” हमें नहीं पढ़ना है! यहाँ..!! भोपाल कोई जगह है! दिल्ली जाकर पढ़ना चाहते हैं.. हम!”।

बिटिया ने कॉलेज के दाख़िले को लेकर ज़िद की थी.. और उनकी ज़िद अपनी जगह सही भी थी.. आख़िर अव्वल अंकों से बारहवीं जो पास की थी.. बिटिया ने!

दिल्ली भेजने और पढ़ाने में हमें अपनी बिटिया को आपक्ति नहीं थी.. क्यों हमनें भी दिल्ली से ही पढ़ाई की है! लेकिन अब भोपाल में भी काफ़ी समय से हैं.. तो पूरे शहर और यहाँ के माहौल से भली -भांति अवगत हो गये हैं। भोपाल अब पहले की तरह से नहीं रहा.. यहाँ भी दिल्ली के ही लेवल के अच्छे सरकारी कॉलेज खुल गये हैं.. जहाँ बच्चों को अच्छी शिक्षा और प्लेसमेंट की गारेंटी दी जाती है।

खैर! बातों में ले और समझा-बुझाकर हमनें बिटिया संग सबसे पहले यहाँ के एक्सीलेंस कॉलेज जो कि कल्यासोत डैम के नज़दीक पड़ता है.. जाना तय कर लिया था..

समय से घर से निकल गए थे.. सुना तो था.. कि कॉलेज जंगल में है! यानी आसपस जंगल है.. और वन-विहार भी वहीं पड़ता है।

” अरे..!! आ..!! ओहो! चुप एकदम चिल्लाओ मत! गाड़ी पीछे लो..!! ज़्यादा होशियार मत बनो..! मां जाओ! ओ.. मुड़ गया पीछे… जल्दी! नज़र पड़ते हो तेज़ी से आकर गाड़ी के काँच तोड़ देगा..! बस! हो गया एडमिशन .. अरे! पीछे लो .. जल्दी.. प्लीज! जय हनुमान ज्ञान गुन सागर, जय कपीस तिहुँ लोक उजागर..!!”।

क्या बताएं.. हमनें सुना तो था.. कि कॉलेज के आसपास जंगल है! और बाघ आ जाते हैं.. वाइल्ड-लाइफ को फोन कर बुलवाना पड़ता है.. और तो और हमनें यह भी सुना था.. कि एकबार तो बाघ ने ऐसी छलांग लगाई थी.. कि उछल कर आदमी को मोटरसाइकिल पर ही खा गया था।

अब यही नज़ारा ठीक हमारे सामने भी आ गया था. कॉलेज आने ही वाला था.. कि सड़क के बीच बाघ महाराज के घूमते हुए.. हमारे दर्शन हो गये थे.. उम्मीद ही कहाँ थी.. कि यूँ अचानक से ही जिनके बारे में इसी सड़क पर चर्चा सुनते आए हैं.. मुलाकात हो जाएगी!

देखते ही हमारी तो सिट्टी-पिट्टी गुम हो गई थी.. सारा वाइल्ड-लाइफ भूल चुके थे.. पर हनुमान चालीसा पूरी याद आ गई थी.. हमनें गाड़ी पीछे लेकर पतिदेव से भाग चलने को कहा था.. कहा क्या था.. घबराहट में गाड़ी के अंदर चिल्ला-चोट ही हो बैठी थी.

बाघ की गर्दन हमारी गाड़ी की तरफ़ मुड़ गई थी.. आँखों में शिकार देख.. रौनक आ गई थी.. शातिर क़दम धीरे-धीरे तेज़ होते हुए.. अब हमारी गाड़ी की तरफ़ बढ़ रहे थे.. और बाघ फुर्ती में आ गया था.. पतिदेव ने गाड़ी रिवर्स कर स्पीड बढ़ा ली थी.. तेज़ी से छलांग मारता हुआ.. बाघ लगभग हम तक पहुँचने से रह ही गया था.. और हम तेज़ी से रास्ता बदल निकल गए थे.. दिल की धड़कने घर पहुँचने तक धीरे होने का नाम ही नहीं ले रहीं थीं.. घर पहुँचकर बिना कुछ बोले.. सब शांति से बैठ गए थे.. ठंडा पानी पीने के बाद एकसाथ ही सबके मुहँ से निकला था..

” कुछ भी कहो! तुमसे मुलाकात तो याद ही रहेगी.. !!”।

Discover more from Praneta Publications Pvt. Ltd.

Subscribe now to keep reading and get access to the full archive.

Continue reading