वक्त थोड़ा सा और बीता था, समय ने अंगड़ाई ले ली थी। घर वालों के रोज़ के नाटक, दर्शनाजी की बक़वास और विनीत ने पूरी तरह से सुनीता को कंफ्यूज कर के रख दिया था। उधर मायके से सुनीता की माँ, जो कि एक पूजा-पाठ वाली महिला थीं… ने सुनीता को ऑर्डर सा दे रखा था, उनका सुनीता से साफ़-साफ़ शब्दों में यही कहना हुआ था,” तुम्हारी शादी हो गयी न, इसलिए अभी तुम्हें इस लड़के की क़ीमत समझ नहीं आ रही है, भगवान का दिया सब तुम्हें मिला है…. रामलालजी ने दोनों लड़कों की रोज़ी रोटी का बढ़िया इंतेज़ाम कर रखा है… दोनों हाथों से ईश्वर का दिया समेटो बेटा, और घर बसा कर दिखाओ”। अनिताजी ने एक बात और सुनीता से कही थी,” तुम्हारे चाचाजी और पिताजी जब इंदौर इनका जुगाड़ देखने गये थे… तो भई! तेरे चाचाजी तो बहुत खुश थे, कह रहे थे… अगर दोनों बेटे कुछ भी न करें तो भी आराम से बैठ कर सारी उम्र खा सकते हैं.. इतना बढ़िया जुगाड़ खड़ा कर रखा है, उस रामलाल ने”।
जब भी सुनीता को अपनी माँ की यह बात ध्यान आया करती थी, तो वह सोचती थी,” काम-काज वाली बात तो ठीक है, पर यहाँ इंदौर में रह कर मुझे ऐसा एहसास क्यों न होता है, कि मेरा पति एक फैक्ट्री वाला आदमी है। हाँ! ससुरजी तो फैक्ट्री वाले लगते हैं, और अम्माजी का भी जभी इतना रूतबा है, पर इस रमेश को देखकर तो लगता नहीं है”।
रमेश को देखकर कभी-कभी सुनीता इंदौर में ही उस पर हँस दिया करती थी… पता नहीं।क्यों रमेश उसे अपने आगे एकदम बेवकूफ़ नज़र आया करता था। सुनीता के हिसाब से रमेश में बात तक करने की अक्ल न थी। वही अपने इंदौरी स्टाइल में बात किया करता था। खैर! यह तो कोई हैरानी की बात न थी, क्योंकि जिस जगह हम रहतें हैं, वहाँ का लहज़ा तो ज़बान में आता ही है। सुनीता भी….
पर सुनीता भी क्या करती, रोज़ सुबह से शाम तक रमेश।को ही तो देख रही थी… आराम से सुबह की आठ बजे का चाय नाश्ता कर बिस्तर में सो जाता था, और फ़िर आराम से दोपहर को बारह साढ़े बारह बजे उठकर आराम से अपनी माँ के हाथ के तीन पराँठे खा कर.. पराँठे भी चींटीं की चाल से ही खाया करता था। उसके बाद जनाब परफ्यूम वगरैह लगाकर आराम से नवाबों की तरह से उस फैक्ट्री की ओर प्रस्थान किया करते थे। फ़िर शाम को यूँहीं सुसज्जित घर वापिस भी आ जाया करते थे। शाम को घर आते ही अपनी माँ से अपने बड़े भाई और पिताजी की चुगली करने में व्यस्त हो जाया करते, पूरे टाइम की ख़बर जो देनी हुआ करती थी…. की आज फैक्टिरी में इतने समय तक क्या हुआ। रमेश की दी हुई रिपोर्ट पर ही दर्शनाजी का दिमाग़ अपने पतिदेव और विनीत के ख़िलाफ़ प्लांनिग में जुट जाया करता था। आख़िर ये दर्शनाजी आराम से बाकी की माताजियों की तरह से घर में न रह सकतीं थीं… भई! भगवान का दिया सब था, और लेने-देने के लिए कोई बेटी भी न थी।
इस औरत दर्शनाजी को देखकर प्लानिंग करने का एक ही कारण नज़र आ रहा था, वो ये कि इसने पीछे तो कुछ देखा नहीं था, यहाँ रामलालजी ने दो फैक्ट्री खड़ी कर ही दीं थीं… दो बहू घर में आ गईं थीं… अब दर्शनाजी दर्शना मैडम बनने के अचानक ही ख़्वाब देखने लग गईं थीं… सोच तो यह रही थी, मैं मालकिन ये विनीत मेरा मंत्री और रमेश भौंकता अच्छा है.. तो ये मेरा कुत्ता! आख़िर इतने बड़े कारोबार की मालकिन को कुत्ते की ज़रूरत तो होती ही है। रही बात रामलालजी की तो वह एक कमज़ोर और कानों के कच्चे आदमी थे, बीवी और बेटों की भप्प सुनते ही बेचारे डर जाया करते थे। और जवान बेटे हो जायें तो डर तो लगता ही है। रमेश तो पूरा ही दर्शनाजी के पूरे ही कुत्ते का रोल कर रहा था.. न ही कोई बड़ा देखता था, न छोटा बस माँ ने आँख का इशारा किया और भौंकना शुरु हो जाया करता था। पर एक बात ख़ास सुनीता ने नोट की थी, वो यह… की रमेश को भूँकवाने की दर्शनाजी रामलालजी से ऐंठ कर फ़ीस मोटी दिया करतीं थीं। रमेश की तो बल्ले-बल्ले हो जाया करती थी। सुनीता रमेश को अपनी माँ के साथ ही हँसी ठठ्ठा करते पाया करती थी। रमेश भी बिल्कुल कम न पड़ता था, भोंकने की अपनी माँ से फ़ीस ज़रूर रखवाया करता था।
घर मे कोई भी सीधा भोला न था, हर इन्सान ने जायदाद और सम्पत्ति को देखते हुऐ गेम प्लान कर लिया था। विनीत और रमा का ध्यान रामलालजी पर ही केंद्रित रहा करत था, क्योंकि रमा जानती थी, कि दर्शनाजी उसे आगे बिल्कुल न निकलने देंगीं, इसीलिए वो विनीत को दर्शनाजी के दिमाग़ के हिसाब से ही रामलालजी को वश में रखने का काम करवा रही थी। ये रमा अपनी प्लानिंग में कामयाब हो रही थी, उधर विनीत आराम से फैक्ट्री में रामलालजी को दर्शनाजी और रमेश के ख़िलाफ़ करता जा रहा था, और अपनी जेब आसानी से भर रहा था।
जहाँ संयुक्त परिवार होता है, और धन का कोई आभाव नहीं होता, और धन को लेकर कोई भी किसी भी तरह की हिस्सेदारी नहीं होती…. वहाँ अक्सर प्लांनिग हो ही जाती हैं। और प्लानिंग हो भी क्यों नहीं… अब ज़रूरतें सभी की हैं, और घर सबको ही बसाना होता है। अगर आप दोगे ही नहीं तो आदमी चोरी करने पर ही मजबूर हो जाता है।
अब यहाँ का मामला यह था, कि विनीत की नज़र हमेशा से ही कारोबार पर ही टिकी हुई थी, रामलालजी का कोई शुभचिंतक न था… विनीत बल्कि रामलालजी पर पूरी की पूरी नज़र रखे हुए था… कहाँ से कितना आ रहा है, और आयेगा। विनीत के तीर का निशाना अर्जुन की तरह सिर्फ़ मछली की आँख थी।
यहाँ रमेश महाराज को तो सिर्फ़ अपनी मौज से लेना-देना था। सुनीता की बहुत मुश्किल थी, वो तो बेचारी घर बसाने वाली बात इस रमेश से कर ही न सकती थी.. थोड़ी बहुत कोशिश करती भी थी, तो रमेश सुनीता की कही हुई बातें अपनी माँ को तुरन्त ही बता कर आ जाता। और दर्शनाजी तो थीं ही उस्तादों की उस्ताद फटाक से सुनीता की गोटी काटकर अपने हिसाब का मसाला रमेश के दिमाग़ में भर दिया करतीं थीं। रमेश को अपनी माँ की बातें बुरी नहीं बल्कि मीठी और अच्छी लगा करतीं थीं.. जेब भरने का जुगाड़ जो बाबूजी से करवा कर दिया करती थी… कहने का मतलब चाहे जो भी करना पड़े पैसे का इंतेज़ाम रमेश का जैसे दर्शनाजी कि ही ज़िम्मेदारी थी। वैसे रामलालजी भी कम न पड़ते थे, कहने से पैसे बिल्कुल भी न दिया करते थे।
दोनों लड़के भी क्या करते.. एक ने अपना सहारा अपनी पत्नी रमा को बना रखा था, जो दर्शनाजी का सीधा-सीधा काट थी, एक ही माहौल जो था। और दूसरे ने अपना सहारा अपनी माँ को बना लिया था। और बनाता भी क्यों न, फैक्ट्री में तो विनीत रमेश को टिकने ही नहीं देता… आख़िर हिस्सेदार जो था, और दूसरा रमेश के अन्दर खुद भी वो आगे निकलने और काम करने की आग सुनीता को कहीं भी नज़र न आती थी। पहली ही नज़र में इंसान का पता चल जाता है, दूसरी नज़र की तो ज़रूरत ही नहीं पड़ती। जो फैसला पहली नज़र का होता है, सही मायने में वही सही भी होता है।
सुनीता ने जब शुरू में घर में अपने पहले कदम रखे थे, तो उसका रमेश के दोस्तों से भी साक्षत्कार हुआ था… अजीब से टपोरी टाइप के लड़के लग रहे थे… लग ही न रह था, कि किसी रईस खानदान से कोई वास्ता रखते हैं। सब खाने पीने वाले लेबर टाइप के लड़के थे। जब शुरू में सुनीता को सुनील जी लेने आये थे… उन्होंने भी रमेश के दोस्तों पर एक इशारा कर ही दिया था,” ये कौन थे?”।
“ इनके दोस्त” सुनीता ने कहा था।
“क्या!” आश्चर्यचकित मुद्रा में रह गए थे, सुनील। क्योंकि भई! अब सुनीता के घर मे तो बहन-भाइयों के स्टैण्डर्ड के दोस्तों का आना-जाना था,
परिवेश से अलग जब हम कुछ देखते हैं, तो थोड़ी हैरानी तो होती ही है। बात यह थी, की रमेश के घर मे लक्ष्मी की तो कोई कमी थी हो नहीं, शुरू से बाप ने दबा के मेहनत की और परमात्मा ने हाथ पकड़ ही लिया था… अब रमेश महाराज अपनी माँ के लाडेसर जो थे, काम धंधा कम पर नवाब बन कर उड़ाया खूब था। सुनील जी यह बात रमेश के परिचितों को देख शुरू में ही भाँप गए थे, और उन्होंने सुनीता से कहा भी था… “इसका पेट भरकर रखना, उड़ाने-खाने वाला आदमी है, दूसरा one woman मैन नहीं है, ये”। उम्र कम होने की वजह से और भोलेपन ने सुनीता को “ one woman man” वाली बात समझने न दी थी। अब भाई से आगे क्या पूछती… भूल गई।
और वैसे भी दर्शनाजी ने भी गोद भराई के वक्त बढ़-चढ़ कर बताया था, “ क्या बताएँ हमारे रमेश का तो अकेले का ही महीने का पच्चीस हज़ार ख़र्चा है”।
खैर! अब बातें सब सामने थीं, दिमाग़ से तो रमेश भला चंगा ही लगता था, सुनीता को, पर ऐसा लगता था, कि किसी ने उसके दिमाग़ को कंट्रोल कर रखा है, अपने हिसाब से अपने इस्तेमाल के लिये। जब भी सुनीता की नज़र दर्शनाजी पर पड़ती थी.. सुनीता का शक यकीन में बदल जाया करता था।
रमेश को सुनीता पर थोड़ा सा शक हो गया था, आख़िर शातिर दिमाग़ इंसान जो था, होता भी क्यों नहीं अपनी माँ पर जो गया था। रमेश उम्र में भी सुनीता से बड़ा होने के कारण यह भाँप रहा था, कि हो न हो यह मेरे बारे में अपने मायके ख़बर पहुँचा रही है.. और मायके वाले थोड़ा तेज तो हैं ही, सो! रमेश ने सुनीता को चिकनी चुपड़ी बातों में लेकर माँ बनने के लिये तैयार किया। क्योंकि रमेश जनता था, माँ बनने के बाद सुनीता के भागने के चान्स कम हो जायेंगे और कम क्या खत्म से ही हो जायेंगे।
अनजान और बेख़बर सुनीता, एक तरफ माँ- बापू की वही बात,” हो न हो घर बसा कर दिखाओ” अब ज़िन्दगी के नाटकों में उलझ और अपने मन के फैसले को कहीं किसी कोने में खो, ग्रहस्थ की अगली सीढ़ी पर पैर रख चुकी थी.. हाँ! अब सुनीता एक अकेली लड़की न रहकर एक ज़िम्मेदारी का बोझ उठाने जा रही थी… माँ बनने वाली थी वो।
क्या यह माँ का नया रूप सुनीता की ज़िंदगी में बदलाव लायेगा…. या फ़िर नाटक का एक और भाग सुनीता के आगे आ खड़ा होगा।