घर में नया मेहमान आ ही गया था, हम चार से पांच सदस्य हो गए थे। सबसे पहले उठकर इस छोटी गुड़िया को टोकरी से बाहर निकलना और फिर वापस टोकरी में बंद करना रूटीन हो गया था । अभी छोटी ही तो थी बोलना भी नही सीखी थी…. पर हाँ, शैतान पूरी थी। गोल-गोल सफेद ऊन का गोला, अब धीरे धीरे बडी होने लगी थी, धीरे से मुह से आवाज़ निकलने लगी थी, वाऊ वाऊ भोंकना सिख रही थी।

पुराने स्टफ टॉयज ज़मीन पर डाल दिया करते थे, उनसे खेलती रहती थी, जैसा कि मैंने क़ानू के बुद्धिमान होने का ज़िक्र काफी बार किया है, वाकई में तीव्र बुद्धि की थी… गोल मोल मुंडी और अपने पेपर कटिंग जैसे कान हिलाकर नीचे ज़मीन पर खेलती रहती थी। खरगोश की तरह थोड़ा उछलने की कोशिश करती थी, की उछलकर बेड पर चढ़ जाये पर हो नही पता था। खैर! छोटे मोटे खेल-कूद करने के बाद हम क़ानू को वापिस टोकरी में डाल दिया करते थे, और बस टोकरी ऊपर से बंद। धीरे-धीरे दिन बीतते गए ओर क़ानू बड़ी होने लगी ये लोग यानी कि जानवर बीच में बड़े थोड़े जल्दी हो जाते है, यह मैने गौर किया थोड़ी सी ऊंची हो गयी तो…. टोकरी में अब फिट नही आती थी और परेशान हो जाती थी, परेशान होकर टोकरी का ढ़क्कन उठाने लगी थी, बस! फिर क्या था, हमने टोकरी का चक्कर परमानैंट खत्म कर दिया।

अब क़ानू का बिस्तर हम बच्चो का जो एक्स्ट्रा बेड लगता था उसके नीचे बिछाने लगे अंधेरा भी रहता था, ओर क़ानू को भी अपनी नई जगह पसंद आ गयी थी, भोंकना तो सिख गयी थी लेकिन आवाज़ में बच्चो वाली बात थी, कहने का मतलब भोंकना में अभी वो दम नही था, आवाज़ में बुलंदी नही आई थी। एक दिन क्या हुआ, हम ढूंढने लगे कि अरे क़ानू कहाँ गयी कही दिख ही नही रही है, नीचे ऊपर दिए बाएं सारी जगह छान मारी पर कही पता ही नही था।

बस फिर क्या था झीने में जाकर देखा ऊपर खड़ी थी, छोटी-छोटी प्यारी आँखें कह रही थी उतार दो प्लीज, उतरना नही आता, गोद में लेकर उतारा और छोटे-छोटे गालों पर हल्के हाथ से थप्पड़ लगते हुए कहा था “आगे से नही दाना” खेल कूद करते दिन बीते ओर अब पलंग पर चढ़ना सिख गयी थी। सीधे नही, पहले सोफ़े पर चढ़ती ओर फिर सोफ़े से पलंग पर चढ़ जाती।

क़ानू की प्यारी सहेली यानी मेरी सुपुत्री गार्गी देर तक सोया करती थी, तो बस। उससे उठाने के लिए मुँह  में किसीके भी चप्पल जूते दबाकर चढ़ जाती और सिरहाने के दोनों तरफ रख देती। धीरे-धीरे बड़ी होने लगी…. अब भोंकना भी अच्छी तरह आ गया था और पलंग पर भी बिना किसी सहारे के चढ़ जाती थी, छत पर हमने पुराने स्टफ टॉयज फैंके हुए थे, उन्ही से सारे दिन खेला-कूदा करती थी, हमने देखा, अरे! कुछ भी मिल जाता है काटना शुरू कर देती हैं यह एक नया अनुभव था मेरा।

जानवर यानी कुत्तों के विषय में किसी जानकार ने मुझे बताया कि ये दांत पैने करते हैं जब ये छोटे पप्पी होते है तो मुँह में खुजली महसूस करते है दांतो को पैना करने के लिए जो मिल जाता है काटना शुरू हो जाते हैं। चलो बात समझ में आ गई नई नई चीज़ें बचाकर रखने लगे थे हम क़ानू से…. खासकर चप्पल, जूते, बहुत काट जाती थी एक चीज़ और बहुत ज़्यादा पसंद आ गयी थी महारानी जी को वो थे जरवेरा के फूल यह फूल यहां मध्यप्रदेश के प्रसिद्ध फूल हैं। यह भोपाल में आपको घर-घर में मिलेंगे अनेक सुंदर रंगों में होते हैं, ये फूल। मैन भी चार रंगों के ये गमलो में लगा रखे थे, क़ानू को इन फूलों का टेस्ट और महक पसंद आ गयी थीं, फिर क्या था, जैसे ही गमले में किसी भी रंग का फूल खिलते तुरंत तोड़ कर उससे मुह में दबा कर सामने खड़ी हो जाती… गुस्सा बहुत आता था, पर वो रंगीन फूल अपने प्यारे से मुह में दबाकर सामने खड़ी हुई इतनी प्यारी लगती थी सारी नाराज़गी छू- मंतर हो जाती। खाने-पीने की शौकीन क़ानू हमारे साथ धीरे-धीरे बड़ी हो रही थी…आज घर में कढ़ी-चावल बने है, पता लग जाता था फिर मजाल है क्या कोई दूसरी चीज़ को मुहँ को लगाले। एक दिन तो इतनी उतावली हो गयी कि अपने छोटे से मुँह को खाने के चक्कर में जला बैठी।

गमलो की मिट्टी खोदना ओर पौधों को उखाड़ना favorite गेम बन गया था क़ानू श्री का… क्योंकि एक बार हमारे यहां माली आया, इतनी तेज़ भोंकी की एक बार के लिए तो बिचारा अपने औज़ार गिराकर भाग खड़ा हुआ। हमने ज़ोर से डाटते हुए छत पर बन्द कर दिया था क़ानू को। छत पर अपनी छोटी नाक दीवार के गेप में फंसाकर माली को गौर से देखा था, क़ानू ने, बस! अच्छी लगी तभी माली गिरी क़ानू को । पौधे उखाड़ना और मिट्टी खोदना जैसे favorite गया हो गया था, जब भी मौका मिलता छोटे- छोटे पैर मिट्टी में आधे- आधे भरकर खड़ी हो जाती थी, कुछ इस तरह गुज़र रहा था क़ानू का बचपन हमारे साथ।

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