसा …., वह एक है -अनेक नहीं ! मेरे गुरू कहते थे – मैं और तुम दोनों ही परमात्मा हैं ! हमारे आत्मा अलग है …पर परमात्मा तो एक है !!”
कितना सच था ! कितना सटीक था – उन का दर्शन ! कितना अटल सत्य था ! पर वेदांत का ज्ञान कुल मिला कर मुझे अव्यावहारिक लगा था ! हम वेदांत को अमल में लाते कहाँ थे ? सांसारिक समस्याएँ सुलझाने के लिए तो हम कुल्हाड़ी ,गंडासे …तलवारें ….तोपों और टेंकों का सहारा लेते थे ! हम अपने स्वार्थ के लिए पंजे फैला-फैला कर लड़ते थे …एक दूसरे की जान तक ले लेते थे ! कहाँ थी वेदांत की बताई ‘दया’ …कहाँ था वेदांत का बताया ‘परोपकार’ ….और कहाँ था वेदांत का प्रचारित -दर्शन जो प्रभु को एक मात्र पाने की बात करता था ?
अपनी -अपनी ढपली …और अपना-अपना राग ! यही तो चल रहा था ….यही तो घट रहा था ! ‘स्वव’ को पोषने का क्रम जोरों पर था . समाज मुझे तो उलटी दिशा में जाता लग रहा था ! ‘धर्म’ को मात्र एक बहाने के रूप में इस्तेमाल करना लोगों ने सीख लिया था ! एक खुराक की तरह लोग ‘धर्म’ को खा कर पचा जाते थे और सारे कुकर्म कर फिर उसी की शरण में लौट आते थे !
कुकर्मियों को …विधर्मियों को …अनाचारियों को ….और अत्याचारिओं को प्रचारित करने के लिए कहाँ बैठा था – इश्वर… ? इश्वर तो उन्हें अपनी शरण में ले कर अभय दान दे रहा था ! न्याय-अन्याय को तौलने के लिए समाज में कोई क़ानून ही नहीं बना था !
मैं वेदान्त को गलत नहीं मान रहा था ! मैं तो केवल उस की व्यावहारिकता पर प्रश्न चिन्ह लगा रहा था !! मैं चाह रहा था कि मुझे कोई ऐसा विकल्प मिले …जो मेरे भीतर छुपी अभिलाषाओं के अनुरूप हो !
“तीन साल तक स्वामी विवेकानंद यूरोप …अमेरिका ….और आस-पास के देशों में भ्रमण करते रहे थे ! उन का वेदांत इतना प्रसिद्ध हुआ था कि लोग उन के शिष्य बन गए थे . बहुत सारे धनी -मानी लोगों ने उन्हें अनुदान दिए थे . और उन की एक अनुयाई …सिस्टर निवेदिता …तो …”
“उन के लिए भारत चली आई थी …?”
“हाँ ! और फिर लौटी ही नहीं ….!! उन्होंने स्वामी जी की बहुत सेवा की ….और ….”
अचानक ही मुझे जसोदा बैन का ध्यान आया था ! अचानक ही मैं हिल गया था . न जाने क्यों एक अपराध बोध मुझे परेशान करने लगा था !
“कोई सम्बन्ध था ….उन का ….?” मैंने पूछ लिया था .
“ऐसे सम्बन्ध तमाम सांसारिक संबंधों के परे होते हैं , नरेन्द्र ! इन संबंधों को परिभाषित नहीं किया जा सकता ! इन की तो व्याख्या ही अलग होती है ! ये स्वेच्छा के ऊपर बने सम्बन्ध होते हैं ….जिन में उत्सर्ग की भावना ही श्रेष्ठ होती है ! घाटा-मुनाफा देखने वाला कोई व्यक्ति इन जैसे संबंधों का पालन नहीं कर सकता !”
“स्त्री ….और …पुरुष के सम्बन्ध …..?” मैंने फिर से प्रश्न चिन्ह लगाया था . “मेरे ….और यशोदा बैन के सम्बन्ध …..?” मैंने अब स्वयं से पूछा था . “क्या मैं अकेला ही रहूँगा ….?” मैं अब व्यथित था . “क्या आदमी की उम्र …बिना किसी नारी के दखल के ….पूरी नहीं हो सकती …?”
नारी-गत वेदान्त …शायद एक अलग ही वेदान्त था ! इस वेदान्त को समझने के लिए …किसी नारी-मन से पूछना आवश्यक था !!
लेकिन मैं तो जशोदा बैन से अलग था …..दूर था ….बहुत दूर ….!!
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क्रमश :-
श्रेष्ट साहित्य के लिए – मेजर कृपाल वर्मा साहित्य !!
