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स्वामी अनेकानंद भाग 77

Swami Anekanand

माधव मोची की ओर से आए निमंत्रण पत्र को विलोचन शास्त्री उलट पलट कर देख रहे थे।

निमंत्रण पत्र बाई पोस्ट आया था। कोई महान महोत्सव होने वाला था। स्वामी अनेकानंद ने घोर तपस्या कर सिद्धि प्राप्त की थी और अब मात्र उनके दर्शन लाभ से ही मांगे मनोरथ मिल जाते थे। सोलह फरवरी को होना था ये महोत्सव।

खास बात ये थी कि बंबई के सी एम साहब को स्वयं माधव मोची ने घर जा कर निमंत्रण पत्र दिया था। और पक्की खबर ये थी कि सी एम भी स्वामी अनेकानंद के दर्शन लाभ के लिए महान महोत्सव में आ रहे थे।

“ये मग्गू तुम्हारी जान ले कर मानेगा।” सीता देवी ने माधव मोची को कोसा था। “चुनाव न हुआ कोई ऊधम हुआ।” वो बड़बड़ा रही थीं। “ये बूढ़े आदमी बेचारे …?” उन्हें विलोचन शास्त्री की बढ़ती उम्र पर तरस आ रहा था।

बबलू और पल्लवी को पता चलते ही वो दोनों विलोचन शास्त्री के घर चले आए थे।

“सी एम तो अपनी पार्टी के हैं अंकल?” पल्लवी ने प्रश्न उठाया था। “फिर … वो …?”

“अरे भाई। ये तो सार्वजनिक महा महोत्सव है। इसमें तो …”

“क्या सभी जा सकते हैं?” बबलू ने बीच में पूछा था।

“हां-हां। सभी जा सकते हैं।” विलोचन शास्त्री मान रहे थे।

“तो क्या हम सब चल पड़ते हैं?” पल्लवी ने पूछा था।

“चलते हैं।” विलोचन शास्त्री ने मुड़ कर सीता देवी को देखा था।

“क्या करोगे सारे के सारे जा कर?” सीता देवी उखड़ आई थीं। “जब हमारा सी एम ही … नासमझ है तो …?” सीता देवी को रोष चढ़ने लगा था। “मैं तो कहती हूँ – भाड़ में जाए महा महोत्सव। घर बैठो।” उनका हुक्म था।

लेकिन बबलू और पल्लवी जानते थे कि घर बैठने से चुनाव नहीं जीता जा सकता था।

गहरी चाल चल गया था – माधव मोची। बबलू ने महसूसा था। स्वामी अनेकानंद पब्लिक खींच रहा था। महान महोत्सव में तो माधव मोची की खूब वाह वाही होनी थी। एक धार्मिक उन्माद उठ खड़ा हुआ था। इसका विरोध किसी तरह से न किया जा सकता था। पब्लिक बुरा मानती अगर स्वामी अनेकानंद के खिलाफ आवाज बुलंद की जाती तो।

पल्लवी ने अपने नारी समाज को बुला कर दुहाई दी थी।

“स्वामी अनेकानंद तो भाई सबके हैं।” नारी समाज ने भी महसूस किया था। “ये तो धार्मिक मामला था। राजनीति से तो इसका कोई सरोकार है ही नहीं।” उन सब की राय थी। “हां। हम सब भी चाहें तो स्वामी जी के दर्शन लाभ के लिए शास्त्री जी के साथ चल पड़ते हैं?” उन सब का कहना था।

“विलोचन शास्त्री और सीता देवी को आज प्रतिष्ठा याद हो आई थी। उन्हें महसूस हो रहा था कि जीवन के इस भारी संग्राम में वो दोनों अकेले थे। बबलू और पल्लवी चाहे जो भी थे पर थे तो पराए।

“मैं तो कहती हूँ जी – छोड़ो इस चुनाव सुनाव को। हमें क्या लेना देना है? कोई किसी का सगा नहीं होता।” सीता देवी ने दो टूक बात कह दी थी।

लेकिन विलोचन शास्त्री के लिए ये चुनाव नाक का बाल बन गया था।

बबलू और पल्लवी निराश, उदास और हताश हो कर घर लौटे थे।

दोनों बेचैन थे। दोनों होने वाली चुनावी शिकस्त को झेल न पा रहे थे। दोनों चाहते थे कि कुछ न कुछ तो किया जाए? यों हार मान कर बैठना तो न्याय संगत न था। लड़ना तो उनका हक बनता था। कुछ भी हो, कैसे भी हो उन्हें मुकाबला तो करना ही होगा।

“क्या करें बबलू?” पल्लवी ने पानी का लंबा घूंट पी कर बबलू से पूछा था।

“यार, गांडीव में फिल्म बंजारन चल रही है। काकोली ने फिल्म के परदे पर गदर मचा दिया है। चलते हैं?” उसने पल्लवी से पूछा था।

पल्लवी को बुरा लगा था। बबलू भी पलायन करने की सोच रहा था। जबकि पल्लवी घोर संग्राम करना चाहती थी।

“मन बदल जाएगा, यार।” बबलू तनिक मुसकुराया था। “पिछले तीन महीनों से हमने …” उसने होते संघर्ष की याद दिलाई थी। “जिंदगी में चुनाव ही तो सब कुछ नहीं होता।” बबलू की शिकायत थी।

बबलू और पल्लवी चुनावी झंझटों को झाड़ू मार सिनेमा देखने गांडीव में पहुंच गए थे।

बंजारन फिल्म देखने भीड़ उमड़ पड़ी थी।

काकोली घोष ने जब स्क्रीन पर एड़ा ठोका था तो दर्शक झूम उठे थे। सीटों पर खड़े हो कर लोग काकोली के साथ नाच रहे थे, कूद रहे थे और गा रहे थे। एक अजब गजब उन्माद था और एक अनूठी सी चाहत थी, जिसने सिनेमा हॉल गांडीव को लबालब भर दिया था।

“यार, मजा आ गया।” लौटते वक्त बबलू बोला था।

“क्यों न हम इस काकोली घोष को …?”

“पागल हो गई हो?” बबलू ने तिरछी निगाहों से पल्लवी को घूरा था। “ये लोग तो …?”

“पब्लिक के दम पर ही तो होती हैं?”

“तो …?”

“तो क्या? चलते हैं। नारी मंडल ले कर काकोली के घर पहुंच जाते हैं।” पल्लवी ने सुझाव रक्खा था। “बनाते हैं उसे नारी समाज की मैंम्बर। और फिर काकोली घोष को ले कर चलते हैं महान महोत्सव में।” ठहर कर पल्लवी ने बबलू को घूरा था।

बबलू चुप था। पल्लवी की बात में दम तो था पर ये था असंभव। काकोली घोष इतनी बड़ी स्टार क्यों जाएगी उन टट पूंजियों के साथ किसी थर्डरेट स्वामियों के दर्शन करने के लिए? बबलू के हिसाब से यह संभव नहीं था।

“कोशिश करने में क्या हर्ज है बबलू?” पल्लवी ने फिर से राय सामने रक्खी थी। “हां कह दो न यार।” पल्लवी ने बबलू की खुशामद की थी।

बबलू मान गया था। उन दोनों ने मिल कर सारे संभव प्रयत्न किए थे।

पल्लवी अपना नारी मंडल ले कर काकोली घोष के घर पहुंच गई थी।

“दीदी। आपको जन कल्याण के लिए, देश के उत्थान के लिए नारी समाज का साथ देना ही होगा।” नारी मंडल की संचालक वाणी परिहार ने आग्रह किया था। “मुझे देखो आप दीदी।” उसने अपना ही उदाहरण दिया था। “देश सेवा के लिए मैंने अपना सब कुछ दान में दे दिया है।”

तालियां बजी थीं। आप महान हैं दीदी – सम्वेत स्वर में नारी मंडल बोला था।

“मुझसे क्या चाहिए?” काकोली घोष प्रभावित थीं।

“मैंम्बरशिप।” वाणी परिहार की मांग थी। “आपका साथ चाहिए दीदी।” उनका कहना था। आपके नाम से हमारा नारी मंडल आलोकित हो जाएगा।”

और काकोली घोष को उसी शाम नारी मंडल ने मैम्बर बना लिया था।

“अब हम मुकाबला जीतेंगे बबलू।” पल्लवी ने घर आते ही घोषणा की थी।

मेजर कृपाल वर्मा रिटायर्ड

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