मीरा मर्फी के बुलावे पर राम लाल अपनी पूरी टीम के साथ हाजिर हुआ था।
राम ला अतिरिक्त तरह से चौकन्ना था। उसे स्वामी अनेकानंद से डर लगने लगा था। वह जान गया था कि स्वामी अनेकानंद अब एक जलती ज्वाला थे। जरूरी था कि उस जलती ज्वाला को डिबिया में कैद करके रक्खा जाए। वह नहीं चाहता था कि मीरा मर्फी जैसी मोटी मुर्गी किसी भी तरह स्वामी अनेकानंद के संपर्क में आए। आग और पानी को अलग-अलग रखना कितना जरूरी था – राम लाल जानता था।
“हम ने इस ब्लू प्रिंट को अपने इंजीनियर को दिखाया है, मैडम।” ठेकेदार मानिक लाल बयान कर रहा था। “उसकी समझ में तो कख नहीं आया।” मानिक लाल ने असमर्थता जाहिर की थी। “यहां बंबई में तो है न कोई जो इसे समझ ले और शिव मंदिर बना दे।”
“तो फिर क्या करें?” मीरा मर्फी ने राम लाल की ओर देखा था।
“आपको ही कुछ करना होगा मैडम।” उत्तर कल्लू ने दिया था। “जिसने ये ब्लू प्रिंट बनाया है उसी को मंदिर बनाने के लिए भी कह दें।” कल्लू की राय थी।
“चलो, मैं देखती हूँ।” मीरा मर्फी ने बड़े ही सहज स्वभाव में कल्लू की बात मान ली थी। “लेकिन दिन देर हो सकती है।” मीरा मर्फी ने राम लाल की आंखों को पढ़ा था। “क्या कहते हैं आप?”
“न – नहीं।” राम लाल जैसे सोते से जगा था। “हमारा काम तो हमने करा दिया है।” राम लाल मुसकुराया था।
इस उत्तर के साथ-साथ कल्लू और कदम के चेहरे भी खिल गए थे। जो जोखिम था – पुराने पर्ण कुटीर से कोई सबूत मिलने का वो तो कभी का खत्म हो चुका था। वहां तो अब समतल जमीन का टुकड़ा ही शेष था।
राम लाल की टीम खुश-खुश लौट गई थी।
मीरा मर्फी ने महसूसा था कि उसके सिवा शिव मंदिर के निर्माण के लिए कोई भी जल्दी में न था।
“स्वामी अनेकानंद ने तो शिव से ही सिद्धि प्राप्त की थी, फिर वो …?” पहला शक पैदा हुआ था मीरा मर्फी के दिमाग में। “और ये राम लाल की टीम और ये तिकड़ी …?” दूसरा शक था उसका। “क्या कुछ है पर्दे के पीछे जिसे अब मीरा मर्फी जान लेना चाहती थी।
मीरा मर्फी अकेली थी। विभूति अमेरिका लौट गई थी। उसका और कोई हमराज न था। अचानक उसे अपने दिवंगत मां और बाबूजी याद हो आए थे। “तेरा जोड़ तो भारत में ही मिलेगा – मां का कहा संवाद मीरा सुन रही थी। लेकिन भारत आ कर भी …
शाम ढल रही थी। सूरज गुरूब हो रहा था। पुरवाया छूट गया था। समुंदर में उठती लहरों ने कोहराम मचाया हुआ था। मीरा का मन हुआ था कि बाहर निकले और बतियाए उस बहती बयार से … गरूब होते सूरज से और आंदोलित होते समुंदर से। पूछे उनसे अपने जोड़ का पता, और बताए उन्हें अपने मन की व्यथा।
मीरा मर्फी बीच की बलुही जमीन को रोंदती लंबी-लंबी डग भरती बहुत दूर निकल आई थी। लड़ती झगड़ती चिड़ियाओं का शोर सुन वह हंस पड़ी थी। सभी लड़ते हैं – हक हकूक के लिए। लेकिन एक स्वामी अनेकानंद हैं जो …
मीरा ने दृष्टि उठा कर क्षितिज पर ठहरे कहीं स्वामी अनेकानंद को खोजा था और उसे आश्चर्य हुआ था कि स्वामी जी वहां थे।
“ये क्या माया है?” मीरा मर्फी ने आश्चर्य चकित होते हुए स्वयं से प्रश्न पूछा था। “ये कैसे संभव हो सकता है?”
और जब स्वामी अनेकानंद ने दूर खड़ी मीरा मर्फी को देख लिया था तो वही प्रश्न स्वयं से पूछा था।
स्वामी जी ने दिशा बदलनी चाही थी। लेकिन उनका मन न माना था। मीरा मर्फी ने भी दिशा बदलनी चाही थी लेकिन उसका भी मन न माना था। कोई था – जो उन दोनों को हाथ से पकड़ कर एक दूसरे के समीप लाता ही चला गया था।
एक-एक कदम चलने का एहसास स्वामी जी को हो रहा था। पास आती मीरा मर्फी का जादू चल पड़ा था। उनका तन मन तरंगायित हो उठा था। अपार हर्ष ने स्वामी जी को जैसे बांहों में समेट लिया था। वह पास आती मीरा मर्फी को अपांग देखते ही चले जा रहे थे।
मीरा मर्फी को भी उसकी लाज शरम ने खूब-खूब रोका था – टोका था – और खबरदार किया था। लेकिन उसका मन न जाने क्यों आज विद्रोही बन गया था। वह निर्बाध गति से स्वामी जी की ओर चलती चली गई थी। वह बिना किसी संकोच के स्वामी जी की हो जाना चाहती थी। वह …
युग जैसे बीत रहे थे। संसार जैसे भाग रहा था। उमंगों के इस संसार में वो दोनों भीग गए थे। वो दोनों … आमने-सामने आ कर रुक गए थे।
दोनों के कंठ स्वर मौन थे। दोनों ही कुछ बोल न पाए थे। दोनों ही एक दूसरे को निरंतर देखते रहे थे। मीरा को लगा था कि अब स्वामी जी अपनी बांहें पसारेंगे और वो उनमें समा जाएगी – निःसंकोच।
“अ … आप?” स्वामी जी के होंठ कांप रहे थे।
“अ … आप …?” मीरा मर्फी का स्वर थर्रा गया था।
“ये कैसा सौभाग्य है?” स्वामी जी को होश लौटा था।
“पूर्व जन्म का कोई संस्कार है।” मीरा मर्फी ने उत्तर दिया था।
“मैं तो … मैं तो … रोज यहां घूमने आता हूँ।” स्वामी जी ने सूचना दी थी।
“मैं भी … मैं भी अब रोज यहां घूमने आया करूंगी।” मीरा ने मुसकुराते हुए कहा था। “बड़ा ही रम्य स्थान है।”
फिर दोनों चुप थे। दोनों एक दूसरे को देख परख रहे थे।
“चलें …?” स्वामी जी ने पूछा था।
“चलते हैं।” मीरा ने मान लिया था।
आहिस्ता-आहिस्ता दोनों अब आश्रम की ओर लौट रहे थे। लेकिन दोनों के मन मयूर टेर-टेर कर उन्हें स्वप्निल संसार में विचरने को बुला रहे थे। दोनों मौन थे। दोनों वाचाल थे। दोनों आंदोलित थे। दोनों जागृत थे।
“आप ने तो शिव से सिद्धि प्राप्त की है। लेकिन …?” मीरा मर्फी ने अपने पहले शक का समाधान खोजना चाहा था।
स्वामी जी बहुत देर तक चुप बने रहे थे। मीरा ने महसुसा था कि कुछ था तो जरूर जो स्वामी जी छुपा रहे थे।
“शिव तो सबके हैं।” स्वामी जी ने मीरा की आंखों में देखा था। “जितने वो मेरे हैं उतने ही आपके हैं।” उनका कहना था। “आप मंदिर बनाएंगी तो उसका फल शिव आपको ही देंगे।” हंस गए थे स्वामी जी।
“मैं चलती हूँ?” मीरा मर्फी ने ठहरते हुए कहा था। अब उनकी राहें जुदा हो रही थीं। मीरा मर्फी को होटल जाना था, तो स्वामी जी को पर्ण कुटीर में पहुंचना था।
“ऑल द बैस्ट।” कह कर स्वामी जी ने मीरा मर्फी के दोनों हाथ अपने हाथों में भर लिए थे।
मीरा मर्फी का चेहरा आरक्त हो गया था।
होटल जाती मीरा मर्फी को स्वामी जी खड़े-खड़े देखते ही रहे थे।
फिर न जाने कैसे आनंद बाबू को आज बर्फी याद हो आई थी।
मेजर कृपाल वर्मा रिटायर्ड

