“ जी पिताजी! आप भी अपना ध्यान रखना!”

“ मैं आपके लिये ईश्वर से प्रार्थना करूँगी!”।

बस! इतनी सी बात करने पर ही मेरी आँखें आँसुओं से भर गईं थीं.. और पिताजी के आगे मै अपनी भावनाओं को रोक नहीं पाई थी। हालाँकि भाईसाहब के साथ पिताजी से मिलने जाते वक्त मैं अपने आप को समझाकर ही चला करती थी, कि कुछ भी हो उनके आगे ख़ुशी के अलावा कुछ और नहीं झलकना चाहये.. पर आज मेरी विदाई थी.. और मेरे पिता घर पर न होकर सलाखों के पीछे खड़े थे.. वो इंसान जो बिल्कुल निर्दोष था.. पर कुछ पैसों के लालची लोगों ने मेरे पिताजी के साथ झूठा-सच्चा मुकदमा लगा कर उन्हें फँसा दिया था।

आज भी वो वक्त मुझे अच्छी तरह से याद है.. जब हम बहन-भाई छोटे थे, और पिताजी फौज की नौकरी अफ़सर पद से बीच में ही छोड़ हमें लेकर दिल्ली चले आए थे। हम बहन-भाइयों की किस्मत से पिताजी ने दिल्ली शहर में आकर बहुत धन कमाया था.. पर मेरे विवाह के पश्चात जैसे भाग्य और ईश्वर पिताजी जैसे कर्मठ और ईमानदार इंसान से रूठ गए थे.. उनके साथ व्यापार में शामिल कुछ लोगों ने उन्हें इस तरह से फसाया था.. कि उनका जीवन मुकदमों और कचहरियों में फंस कर रह गया.. इन मुकदमों का ख्याल आते ही मुझे अपने पिताजी की ससुराल में बेहद चिन्ता हो जाया करती थी, और अक्सर ही उनसे फ़ोन पर पूछ बैठती थी..

“ कोई चिंता की बात तो न है.. पिताजी! किसी मुकदमे में आपको कोई ख़तरा तो न है!”।

“ अरे! सब ठीक है! और चिंता और ख़तरा कैसा! परमात्मा सबके लिये बैठा है!”।

मेरे बहादुर पिता हमेशा मुझे अपना यही जवाब दिया करते थे.. उनका ईश्वर में दृढ़ विश्वास और जीवन के प्रति सकारत्मक दृष्टिकोण मुझे उनसे दूर बैठकर बेहद तसल्ली दिलाया करता था.. और पिताजी से बात कर मै निश्चित हो जाया करती थी.. चलो! मेरे पिताजी बिल्कुल ठीक हैं। पर एक दिन अचानक मेरे मन को अजीब से ख्यालों ने घेर लिया था.. और तभी फोन की घन्टी बजी थी..

“ क्या…!!! “

“ हाँ! पिताजी मुकदमा हार गये हैं.. सामने वाली पार्टी ने उनके ऊपर झूठा इल्ज़ाम लगाते हुए.. दस-लाख रुपयों की माँग रखी थी, पर तुम तो जानती ही हो! पिताजी झूठ और अन्याय के सामने झुकने वाले नहीं थे.. और किसी साज़िश और झूठ के ख़िलाफ़ न झुकते हुए.. आज पिताजी सलाखों के पीछे खड़े हो गए हैं”।

भाईसाहब के इस फोन ने मुझे हिलाकर रख दिया था.. और मेरा विश्वास ईश्वर के प्रति अपने पिता के लिये यह फैसला सुनकर हिल गया था। पिताजी से मिलने यह बात अपनी ससुराल में न बताकर और कोई बहाना लगा.. मैं अपने पिता से मिलने पहुँच गई थी।

“ मैं बिल्कुल ठीक हूँ! जीवन में न ही ग़लत का साथ देना चाहये .. और न ही ग़लत के लिये झुकना ही चाहिये! मेरी चिंता बिल्कुल मत करना.. अरे! मैं तो आश्रम में रह रहा हूँ.. कोई परेशानी वाली बात नहीं है। तुम सब अपना ख़याल रखना!”।

कमाल तो यह था.. कि आज पिताजी से यहाँ भी मिलकर मै पहले की तरह ही निश्चित हो गई थी.. आज ऐसी जगह जहाँ खड़े होकर इंसान घबरा जाता है.. और उसके मुहँ से केवल यही शब्द निकलते हैं,” अरे! कुछ भी करो! पर मुझे यहाँ से बाहर निकालो!”।

पर उनके शब्दों और वार्तालाप में इस उम्र में भी कहीं किसी प्रकार का डर नहीं झलक रहा था.. वाकई! में मेरे पिता जितना बहादुर और सच्चा इंसान मिलना मुश्किल था।

मुझे अपने पिता से बचपन से अपार स्नेह और लाड़ मिला है..  इसलिये मैं इतनी बहादुरी न दिखा पाई थी.. और मायके से विदाई लेते वक्त अपने पिता के सामने खड़े होकर रो पड़ी थी.. बहुत छुपाने पर भी पिताजी को मेरे आँसू दिख गए थे… और वे बोल पड़े थे..

“ अरे! यह क्या! बहादुर बाप की बेटी है.. ये आँसू किस लिये! तेरे पिता ने कोई गुनाह थोड़े ही किया है.. पर हम इस लालची और दोरंगे समाज का कुछ नहीं बिगाड़ सकते! निश्चित होकर ससुराल चली जा! मैं घर जल्दी वापिस आऊँगा!”।

“ जी! पिताजी! अपना ख़याल रखियेगा! हम चलते हैं.. नमस्ते!”।

इतना कहकर मैं और भाईसाहब पिताजी से मिलनी कर घर आने के लिये वापस हो लिये थे.. और पिताजी प्यार भरा टाटा कर और अपना आशीर्वाद मुझे देकर खिड़की से अन्दर चले गए थे.. मेरी आँखें आख़िर तक पिताजी को अंदर जाता देखती ही रह गईं थीं.. और अचानक ही न जाने वो कहाँ ओझल हो गये थे.. मै समझ ही नहीं पाई थी।

आज मैं अपने पिता के गले से लगकर विदा न हुई थी.. पर उनके विदा में उनके आशीर्वाद और जीवन के प्रति हर हाल में सकारत्मक सोच का तोहफ़ा लेकर जा रही थी.. जो हर बार के दिये हुए, तोहफ़ों से कहीं ज़्यादा कीमती और मेरे लिये मायने रखता था।

ब्याह के बाद न जाने कितनी बार बाबुल की विदाई हुई थी.. पर यह बाबुल की विदाई मेरे जीवन की सबसे अनमोल विदाई बनकर रह गयी थी।

” पिताजी आप जल्द घर वापस आ जाओगे.. इन शब्दों ने मेरा पीछा नहीं छोड़ा था।”

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