तुम्हारे बारे में ही सोचते हुए आ रही हूँ, रेल की खिड़की से दिखते हुए बाहर के नज़ारे आकर्षित  नहीं कर रहे हैँ…बस तुम्हारा प्यारा नन्हा चेहरा आँखों के आगे घूम रहा है… वो आँखे जो मुझे याद कर रही हैं, और इंतजार में कह रही हैं, कहाँ हो …माँ.. खाना खाया होगा के नहीं पता नहीं…फिर ख़याल आया था ..खा तो लिया होगा पर मन से नही, मसालेदार खाने की शौकीन है न नखरेबाज़।

स्टेशन आने पर गाडी रूकती है औऱ मैं घर की तरफ रवाना होती हूँ, ऑटो के गेट पर रुकते ही..दिवार पर कूद कूद कर चढ़ना, पूंछ हिलाना औऱ भोंकने की आवाजें आने लगती हैं… मानो स्वगात में  बच्चा कह रहा हो मम्मी आगई…. मम्मी आगई । जैसे मैं सामान लेकर सीढियो पर चढी.. मेरे गले से लग गई.. लिपट गई बच्चे की तरह.. आँखों में कई सवाल लेकर ..कहाँ चली गईं थीं.. अब ऐसे मत जाना मुझे छोड़कर।

ढूंढ़ती रह जाती हूँ। मुझे इंतजार अच्छा नहीं लगता, अपने साथ ही रखना हमेशा मुझे माँ… इसी को तो कहते हैं,पिछले जन्म के अधूरे संस्कार औऱ आत्माओं का मिलन। वो अधूरा रिश्ता जो कभी इश्वर ने अधूरा छोड़ दिया था,वो इस रूप में पूरा किया…इस आत्मा के मुझसे इतने गहरे संबंध और संस्कार होंगे कभी न सोचा था ।

खुशी में बचे हुए कटोरे का खाना तो खत्म कर लिया पर उस दिन तबियत खराब होने पर मेरे सिरहाने चुप चाप बैठी रही..चुप चाप और कुछ न माँगा …वरना बच्चे तो नाक में दम कर देते हैं, भूख लगी है पर नहीं, प्यार मुझ से था, निःस्वार्थ प्रेम, जिसमे किसी तरह की कोई माँग न थी।

आत्मिक प्रेम था जो पहली बार किसी जानवर के साथ महसूस किया था,जो कभी न सोचा था और शायद आपने कानू के साथ यह अनमोल प्रेम महसूस करूंगी जब तक मेरा और इसका साथ है।

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